मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव : प्रत्येक योजना पर बवाल, कुछ तो गड़बड़ है?

राजधानी लाइव : प्रत्येक योजना पर बवाल, कुछ तो गड़बड़ है?

डॉ. रमेश ठाकुर 

अभी तक केंद्र सरकार की ऐसी कोई योजना नहीं रही, जिसका जनमानस में भारी विरोध न हुआ हो, कृषि कानूनों को ही ले लो, जिसने धरना-प्रदर्शन और आंदोलन के अभी तक के तमाम रिकॉर्ड तोड़ डाले। किसानों का आंदोलन १३ महीने से ज्यादा लंबा खिंचा। विरोध की चिंगारियां इस कदर भड़कीं, जिससे सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। राजनीतिक पंडित इन्हीं बातों को लेकर अचंभित और हैरान-परेशान हैं कि मोदी के प्रत्येक फैसलों  पर हंगामा क्यों कटता है? क्या उनके निर्णय जल्दबाजी में लिए गए होते हैं, या किसी से कोई राय-शुमारी नहीं करते? कमोबेश किसान आंदोलन की ही तरह विरोध की वैसी ही लपटें इस वक्त भी निकल रही हैं। देश का युवा भी सरकार के खिलाफ सड़क पर खड़ा है।
मौजूदा सेना की ‘अग्निपथ’ भर्ती योजना उनको नामुनासिब लग रही है जिसके विरोध में वो आगजनी, तोड़फोड़ व हंगामा काटे हुए हैं। सरकार के लोग अब उन्हें भी गुंडा-मवाली और विपक्षी दलों के कार्यकर्ता बोले रहे हैं। ठीक उसी तरह जैसे किसानों को पाकिस्तानी, खालिस्तानी व नकली किसान बोला गया था। कुल मिलाकर अब युवा भी सरकार के निशाने पर हैं, उन्हें बदनाम करने की सभी तरकीबें हो रही हैं। हालांकि बढ़ते विरोध को देखते हुए बीते शुक्रवार को अग्निपथ योजना में थोड़ा बदलाव किया गया। समय सीमा को २१ वर्ष से बढ़ाकर २३ वर्ष किया गया है। लेकिन युवा इससे भी संतुष्ट नहीं हैं। दरअसल युवाओं का विरोध ४ साल की भर्ती को लेकर है। वह नहीं चाहते हैं कि सेना की भर्ती सिर्फ चार वर्ष के लिए हो?
अगर गौर से देखें तो बीते २६ महीनों में एक अंतराल के बाद कोई न कोई ऐसा मुद्दा छिड़ रहा है जिससे हिंदुस्थान का अमन-चैन खतरे में पड़ रहा है। ज्यादातर मुद्दे हिंदू-मुसलमान के होते हैं। मरकज जमाती से शुरू हुआ मुद्दा सीएए-एनआरसी तक पहुंचा? मरकज के जमातियों पर हिंदुस्थान में कोरोना  फैलाने का आरोप लगाया गया, जो बाद में झूठा साबित हुआ, ऐसा करने में टीवी के एंकरों की बड़ी भूमिका रही, जिसे कोर्ट ने भी स्वीकारा और तमाम एंकरों को फटकार लगाई। सीएए-एनआरसी को लेकर जो माहौल बनाया गया, उसने करीब पांच-छह महीने देश के बर्बाद किए, फिर मामला आया जम्मू से धारा-३७० हटाने का, जो अब भी घाटी में सुलग रहा, ये मुद्दे समय के साथ दब तो गए हैं, पर अंदर खाने सुलग रहे हैं।
इन मुद्दों के बाद, हरिक्षर की धर्म संसद, जानवापी, जहांगीरपुरी प्रकरण, पैगंबर-नूपुर शर्मा और अग्निपथ जैसे मसले इस वक्त गर्म हैं। कह सकते हैं कि एक मसला उठता है और वह एकाध महीने चलता है जैसे ही थोड़ा शांत होता है तो दूसरा मसला खड़ा हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन मुद्दों की आड़ लेकर कहीं असल और जरूरी मुद्दों से ध्यान तो नहीं हटाया जाता। महंगाई-बेरोजगारी पर कोई बात नहीं करता, जिन्होंने सभी आंकड़े धवस्त किए