मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : चिंताजनक है हिंसा का रास आना!

इस्लाम की बात : चिंताजनक है हिंसा का रास आना!

सैयद सलमान मुंबई

अभी-अभी देश ने आजादी का जश्न मनाया है, लेकिन इस बीच नफरत पैâलाने वाली खबरें जब भी नजर के सामने आती हैं तो दिल बेचैन हो उठता है। एक खबर मुंबई से आई है। मुंबई के बांद्रा इलाके में एक युवक की बेरहमी से सिर्फ इसलिए पिटाई की गई, क्योंकि वह दूसरे धर्म की लड़की के साथ घूम रहा था। रेलवे स्टेशन पर आठ-दस लोग इकट्ठा हो गए और उसे खींचकर ले गए, मुक्के मारे और थप्पड़ों की बरसात कर दी। आरोपी ‘जय श्री राम’ का नारा लगाते हुए उसे पीटते रहे। भीड़ में शामिल लोग आरोप लगा रहे थे कि ठाणे जिले के अंबरनाथ में रहनेवाला उक्त युवक नाबालिग लड़की को उसके परिजनों की रजामंदी के बगैर बरगला कर अपने साथ कहीं बाहर ले जाने के लिए बांद्रा टर्मिनस पहुंचा था। नाबालिग लड़की के भाई ने उसके अपहरण की शिकायत अंबरनाथ पुलिस थाने में दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसमें एक पुलिस अधिकारी भी नजर आ रहा है। लेकिन उसने भी पीट रहे लड़कों को रोकने की कोशिश नहीं की। सवाल उठता है कि क्या यह देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को भी नफरत की आग में झोंकने की तैयारी तो नहीं है? एक तबका इस पिटाई को ‘लव जिहाद’ का नाम देकर पीटने वालों के समर्थन में घटना को उचित बता रहा है, जबकि कुछ लोगों की राय है कि अगर कोई गलती करता है तो उसके लिए कानून है और कानून हाथ में लेने का अधिकार किसी के पास नहीं है।
पिछले दिनों हरियाणा का हिंसाग्रस्त नूंह इलाका भी खासा चर्चित रहा। नूंह में हुई हिंसा के बाद गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल और गाजियाबाद जैसे शहरों में तनाव देखा गया था। उसी तनाव के बीच हिसार जिले का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। इस वीडियो में कुछ लोग पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में दुकानदारों को चेतावनी दे रहे हैं कि अगर किसी मुस्लिम व्यक्ति को काम पर रखा है तो उसे नौकरी से हटा दिया जाए, नहीं तो इन विक्रेताओं का बहिष्कार किया जाएगा। इसके अलावा गाजियाबाद के नंदग्राम इलाके में भी कुछ पोस्टर लगाए गए, जिसमें मुस्लिमों के बहिष्कार की अपील की गई थी। यही नहीं हिंसा और सांप्रदायिक तनाव के बाद हरियाणा के रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ और झज्जर की ५० से ज्यादा पंचायतों की ओर से पत्र जारी किए गए, जिनमें इन इलाकों में मुस्लिम व्यापारियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी। कुछ जगहों पर पत्र केवल इसलिए भी जारी किए गए कि अन्य पंचायतें जारी कर रही थीं। कहीं-कहीं तो मुस्लिम आबादी भी नहीं थी, तब भी पत्र जारी हुए। हालांकि, कुछ स्थानों पर समझदार कानूनी सलाहकारों द्वारा यह समझाने के बाद कि किसी समुदाय को धर्म के आधार पर अलग करना कानून के खिलाफ है, कुछ लोगों ने पत्र वापस ले लिया। क्या यह विभाजन की राजनीति का संदेश नहीं है, जिसे केंद्र और हरियाणा की राज्य सरकार मौन सहमति दे रही है?
मुंबई और नूंह की इन घटनाओं के अलावा मध्य प्रदेश के सागर में विश्व हिंदू परिषद के एक नेता ने मुस्लिम बहिष्कार का एलान किया था, वहीं पिछले दिनों बजरंग दल के एक नेता ने पंजाब के फाजिल्का में नसीर और जुनैद की हत्या को सही ठहराने वाला बयान दिया था। इसी तरह के नफरत भरे बयानों और घटनाओं से धीरे-धीरे नफरत का जहर मस्तिष्क पर चढ़ जाता है। तभी कोई किसी को कार में जिंदा जला देता है, कभी किसी को जिंदा जलाकर अपने समर्थकों से कोर्ट में तिरंगा हटाकर संगठन विशेष का झंडा फहरवाता है, कभी मॉब लिंचिंग होती है, कभी बच्चियों का बलात्कार होता है, कभी कोई ऐसी ही बातों के प्रभाव में आकर खाकी वर्दी को लज्जित करते हुए ट्रेन में सफर करते हुए बेकसूरों को भून देता है और शर्म की बात तो यह कि इस तरह के आरोपियों को नैतिक, सामाजिक और आर्थिक मदद देकर उनका सार्वजनिक सत्कार कर ऐसी विचारधारा को प्रोत्साहन दिया जाता है।
किसी भी तरह हिंसा को जायज ठहराना, कानून का मखौल उड़ाना होगा। जैसे धर्म की आड़ में, जिहाद के नाम पर मुस्लिम आतंकी संगठन बेकसूरों को बम और गोलियों से उड़ाते हैं, क्या यह भी उसी का रूप नहीं है? एक बात तो तय है कि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता, जैसे कि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता, इसी तरह मुंबई, नूंह, सागर, फाजिल्का जैसी घटनाएं और बयानात भी किसी खास धर्म के पैरोकारों के नहीं हैं। इस्लाम शांति का और हिंदुत्व सहिष्णुता का धर्म है। दोनों का संगम ही असल हिंदुस्थान है। लेकिन दोनों तरफ के लोगों के कुछ नफरती तत्व धर्म की आड़ में खुद को धर्म का ठेकेदार बताने की कुंठित मानसिकता पाल बैठे हैं। अफसोस कि सरकार इस पर गंभीर नहीं लग रही है। यह हिंसा और नफरत उसे रास आ रही है। शायद इसी हिंसा और नफरत की आग में वह अपनी सियासी रोटी सेंकते हुए और अधिक बलशाली होने के ख्वाब बुन रही है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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