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लाउडस्पीकर पर अजान, समझदारी दिखाएं मुसलमान

इस्लाम की बात/ सैयद सलमान। इन दिनों हिजाब के मामले से जुड़ी खबरें कम हुई हैं लेकिन अजान का मुद्दा गर्म है। अजान लाउड स्पीकर पर होनी चाहिए या नहीं, इसको लेकर जमकर राजनीति हो रही है, जिस तरह हिजाब को लेकर कर्नाटक की फिजा बिगड़ी थी, ठीक उसी तरह अजान को लेकर विवाद की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई है। कुछ राजनीतिक दलों से जुड़े नेता इस विवाद को हवा दे रहे हैं। वह लोग भी जो कभी सरकार में थे, लेकिन कुछ किया नहीं, अब गुजरात और मुंबई मनपा चुनाव को देखते हुए सक्रिय हो गए हैं। अजान और लाउडस्पीकर को लेकर विवाद महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा। इसकी आग अन्य राज्यों तक भी पहुंच रही है। अजान के विरोध में चेतावनी जारी की गई है कि मस्जिदों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल बंद हो, नहीं तो मस्जिदों के बाहर तेज आवाज में हनुमान चालीसा का पाठ किया जाएगा, वह भी लाउडस्पीकर पर। अजान के खिलाफ तर्क दिया जा रहा है कि इससे आसपास रह रहे लोग परेशान होते हैं। अजान से नींद में खलल पड़ने या इससे शोर होने की शिकायत का अंदाज जिस तरह राजनेताओं के जरिए आया है उससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि समस्या सचमुच लाउडस्पीकर से है या अजान के बहाने पूरे मुस्लिम समाज को निशाने पर लिया जा रहा है।
वैसे जिस अजान को लेकर इतना विवाद है, उसे जान लेना भी जरूरी है। पैगंबर मोहम्मद साहब के दौर में जब मदीना में सामूहिक नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद बनाई गई तो सवाल उठा कि लोगों को नमाज के लिए आखिर किस तरह बुलाया जाए? उन्हें वैâसे सूचित किया जाए कि नमाज का समय हो गया है। मोहम्मद साहब ने इस विषय पर अपने साथी सहाबा से राय मशविरा किया। मशविरे में अलग-अलग राय सामने आई। नमाज की सूचना देने के लिए सभी की अलग-अलग राय थी। कोई राय दे रहा था कि प्रार्थना के समय कोई झंडा बुलंद किया जाए। किसी की राय थी कि किसी उच्च स्थान पर आग जलाकर सूचित जाए। कुछ लोगों ने बिगुल बजाने और घंटियां बजाने का भी प्रस्ताव दिया लेकिन मोहम्मद साहब को ये सभी तरीके पसंद नहीं आए। तय हुआ कि ईश्वर की महानता को प्रदर्शित करते हुए अल्फाजों को जरिया बनाकर और नमाज के महत्व को बुलंद आवाज में घोषणा करते हुए बताया जाए। इस तरह इस्लामी रवायत के अनुसार बुलंद आवाज के धनी हजरत बिलाल ने पहली अजान दी। जाहिर है उस वक्त लाउडस्पीकर नहीं था। ठीक उसी तरह जिस तरह मोटर, कार, जहाज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। बाद में जैसे-जैसे विज्ञान ने तरक्की की और लाउडस्पीकर ईजाद हुआ तो मुसलमानों ने उसी का सहारा लेकर अजान देने की शुरुआत की। मकसद ये था कि अजान की आवाज ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाई जा सके।
लाउडस्पीकर से अजान दिए जाने का प्रचलन तकरीबन एक सदी पुराना है। लाउडस्पीकर का आविष्कार २०वीं सदी की शुरुआत में हुआ था। इस आविष्कार के बाद लाउडस्पीकर्स को मस्जिदों तक पहुंचने में बहुत ज्यादा वक्त नहीं लगा। एक किताब के हवाले से बताया गया है कि दुनिया में पहली बार अजान के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल साल १९३६ में सिंगापुर की सुल्तान मस्जिद में किया गया था। वहां के अखबारों में खबरें छपीं कि लाउडस्पीकर से अजान की आवाज १ मील तक जा सकेगी। हालांकि तब इस नई तकनीक के इस्तेमाल का विरोध मस्जिद में नमाज पढ़ने वाले कई लोगों ने किया था। लेकिन तब भी कई लोगों का मानना था कि बढ़ती आबादी और बढ़ते शोर के बीच लाउडस्पीकर के जरिए अजान की आवाज ज्यादा लोगों तक पहुंच सकेगी। कुछ लोगों ने इसे बेहतर कदम माना तो कुछ ने विरोध किया। हिंदुस्थान में इस संबंध में पहला फतवा तत्कालीन प्रख्यात विद्वान मौलाना अशरफ अली थानवी ने दिया था। उन्होंने इस उपकरण को हराम घोषित कर दिया था। उन्होंने अपने फतवे में कहा था कि लाउडस्पीकर का मस्जिद के अंदर प्रवेश करना मस्जिद के सम्मान के खिलाफ है। उनके साथ-साथ अन्य उलेमा ने भी न केवल लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगाने की वकालत की थी, बल्कि यह भी ऐलान किया था कि लाउडस्पीकर की आवाज सुनकर जो नमाज पढ़ी जाती है, वह सिरे से नमाज ही नहीं होती और ऐसी नमाजों को दोहराना जरूरी है।
