मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : नफरत पर वार राखी का त्योहार

इस्लाम की बात : नफरत पर वार राखी का त्योहार

सैयद सलमान
मुंबई

रक्षाबंधन का त्योहार सामने है। एक ऐसा खूबसूरत और पवित्र त्योहार जिसमें शुद्धता और स्नेह का ऐसा मिश्रण देखने को मिलता है, जिसकी कल्पना मात्र से ही हृदय प्रफुल्लित हो जाता है। राखी का यह त्योहार सिर्फ धागों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह धागा भाई-बहन के प्यार का सबसे मजबूत स्तंभ है। पिछले कुछ वर्षों में भले ही भेदभाव बढ़ा हो, लेकिन भाई-बहन के इस पवित्र पर्व की आभा में कमी नहीं आई है। देशभर में रक्षाबंधन पर गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल देखने को मिलती है। एक ऐसी मिसाल जो मजहब के बंधनों को तोड़कर इंसानियत के बंधनों को मजबूत करती है। राखी के त्योहार के दिन कई मुस्लिम बहनें हिंदू भाइयों को राखी बांधती हैं और मुस्लिम भाई भी अपनी हिंदू बहनों से राखी बंधवाना नहीं भूलते। साथ ही बहन को सुरक्षा का वचन देकर भाईचारे को मजबूत करते हैं। मजहब के नाम पर खाई खोदनेवालों के लिए रक्षाबंधन का पर्व आंखें खोलने वाला होता है, बशर्ते वह अपने एजेंडे से इतर इसकी गंभीरता और पवित्रता को समझें। यह पर्व ही ऐसा है जहां हिंदू-मुस्लिम भाई-बहनों के अनमोल रिश्ते की मिसाल देखने को मिलती है। जब देश का पुरुष वर्ग डिजिटल मीडिया के इस युग में विभिन्न आईटी सेल के माध्यम से नफरतों को बढ़ाने में अपनी ऊर्जा लगा रहा होता है, तब हिंदू-मुस्लिम समाज की बहनें अपने भाइयों के माध्यम से मोहब्बत पैâला रही होती हैं।
यह केवल आज की बात नहीं है। मध्यकालीन युग का एक ऐतिहासिक उदाहरण है, जिसके माध्यम से इस पर्व को हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बताया जाता रहा है। उस दौर में तब राजपूतों और मुस्लिम शासकों के बीच सत्ता संघर्ष चल रहा था। तब चित्तौड़ में महारानी कर्णावती का शासन था। उन्होंने शासन का कार्यभार अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को सौंप रखा था। इसी बीच गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। तब महारानी कर्णावती ने राजपूत शासकों से मदद की गुहार लगाई और मुगल सम्राट हुमायूं को भी एक राखी भेजी। यह एक प्रतीकात्मक संदेश ही था कि एक बहन को भाई की मदद की दरकार है। राखी मिलते ही महारानी कर्णावती की भावनाओं का सम्मान करते हुए हुमायूं ने उन्हें अपनी बहन मान लिया और उनकी रक्षा के लिए निकल पड़े। हालांकि, उन्हें पहुंचने में थोड़ी देर हो गई और महारानी कर्णावती समेत चित्तौड़ की बहुत सी महिलाओं ने जौहर कर लिया था। मुगल सम्राट हुमायूं को इस बात से दुःख पहुंचा। रानी कर्णावती की मौत की खबर मिलने के बावजूद हुमायूं वापस नहीं लौटा, बल्कि अपनी बहन की खातिर वहां पहुंचकर बहादुर शाह को हरा दिया और विक्रमादित्य को मेवाड़ का शासक बना दिया। यह एक राखी के कच्चे धागे का ही कमाल था जो एक मुसलमान दूसरे मुसलमान से जंग करता है और अपनी हिंदू बहन के सम्मान को कायम रखता है और उसके बेटे को पुन: शासन सौंप देता है।
हालांकि, राखी जैसे पवित्र बंधन पर भी सवाल खड़े करने का प्रयास हो चुका है। कुछ साल पहले रक्षाबंधन के दिन एक मुस्लिम महिला ने यूपी पुलिस के एक इंस्पेक्टर को राखी बांधी थी। कुछ कट्टरपंथी उलेमा को यह बात बुरी लगी और उन्होंने बिना कुछ सोचे-समझे मुस्लिम महिला के इस कदम को इस्लाम के खिलाफ बता दिया। हैरानी की बात यह है कि कुछ लोग इतनी छोटी सोचवाले होते हैं कि राखी जैसे पवित्र रिश्ते में भी दोष ढूंढ़ने से नहीं चूकते। काश! उलेमा ने इतिहास में झांक कर देखा होता तो उन्हें पता चलता कि हिंदू और मुस्लिम धर्म के बीच राखी की परंपरा कई सदियों से चली आ रही है। रानी कर्णावती और हुमायूं का उदाहरण तो है ही, ऐसे कई उदाहरण आसपास भी देखने को मिल जाएंगे। ऐसी कितनी ही मुस्लिम बहनें हैं, जिनकी हिफाजत हिंदू भाई करते हैं। इस त्योहार के महत्व को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी समझते हैं, तभी तो एनडीए की राजनीतिक बैठकों में भी वह रक्षाबंधन का जिक्र करने से खुद को नहीं रोक पाए। हाल में हुई दो बैठकों के दौरान उन्होंने भाजपा और एनडीए के नेताओं और सांसदों को मुस्लिम महिलाओं से मिलने और उनके साथ रक्षाबंधन का त्योहार मनाने को कहा है। याद रहे धर्म इंसानों की सहूलियत के लिए बनाए गए थे, न कि उनके बीच भेदभाव करने के लिए। उपासना पद्धति के अलग होने से भावनाओं की पवित्रता और रिश्तों का महत्व खत्म नहीं होता। राखी के कच्चे धागे बेहद शक्तिशाली होते हैं। जब नफरत धर्म बंधक बनाकर अपना जहर पैâलाए, तब भाई-बहन के बीच राखी का बंधन ही सभी धर्मों को प्रेम के बंधन में बांधने की ताकत रखता है। इस पर्व को और भी उत्साह से मनाने की जरूरत है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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