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अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस पर जनमानस में प्रसन्नता और कल्याण के सार्वभौमिक लक्ष्यों  को मान्यता 

प्रसन्नता की चाह प्रत्येक व्यक्ति की सहज एवं नैसर्गिक अभिलाषा होती है। परंतु सफलता की अंधी दौड़ ने पूरे जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। आधुनिक युग के उपभोक्तावाद एवं वैश्वीकरण के दौर में खुशियां हमसे कहीं दूर छिटक गई हैं। भागमभाग भरे जीवन ने मानव को तथाकथित विकास के साथ-साथ मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से रुग्ण कर दिया है। फलस्वरूप खुशियां घटती ही जा रही हैं।

विश्व भर के लोगों के जीवन में खुशियों के महत्व को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने १२ जुलाई २०१२ के अपने संकल्प ६६/२८१ में २० मार्च २०१३ से अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाने की घोषणा की। यह दिवस विश्व के जनमानस में प्रसन्नता और कल्याण के सार्वभौमिक लक्ष्यों और आकांक्षाओं के रूप में मान्यता देता है। कोरोना के चलते गत वर्ष यह दिन थोड़ा फीका रहा।
विश्व महामारी कोविड के दृष्टिगत संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस पर थीम दिया है-कीप कॉम (शांत रहिए), स्टे वाइज (बुद्धिमान रहिए), बी काइंड (दयालु रहिए)। आइए इन तीनों शब्दों को श्री श्री परमहंस योगानंद जी के अमृत वचनों में ढूंढ़ते हैं।

परमहंस जी एक स्थान पर कहते हैं-ठजब भी चिंताओं का झुंड आपके मन पर आक्रमण करता है, तब उससे प्रभावित होना अस्वीकार कर दीजिए। समाधान को ढूंढते हुए शांति से प्रतीक्षा कीजिए। अपनी शांति के शक्तिशाली विनाशक रसायन से चिंताओं पर छिड़काव कीजिए।’

परमहंस जी परामर्श देते हैं-जीवन के सकारात्मक पहुलओं पर विचारों को केंद्रित रखते हुए अपने मन का बुद्धिमानी से नियंत्रण कीजिए। एक अन्यत्र स्थान पर श्री श्री परमहंस योगानंद जी अपने अमृत वचनों की वर्षा करते हुए कहते हैं- जिस प्रकार सूर्य की जीवनदायक किरणें सबका पोषण करती हैं, उसी प्रकार आपको निर्धन एवं उपेक्षित लोगों के हृदय में आशा की किरणों को बिखेरना चाहिए। निराश हृदयों में साहस जगाना चाहिए और जो अपने आपको असफल मानते हैं, उनके हृदयों में नवशक्ति का संचार कराना चाहिए।’

प्रसन्नता के लिए परमहंस जी का यह उपदेश अमृत तुल्य है-अपने आपको हानि पहुंचाने या लाभ पहुंचाने की शक्ति आपके पास है। यदि आप प्रसन्न नहीं रहना चाहते तो कोई भी आपको प्रसन्न नहीं कर सकता। उसके लिए ईश्वर को दोष मत दीजिए! और यदि आप प्रसन्न रहना चाहते हैं तो कोई भी आपको उदास नहीं कर सकता। हम ही जीवन को वैसा बनाते हैं जैसा वह है।’

डॉ. मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार, उत्तराखंड

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