मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात: सम्मान, सुरक्षा और कर्तव्य का रिश्ता सलामत रहे!

इस्लाम की बात: सम्मान, सुरक्षा और कर्तव्य का रिश्ता सलामत रहे!

सैयद सलमान / मुंबई। इन दिनों देश के मुसलमानों के बीच असुरक्षा की भावना ने एक बार फिर पैर पसारे हैं। कारण का ठीकरा किसी अन्य पर थोपने से पहले यह मान लेना ज्यादा उचित होगा कि खुद मुसलमानों ने ही बहुत से कारण मुहैया करवाए हैं, जिसके कारण ऐसी स्थिति बनी है। दूसरों पर दोषारोपण करने से पहले अपने भीतर झांकना ज्यादा जरूरी होता है। शायद मुसलमानों की स्थिति बिल्कुल इसी तरह की हो गई है। एक मुद्दा और है जो अप्रत्यक्ष रूप से समाज के सामने है, वह है जनभावना और जनहित का मुद्दा। जनभावना और जनहित अलग-अलग चीजें हैं। जनभावना वह जो एक विशेष पार्टी चाहती है। जनहित वह जो एक आम आदमी की ख्वाहिश है। वर्तमान में जनभावना के नाम पर एक विशेष पार्टी की सोच को क्रियान्वित करना इन दिनों सरकार का मूल फॉर्मूला है। और जनहित? जनहित गया चूल्हे-भाड़ में। दरअसल, इन दिनों केंद्र की सत्ता के नशे में चूर होकर कुछ लोग अपनी नाकामी को छुपाने के प्रयास में देश के बहुसंख्यक समाज को अपना यह पाठ पढ़ाने में लगे हैं कि इस देश में क्यों मुसलमानों को बराबरी का नागरिक होने का अधिकार नहीं है। क्यों उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक घोषित कर देना चाहिए। और क्यों ये जरूरी है कि बहुसंख्यक तय करें कि अल्पसंख्यकों को इस देश में वैâसे रहना चाहिए, क्या खाना चाहिए, क्या पहनना चाहिए वगैरह-वगैरह। बेरोजगार नवजवानों को गुमराह किए रहना भी जरूरी है, क्योंकि अगर वह जागरूक हुए तो अपने हिस्से का रोजगार मांगेंगे, देश में बढ़ती महंगाई पर सवाल करेंगे, विश्वस्तर के अस्पताल मांगेंगे, अच्छी सड़कें मांगेंगे और मांगेंगे एक सुकून भरी जिंदगी। तब उन्हें जवाब क्या दिया जाएगा? उसका तोड़ यही है कि नफरत और हिंसा का जहर उनके भीतर इस तरह भर दिया जाए कि उसके नशे में चूर होकर वे मूल सवालों और समस्याओं को भूल जाएं। पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिम मुद्दों को इस कदर उछाला गया है कि देश में नफरत, कट्टरता, असहिष्णुता और हिंसक तत्वों का बोलबाला हो गया है। इस बात में जरा भी संदेह नहीं कि इन कोशिशों के बावजूद इस देश का बड़ा तबका अब भी इन विचारों से सहमत नहीं है।
इस बीच आहार, आस्था, परिधान, त्योहार और भाषा से संबंधित मुद्दों के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर देशभर के विपक्षी नेताओं ने एक सुर में आवाज उठाई है। इन नेताओं ने अपने साझा बयान में चिंता जताई है कि देश में अभद्र भाषा की बढ़ती घटनाएं समाज में वैमनस्य पैदा कर रही हैं। जिन्हें सरकार की तरफ से आधिकारिक संरक्षण प्राप्त है, उनके खिलाफ कोई सार्थक और कड़ी कार्रवाई नहीं की जा रही है, बल्कि हर तरह से प्रोत्साहन दिया जा रहा है। हिंसा और तनाव के बीच सोनिया गांधी, शरद पवार, ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव सहित १३ विपक्षी नेताओं ने साझा बयान जारी कर लोगों से शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील की है। इन नेताओं ने सांप्रदायिक हिंसाओं की घटनाओं के मामले में कठोर कार्रवाई की मांग करने के साथ-साथ इस बात पर भी आश्चर्य जताया है कि देश में जारी हिंसा के बीच प्रधानमंत्री चुप वैâसे रह सकते हैं? उन्हें ऐसे तत्वों से सख्ती से निपटने से भला कौन रोक रहा है? विपक्ष की अपील पर हिंसा के लिए इस्तेमाल हो रहे लोग शायद ही कान धरें, लेकिन इस बहाने विपक्ष अगर एक मंच पर आता है तो उसकी पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। इस एकता की जरूरत इसलिए भी है कि इन वर्षों में कुछ सत्ता लोभियों ने सत्ता की चाह में अपनी स्वाभाविक साथी पार्टियों की जड़ों में भी मट्ठा डालने का काम किया है। मनोकामना पूरी न होने की स्थिति में केंद्रीय एजेंसियों का सहारा लिया है। बदला लेने और अहंकार की इस मानसिकता को रोकना बेहद जरूरी