हुए हैं। डिग्री-डिप्लोमा लेकर देश का युवा सड़कों पर नौकरियों की तलाश में मारा-मारा फिर रहा है। उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिल रही। सरकारी नौकरियों की चाह रखने वालों को लगातार निराशा हाथ लग रही है। सेना की नौकरी ४ वर्ष करने का एलान हो चुका है, रेलवे में एक लाख से ज्यादा पद खत्म कर दिए गए हैं। ये सब करने के पीछे सरकार की मंशा क्या है? वह किसी के पल्ले नहीं पड़ रहा।
बहरहाल, बेजान मुद्दों को लेकर हिंदू-मुस्लिमों के बीच जो माहौल बनाया जा रहा है, वह बड़ा खतरनाक है। जुमे के दिन पत्थरबाजी होने लगी है, जिसे रोकने के लिए समूचा प्रशासनिक अमला लग जाता है। कौन है इसके पीछे, उसे केंद्र सरकार क्या, खुफिया तंत्र भी नहीं पकड़ पा रहा। सुरक्षा एजेंसियों के नाक के नीचे विरोध-प्रदर्शन हो जाता है, उन्हें भनक तक नहीं होती? सबसे बड़ी गनीमत इस बात की है, हिंदू-मुस्लिम को लड़ाने-भिड़ाने की भरसक कोशिशें हो रही हैं, लेकिन दोनों वर्ग बड़ी समझदारी का परिचय दे रहे हैं। किसी के बहकावे में नहीं आ रहे। सड़कों पर जो उपद्रवी उपद्रव कर रहे हैं, दरअसल ये पक्ष-विपक्षी दलों के कार्यकर्ता ही हैं। चुपके से अपना काम करके निकल जाते हैं और दोष भोले-भाले लोगों पर मढ़ देते हैं। दिल्ली के जहांगीरपुरी कांड में भी तो यही हुआ था। हंगामे में स्थानीय लोग थे ही नहीं। सबके सब बाहरी और राजनैतिक कार्यकर्ता थे। उनको साजिश के तहत सिर्फ माहौल बिगाड़ना था, जिसमें वह सफल हो गए थे। कायदे से अगर निष्पक्ष जांच हो तो जो इस वक्त अग्निपथ को लेकर बवाल कटा हुआ है, उसमें भी कुछ इसी तरह की नापाक हरकतें मिलेंगी।
खैर ‘अग्निपथ’ योजना की आड़ में भड़की आग भी जल्द शांत हो जाएगी क्योंकि इस मुद्दे की भी मियाद पूरी होनेवाली है, अलग मुद्दा भी बिल्कुल तैयार है। अगले माह राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना है। सरकार फिलहाल उसमें व्यस्त है। केंद्र सरकार इस बार भी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों पद अपने लिए चाहती है, ऐसा हो इस काम के लिए प्रधानमंत्री ने रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को लगाया है, वह विपक्ष के बड़े और पार्टियों के प्रमुख नेताओं को लगातार फोन घुमा रहे हैं, समर्थन मांग रहे हैं। हालांकि देशवासी बेसब्री से जानना चाहते हैं कि अगला राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति कौन होगा? और ये भी पता है कि दोनों ही नाम चौंकाने वाले होंगे, जिसके लिए प्रधानमंत्री जाने जाते हैं। इनमें उपराष्ट्रपति के लिए शायद कोई नाम मुस्लिम ही हो, क्योंकि नूपुर शर्मा प्रकरण के बाद इस्लामिक देशों से भारत के रिश्ते बिगड़े हैं। करीब ५७ देश एक साथ नाखुश हुए हैं, उन्हें खुश करने के लिए केंद्र सरकार ऐसा कर सकती है, इसके लिए पहला नाम पूर्व केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी सबसे ऊपर हैं।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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