मुख्यपृष्ठस्तंभनिवेश गुरु: व्यक्तिगत विकास ही राष्ट्र निर्माण का मार्ग

निवेश गुरु: व्यक्तिगत विकास ही राष्ट्र निर्माण का मार्ग

भरतकुमार सोलंकी

दूध से दही बनता है और दही को मंथने से छाछ में से घी निकलता है। क्या कभी घी से छाछ-दूध बनाने की प्रकिया होते किसी ने देखा है, असंभव है। ठीक ऐसे ही व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज और समाज से राज्य अथवा राष्ट्र का निर्माण होता है। व्यक्ति गौण हैं और व्यक्तियों की जागरूकता से ही समाज जागरूक होता हैं। अत: व्यक्तियों के समूह यानी समाज-निर्माण में व्यक्ति विशेष के साथ व्यक्तियों की जागरूकता से ही सभ्य समाज या राष्ट्र का निर्माण होता हैं। व्यक्ति का व्यक्तिगत विकास ही परिवार को संपन्न और समृद्ध बनाता है।
व्यक्तियों के समूह को समाज, झुंड या भीड़ कुछ भी कहा जाए, सब शब्दों का मायाजाल है। अक्सर समूह को समाज का नाम देकर भीड़ को ही महिमामंडित किया जाता है। देश में चुनाव का बिगुल बज चुका है और इस चुनावी दंगल में एक मतदाता के रूप में अपने मत को गुप्त रखे तो ही देश के लोकतंत्र को मजबूत किया जा सकता है। लोगों की देखा-देखी अपने मत का उपयोग भीड़ के रुझान को देखकर कोई करें तो वह व्यक्ति का अपना मत नहीं हैं। इतिहास गवाह हैं भीड़ का निर्णय हर बार गलत साबित हुआ है। मतदाता अपने मत का उपयोग अपने व्यक्तिगत विवेक से करे तो ही एक सभ्य समाज के साथ मजबूत राष्ट्र का निर्माण होता है। प्रचार-प्रसार और भीड़ से प्रभावित होकर अपने मताधिकार का उपयोग करने से समाज की जीत नहीं, बल्कि हार ही हासिल होती है। ऐसे में एक प्रत्याशी व्यक्ति तो जरूर जीत जाता है, लेकिन समाज हार जाता है।
कई बार चुनावी जंग में प्रत्याशियों के बीच की लड़ाई में कूदकर सामान्य मतदाता अपने व्यक्तिगत संबंध भी आपस में ख़राब कर लेते हैं, अंतत: चुनाव जीतने के बाद समाज के लोग अपने आप को ही ठगा हुआ महसूस करते हैं। तीन हजार वर्ष के इतिहास में मानव जाति ने पंद्रह हजार युद्ध लड़े। धरती पर तीन हजार वर्षों में पंद्रह हजार युद्ध, प्रतिवर्ष पांच युद्धों का संघर्ष चलता रहा है। यानी एक युद्ध खत्म हुआ नहीं कि दूसरे युद्ध की तैयारियों में जुट जाना। थोड़ा विचार करने जैसा है कि आदमी इतने युद्धों से क्यों गुजरा? जरूर मनुष्य और समाज के निर्माण में कोई बुनियादी भूल हो गई है। इतनी हिंसा से आदमी को क्यों निरंतर गुजरना पड़ा? पहले महायुद्ध में पांच करोड़ लोगों की हत्या हुई, दूसरे महायुद्ध में दस करोड़ लोगों की हत्या हुई। इतना बड़ा विनाश हुआ कि दूसरे महायुद्ध के बाद लोग सोचते थे कि अब कभी कोई युद्ध नहीं होगा, लेकिन तीसरे युद्ध में जो होगा वह कहना बहुत कठिन है। लड़ना भीड़ के स्वभाव में सदा से रहा हैं, बस लड़ने के तरीके बदल जाते हैं। मेरा मानना सदा से यही रहा हैं कि व्यक्ति को किसी समाज अथवा सरकार के भरोसे रहे बिना ही अपने बलबूते, व्यक्तिगत विकास पर जोर देना चाहिए, जिससे एक मजबूत राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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