है। यदि इसे अभी नहीं रोका गया तो आने वाले समय में इतना नुकसान होगा कि कोई उसकी भरपाई नहीं कर पाएगा। अब तो सत्तापक्ष के लोग भी नफरत और हिंसा के मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पहले बड़े भाजपा नेता हैं, जिन्होंने हिंदू-मुस्लिम विवाद के बीच चुनिंदा हिंदुत्व संगठनों की अगुवाई में चलाए जा रहे अभियानों की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी। दरअसल कर्नाटक में कुछ संगठनों की तरफ से मुसलमानों और उनके व्यवसायों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों को लेकर येदियुरप्पा ने कहा था कि मुसलमानों को शांति और सम्मान के साथ जीने दीजिए। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों को एक मां के बच्चों जैसा बताकर सत्ता प्रायोजित हिंसा को आईना दिखाया था। कर्नाटक के ही कानून और संसदीय कार्य मंत्री जेसी मधुस्वामी ने भी कट्टरपंथी समूहों पर कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी। उन्होंने बयान दिया था कि वे सभी लोग जिन्होंने आजादी के बाद हिंदुस्थान में रहने का पैâसला किया था, वो हिंदुस्थानी हैं और ये देश हर किसी का है। इसके अलावा दो अन्य भाजपा विधायकों ने भी हिंसक अभियानों के खिलाफ आवाज उठाई थी। उनकी यह लाइन कर्नाटक और केंद्र के अन्य भाजपा नेताओं से अलग थी। यही नहीं भाजपा सांसद वरुण गांधी ने भी बयान दिया कि देश में हिंदू-मुस्लिम मुद्दा इसलिए उछाला जा रहा है, ताकि देश में बेरोजगारी और अन्य मुद्दों की बात न हो। वरुण गांधी ने आरोप लगाया कि देश में डेढ़ करोड़ नौकरियां और पद खाली हैं, जो भरी नहीं जा रही हैं और नौजवान खाली पेट बेरोजगारी की मार झेलता घूम रहा है। यह तो शुरुआत है, आनेवाले दिनों में और भी भाजपा नेताओं के इस कड़ी का हिस्सा बनने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता।
वर्तमान दौर में विभिन्न संस्कृतियों, सभ्यताओं, भाषाओं और धर्मों को समेटे इस देश में कहीं किसी प्रकार की अप्रिय घटना का होना, केंद्र की सत्ता में जिम्मेदार पदों पर बैठे भेड़ियों के लिए किसी निवाले की तरह है, जिस पर वह टूट पड़ते हैं। किसी भी घटना के बाद उस पर धर्म-जाति संदर्भित राजनीति का शुरू कर दिया जाना अपने आप में अत्यंत शर्मनाक है। अगर खुद सरकारी स्तर पर नफरत पैâलाने का, आपस में द्वेष बढ़ाने का कार्य किया जा रहा हो तो यह चिंता की बात है और उसकी निंदा की जानी चाहिए। आम जनमानस को समझना होगा कि इस तरह के विवाद से किसी भी वर्ग का लाभ होने वाला नहीं है। मुसलमानों को भी यह समझना होगा कि वह उन राजनीतिक दलों के बहकावे में न आएं, जो इस तरह के विवादों के साए में ही आपको छांव देना चाहते हैं। मुस्लिम समाज यह याद रखे कि राष्ट्र का भविष्य भाषण से, चुनाव जीतने-हारने से नहीं, बल्कि सच्ची देश सेवा से बनता है। मुस्लिम समाज अपने हमवतन भाइयों के साथ बैठकर मूल मुद्दों पर विचार करे। निजीकरण, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, सड़क, देश का चहुंमुखी विकास जैसे कई मुद्दे हैं, जिसका असर प्रांत, भाषा, धर्म देखकर नहीं पड़ता। यह सबके लिए एक समान प्रभावी होता है। हिंदू-मुस्लिम कोई मुद्दा नहीं है, यह मुद्दा केवल इसलिए है कि असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जाए। संविधान ने देश के हर नागरिक को जीने, कारोबार करने और अपने धर्म का पालन करने के अधिकार की गारंटी दी है। उसने किसी को भी सार्वजनिक रूप से किसी समाज, समुदाय या संप्रदाय को बदनाम करने का अधिकार नहीं दिया है। फर्जी राष्ट्रवाद के नाम पर शांति और समरसता को दांव पर लगाना इस देश को खोखला कर देगा। इस देश के बहुसंख्यकों का सम्मान करना अल्पसंख्यकों का और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करना बहुसंख्यकों का कर्तव्य है। इस नजरिए में जरा सी चूक से दोनों के रिश्ते दरक जाते हैं। जागिए, अभी देर नहीं हुई है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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