मुख्यपृष्ठस्तंभनिवेश गुरु: 'पैसा पैदा करो या पूंजी बाजार पर निर्भर रहो'!

निवेश गुरु: ‘पैसा पैदा करो या पूंजी बाजार पर निर्भर रहो’!

भरतकुमार सोलंकी

हिंदुस्तान के शत-प्रतिशत लोगों का आत्मनिर्भर हुए बिना यह देश आत्मनिर्भर भारत कहलाता है तो हमारा देश कोरा कागजी घोड़ा साबित होगा, जो कागजों पर तो घोड़ा दिखाई देगा लेकिन वह घोड़ा सिर्फ एक तस्वीर की तरह होगा। तस्वीर पर हम फूल-माला चढ़ाकर अपने मन को झूठी तसल्ली जरूर दे सकते हैं। तस्वीर में खड़े कागजी घोड़ों से आखिर हम कितनी उम्मीद कर सकते हैं! असली घोड़ों के लिए तो फिर चारा-पानी और खाना भी चाहिए। साथ ही घोड़े भी ऐसे चाहिए, जो जीतकर आए और उन्हें एक खास ट्रेनिंग देने के लिए कुशल ट्रेनर भी होने चाहिए।

हाल ही में हुए चुनावी नतीजों के बाद कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने चार राज्यों के चुनावों में शानदार प्रदर्शन को ऐतिहासिक और अभूतपूर्व करार देते हुए इस जीत को विकसित भारत के आह्वान व आत्मनिर्भर भारत के संकल्प की जीत बताया है। मेरा मानना है कि संकल्प के साथ इसे क्रियान्वित करने के लिए कार्यकर्ताओं की एक बड़ी फौज की जरूरत पड़ेगी, जो स्वयं आत्मनिर्भर हों। आत्मनिर्भर का शाब्दिक अर्थ तो यही होता है कि स्वयं का काम करने में समर्थ होना किसी और पर निर्भर न होना। एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना, जिसमें हर नागरिक किसी अन्य पर निर्भर न रहे और वह अपना काम खुद करे या फिर वह किसी मशीन के माध्यम से अपना कार्य करवा ले। आमदनी के लिए स्वरोजगार कार्यप्रणाली, जिससे लोगों के पास अपने खुद के इनकम सोर्स बन जाए और वे स्रोत हमेशा आमदनी देते रहे। उदाहरण के लिए जैसे कि एक कुआं, जो प्रतिदिन पानी देता रहे और उस पानी से सदियों तक हम एक रॉयल्टी इनकम की तरह पानी लेते रहे।

लोगों के पास आत्मनिर्भर होने के लिए दो मार्ग हैं। एक तो वे लोग जो पैसों की बाजार व्यवस्था पर निर्भर हो और दूसरे वे लोग जो स्वरोजगार यानी खेती उत्पाद माध्यम से पैसे पैदा करे। सुस्त, स्थिर और संतुलित अर्थव्यवस्था एवं समृद्धि के लिए विभिन्न स्रोतों का संयोजन आवश्यक है। सिर्फ पूंजी आधारित अर्थव्यवस्था का समर्थन करना भी उचित नहीं हो सकता, क्योंकि व्यापकता और विविधता ही सुस्त, सुरक्षित और सतत विकास की कुंजी हो सकती है।

स्वरोजगार, खेती जैसे गन्ना-कपास आदि कृषि उत्पाद के माध्यम से पैसे पैदा करना एक महत्वपूर्ण स्रोत है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए इससे न केवल आत्मनिर्भरता में मदद मिलती है, बल्कि इससे गांवों के आर्थिक विकास में भी सहारा मिलता है। ग्रामीण भारत को समृद्ध बनाने के लिए गांवों में जलापूर्ति के साधन खड़े करने में सरकार की भूमिका अति महत्वपूर्ण बन जाती है। पर्याप्त पानी के बिना किसी भी गांव, ढाणी, कस्बे का विकास संभव नहीं हो सकता है।

वहीं, पूंजी बाजार पर निर्भर लोगों के लिए भी उद्यमिता, नौकरी या वित्तीय सेवाएं अच्छे स्रोत हो सकते हैं। उद्यमिता के माध्यम से नए विचार और तकनीकों को बढ़ावा देना भी विकास में मदद कर सकता है। सामूहिक रूप से दोनों के संयोजन से अधिक समृद्धि और सामाजिक स्थिति का सहारा मिल सकता है।
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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