इस मामले में सारा पेंच विज्ञान से जुड़ा था। मुसलमान अपने उलेमा की बात से हटने को तैयार न थे। मामला चूंकि विज्ञान का था इसलिए जवाब विज्ञान से ही ढूंढ़ना था। उस समय ध्वनिकी वैज्ञानिक कहां से लाएं, इसलिए कुछ बुद्धिजीवियों और शिक्षकों से इस विषय पर सवाल किए गए। दिलचस्प बात यह है कि इनमें बृज नंदन लाल नाम के एक हिंदू शख्स भी शामिल थे, जो भोपाल के एक हाई स्कूल में विज्ञान पढ़ाते थे। उन्होंने पूरी तरह से लाउडस्पीकर का समर्थन भी नहीं किया था और न ही विरोध। उन्होंने उलेमा को विज्ञान के साथ चलने का मशविरा दिया था। बाद में अधिकांश उलेमा ने यूटर्न लेकर लाउडस्पीकर की इजाजत दे दी थी। गौरतलब और शिक्षाप्रद है कि तब उलेमा को विशुद्ध धार्मिक मामलों के समाधान के लिए किसी हिंदू के पास जाने में कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन आज वैâसी स्थिति बना दी गई है यह शोध का विषय है। आज दूरियां इस कदर बढ़ गई हैं कि एक-दूसरे पर विश्वास ही नहीं रहा।
लाउडस्पीकर पर अजान दिए जाने के नियम अलग-अलग देशों में अलग-अलग हैं। जैसे तुर्की और मोरक्को जैसे देशों में बमुश्किल ही लाउडस्पीकर से अजान दी जाती है। नीदरलैंड में महज सात से आठ प्रतिशत मस्जिदों में लाउडस्पीकर के जरिए अजान दी जाती है। दुनिया में कई देशों में अजान की सीमाएं तय की गई हैं इनमें नीदरलैंड, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, प्रâांस, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रिया, नॉर्वे और बेल्जियम जैसे देश शामिल हैं। लाओस और नाइजीरिया जैसे देशों ने अजान की या तो सीमाएं तय की हैं या फिर प्रतिबंधित किया है। दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम बहुल देश इंडोनेशिया तक में मुस्लिम धर्मगुरुओं ने अनियंत्रित रूप से लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर चिंता जाहिर की है। इंडोनेशिया सरकार ने माना कि कई मस्जिदों द्वारा ऊंची आवाज में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल पर्यावरणीय मुद्दा है और उसने इस परेशानी से निपटने की बात कही। सबसे प्रभावशाली माने जाने वाले मुस्लिम देश सऊदी अरब ने भी अपने यहां मस्जिदों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदियों का एलान किया है। सऊदी में लाउडस्पीकर के वॉल्यूम को एक तिहाई तक कम करने के लिए कहा गया है। मुस्लिम समाज को अगर लगने लगा है कि अजान के लिए लाउडस्पीकर पर पाबंदी की बात मूलत: सांप्रदायिक विद्वेष के कारण की जाती है तो उसे लाउडस्पीकर के मुद्दे पर समझदारी से सोचना शुरू कर देना चाहिए। कुछ बातें ऐसी जरूर हैं जिन पर सामूहिक निर्णय लिया जाना चाहिए। राजनीतिक बयानबाजियों को दरकिनार करते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अजान को लेकर किया जा रहा यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की आड़ में बढ़ाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने साल २००५ में अपने एक आदेश में रात १० बजे से सुबह ६ बजे तक लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई है। अगर उलेमा भी शुरुआती दौर में लाउडस्पीकर को लेकर भ्रमित थे तो आज भी उसकी जरूरत को लेकर विचार होना चाहिए। चुनाव सिर पर हैं। रोज ऐसे मुद्दे उठेंगे। यह दौर बड़ा कठिन है। आक्रामकता और हिंसा को जायज ठहराना अब आसान हो गया है। ऐसे में फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है। बस मुसलमान किसी के लिए मुद्दा बनकर इस्तेमाल न हों और कानून का पालन करें, यही समय की मांग है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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