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निवेश गुरु : दुकानदारों व कर्मचारियों के लिए हर माह दीपावली

भरतकुमार सोलंकी

रोशनी के त्योहार दीपावली का जितना अधिक धार्मिक महत्व है उतना ही अधिक यह धन-धान्य, उल्लास और समृद्धि का भी पर्व है। इस दिन पूरे देश में जितनी खरीदारी होती है उतनी शायद किसी भी त्योहार में नहीं। जितनी गाड़ियां इस त्योहारी सीजन में बिकती हैं उतनी पूरे साल नहीं बिक पाती। दरअसल हिंदुस्तान एक कृषिप्रधान देश रहा है इसलिए शुरू से ही यहां फसलों के लिहाज से ही त्योहार मनाए जाते रहे हैं। उष्ण कटिबंधीय देश होने के कारण यहां मुख्यतौर पर दो ही फसलें होती रही हैं रबी और खरीफ। रबी मार्च से कटनी शुरू होती है और खरीफ सितंबर मध्य से। चूंकि यहां धान मुख्य फसल है और धान ही खरीफ का आधार है, इसलिए किसान के पास पैसा धान की फसल आने के बाद ही आता है। धान अब तक कट चुका होता है और किसान के पास खर्च करने को पैसा आ जाता है। यह धान का पर्व है इसलिए इसे धन-धान्य का पर्व भी कहते हैं। एक तरफ तो धान की फसल घर आती है दूसरी तरफ दलहन, उड़द, मसूर व मूंग जैसी दलहन की फसलों के कटने का समय भी यही है। जबकि रबी की फसल में गेहूं, चना, सरसों व अरहर है। यही कारण है कि जब किसान के पास पैसा आएगा तब ही वह उल्लासित हो पाएगा। हमारे देश में त्योहार इसी लिहाज से मनाए जाते रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था भी त्योहारी सीजन के आधार पर ही चलती रही है। आज भले ही अर्थ व्यवस्था में तकनीक और कल कारखाने महत्वपूर्ण हो गए हैं लेकिन अभी भी रीढ़ कृषि ही है। दीपावली हमारे यहां आने वाले धन का आधार है। यहां तक कि शहरी कामगार वर्गों को भी कृषि उपज के आधार पर ही वेतन मानक तय होता है। पूरे साल लोग इंतजार करते हैं कि कब बोनस मिले और वे अतिरिक्त खरीदारी करें। दीपावली इस खरीदारी का बहाना बन जाती है। सालों से चली आ रही भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की धुरी है यह त्योहार। योजना आयोग के एक सर्वे में बताया गया कि भारत के सारे त्योहारों का धार्मिक महत्व है पर दीपावली का एक व्यावसायिक महत्व है।
माना जाता है कि दीपावली की रात किसी भी समय लक्ष्मीजी का घर में आगमन हो सकता है इसलिए उनकी अगवानी के लिए भाई दूज तक चलने वाला यह पर्व इसी के साथ समाप्त हो जाता है। लेकिन शहरों में काम करने वाले कर्मचारियों और दुकानदारों के लिए तो पूरे साल में बारह बार दीपावली ही है क्योंकि उन्हें हर माह वेतन जो मिलता है। खेती पर निर्भर किसानों को सीजन आधारित आमदनी हो सकती है मगर शहरी लोगों के लिए तो हर माह दीपावली ही है। किसानों के लिए सोना-चांदी खरीदकर वेल्थ क्रिएशन करना सीजनल मजबूरी हो सकती है, लेकिन हर माह पगार पाने वाले और बारहों मास दुकानदारी करने वाले व्यापारी बंधुओं के लिए हर माह आसान किस्तों में सोना-चांदी, प्रॉपर्टी या इक्विटी एसेट खरीदकर अपने परिवार के लिए वेल्थ क्रिएशन करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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