मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : फिर जागा मुस्लिम आरक्षण का जिन्न

इस्लाम की बात : फिर जागा मुस्लिम आरक्षण का जिन्न

सैयद सलमान मुंबई

मराठा आरक्षण पर जारी राजनीति के बीच मुस्लिम आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बाहर आया है। महाराष्ट्र विधानसभा में सर्वसम्मति से मराठा आरक्षण विधेयक को मंजूरी मिल गई है। अब महाराष्ट्र में मराठा समाज को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में १० प्रतिशत आरक्षण मिलेगा। हालांकि, मराठा आंदोलन का नेतृत्व करनेवाले मनोज जरांगे इस विधेयक से बिल्कुल खुश नहीं हैं। उन्होंने अपनी मांग दोहराई है कि राज्य सरकार कुनबी मराठों के ‘खून के रिश्तों’ पर अपनी अधिसूचना को कानून में बदले। महाराष्ट्र में चार दशक पुराने मराठा आरक्षण के दौरान मराठा समुदाय को तीन बार आरक्षण दिया गया है। इस से पहले के दिए गए आरक्षण अदालत में टिक नहीं सके। इस बार भी मराठा आरक्षण आंदोलन के नेताओं को लग रहा है कि उनके साथ धोखा हुआ है और यह आरक्षण भी अदालत में नहीं टिकेगा। हां, यह जरूर हुआ कि हर बार आरक्षण का दायरा छोटा होता जा रहा है। २०१४ में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार ने मराठा समाज को १६ फीसदी आरक्षण दिया था और २०१८ में तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नौकरियों में १२ फीसदी और शिक्षा में १३ फीसदी आरक्षण दिया था। वह वर्तमान सरकार में भी शामिल हैं और उपमुख्यमंत्री भी हैं, लेकिन इस बार क्रेडिट कोई और लेने की फिराक में है।
इतनी पेचीदगियां मराठा आरक्षण को लेकर हैं, उसके बावजूद मुस्लिम आरक्षण की मांग भी जोर पकड़ रही है। विधानसभा परिसर में मराठा आरक्षण बिल पास होने के तुरंत बाद, सपा विधायक अबू आसिम आजमी ने मुस्लिम आरक्षण अध्यादेश फाड़ते हुए मुसलमानों के साथ अन्याय किए जाने का राज्य सरकार पर आरोप लगाया। अबू आसिम आजमी और उनके साथी विधायक रईस शेख ने विधान भवन परिसर में बैनर लहराकर सरकार के खिलाफ अपना विरोध जताया। एक अनुमान के मुताबिक, राज्य में मराठा समाज की आबादी ३२ फीसदी है, जबकि मुसलमानों की संख्या १० फीसदी से कुछ अधिक है। सपा की मांग है कि महाराष्ट्र सरकार मराठा आरक्षण के साथ-साथ मुसलमानों को भी ५ फीसदी आरक्षण दे और इसके लिए जरूरी विधेयक भी लाए। अब यह तय हो गया है कि मुस्लिम नेता मुस्लिम आरक्षण को लेकर नई रणनीति तय करेंगे और इस मांग को लेकर संघर्ष शुरू करेंगे। फिलहाल, यह मुद्दा सपा ने उठाया है। हालांकि, एमआईएम के पूर्व विधायक वारिस पठान भी इस मामले में कूद पड़े हैं और उन्होंने अबू आसिम आजमी के सुर में सुर मिलाया है कि मुस्लिम समाज की मांग गलत नहीं है। मुस्लिम नेता ५ फीसदी आरक्षण शिक्षा के लिए ही मांग रहे हैं। इस मांग को मुंबई हाई कोर्ट ने भी जायज माना है तो फिर महाराष्ट्र सरकार इसे लागू क्यों नहीं करती? हो सकता है आनेवाले दिनों में कांग्रेस के मुस्लिम नेता भी इस मुद्दे पर मुखर हों। आखिरकार, यह मुस्लिम वोट हासिल करने का सवाल है।
२०१४ में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के नेतृत्ववाली तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने मुसलमानों के लिए ५ प्रतिशत और मराठों के लिए १६ प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी, लेकिन मुंबई हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी और शिक्षा में मुसलमानों के लिए ५ प्रतिशत आरक्षण को ही जारी रखा। यानी कोर्ट ने शिक्षा में आरक्षण देने की इजाजत तो दी, लेकिन रोजगार में नहीं। इसकी आड़ में कानून नहीं बन सका। अब तीन पार्टियों की सरकार है। तीनों के बीच तालमेल का आभाव है। धोखे-फरेब से दो दलों ने अपनी-अपनी पार्टियों को तोड़कर तीसरे दल के साथ सरकार बनाई है। सबसे ज्यादा विधायकों वाली पार्टी का नेता जो कभी राज्य का मुख्यमंत्री था, अब उसे उपमुख्यमंत्री बनकर संतोष करना पड़ रहा है। इसी से साफ हो जाता है कि यह सरकार मजबूरी में मजबूरों द्वारा बनाई गई है। वह मराठा समाज को सपने दिखा सकती है और उन्हें संतुष्ट नहीं कर सकती। फिर हाशिए पर पड़े मुसलमानों के लिए क्या ही सोच पाएगी। मुसलमान धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि पिछड़ेपन के आधार पर ५ प्रतिशत शिक्षा में आरक्षण मांग रहे हैं। मुस्लिम आरक्षण के नाम पर आंदोलन की बात हो रही है। आंदोलन से मुसलमानों ने अब ज्यादातर हाथ पीछे खींच लिए हैं। सरकार से उन्हें उम्मीद ही नहीं। वह दोराहे पर खड़ा है। आंदोलन करता है तो फायदा कम, नुकसान का खतरा ज्यादा है। ढेर सारे केस में उन्हें फंसने का डर होता है। सरकारें मुसलमानों के आंदोलन को कुचलने का हुनर सीख गई हैं। मुसलमान अक्सर आंदोलन के दौरान उग्र हो जाते हैं। ऐसे में अबू आसिम आजमी हों या कांग्रेस-एमआईएम के नेता, उन्हें पंâूक-पंâूक कर कदम रखना होगा, अन्यथा सरकार में शामिल तीनों दल ‘मुस्लिम वोट बैंक’ की राजनीति बताकर इस आंदोलन के जिन्न को फिर बोतल में बंद कर देंगे।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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