मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : नाबालिग से निकाह ...वैध भी अपराध भी?

इस्लाम की बात : नाबालिग से निकाह …वैध भी अपराध भी?

सैयद सलमान
मुस्लिम विवाह के एक ताजातरीन मामले में केरल हाईकोर्ट की सिंगल बेंच का पैâसला आया है कि ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ में नाबालिगों का विवाह वैध होने के बावजूद यह पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध माना जाएगा।’ मुस्लिम पर्सनल लॉ के नियमों और ४ अलग-अलग हाईकोर्ट के पुराने पैâसलों से केरल हाईकोर्ट का ये पैâसला बिल्कुल अलग है। कोर्ट की राय में पॉक्सो एक्ट काफी सोच समझकर बनाया गया था। यह एक्ट बाल विवाह और बाल यौन शोषण के खिलाफ है। इस हिसाब से शादी होने के बाद भी किसी नाबालिग से शारीरिक संबंध बनाना कानूनन अपराध है। हालांकि आईपीसी ३७५ का एक्सेप्शन कहता है कि अगर पति १५ साल से ज्यादा की पत्नी के साथ रिलेशन बनाता है तो इसकी इजाजत है। ये एक्सेप्शन सभी धर्मों के लिए है। इससे पहले पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों के तहत १७ वर्षीय मुस्लिम लड़की की हिंदू लड़के के साथ शादी को वैध करार दिया था। इस दंपति ने हाई कोर्ट से सुरक्षा प्रदान करने की गुहार लगाई थी। तब कोर्ट ने अपने पैâसले में कहा था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक लड़की ने ‘प्यूबर्टी’ यानी यौवन जिसे १५ वर्ष माना जाता है, उस उम्र को पार कर लिया है, इसलिए वह अपने परिवार की आपत्तियों के बावजूद अपनी पसंद के युवक से शादी करने के लिए ‘स्वतंत्र’ है। इस जोड़े की कोर्ट में दलील थी कि शादी की अनुमति मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, १९३७ के तहत दी गई थी, जिसमें साफ कहा गया है कि प्यूबर्टी की उम्र और वयस्कता की उम्र समान है।
१९३७ के कानून की धारा ३ में प्रावधान है कि सभी मुस्लिम विवाह शरीयत के तहत आएंगे, भले ही इसमें कोई भी ‘रीति-रिवाज और परंपरा’ अपनाई गई हो। ऐसे मामलों में कई अदालतों के अलग-अलग पैâसले से भ्रम और विवाद की स्थिति बन रही है। आईपीसी कानून के तहत हर धर्म में पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने को बलात्कार के दायरे से बाहर रखा गया है। इसका उद्देश्य था कि पारिवारिक यानी सिविल मामलों को आपराधिक मामलों से अलग रखा जाए लेकिन हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में शादी की न्यूनतम उम्र के बारे में कानूनी स्थिति अलग-अलग है। हिंदू, बौद्ध, सिख आदि धर्म में शादी की न्यूनतम उम्र को लेकर कानून निर्धारित है, लेकिन मुस्लिम धर्म में पर्सनल लॉ की वजह से शादी की उम्र निश्चित नहीं है। इसी वजह से ही अनेक तरह के विवाद हो रहे हैं। हालांकि इस्लाम मुसलमानों को उस भूमि के नियमों का पालन करने की अनुमति देता है, जिसमें वे रहते हैं।
मुस्लिम देशों सहित अधिकांश राष्ट्र, न्यूनतम कानूनी विवाह आयु के रूप में १८ वर्ष को स्वीकार करते हैं। कुछ माता-पिता की सहमति से इससे पहले विवाह के लिए रजामंद हो जाते हैं। बाल विवाह निषेध अधिनियम २००६ के मुताबिक १८ साल से कम उम्र में शादी कानूनी रूप से अपराध है। इतना ही नहीं जबरन इस तरह की शादी कराने वाले लोग भी अपराधी हैं। हालांकि इस कानून में कोई ऐसा प्रावधान नहीं है कि यह किसी दूसरे कानून को खत्म कर देगा। इसलिए पर्सनल लॉ के तहत १५ साल में मुस्लिम लड़कियों को शादी की इजाजत मिल जाती है। जबकि पॉक्सो एक्ट २०१२ के मुताबिक १८ साल से कम उम्र की लड़कियों को नाबालिग माना जाता है। नाबालिग लड़कियों से शादी करके शारीरिक संबंध बनाना कानूनन अपराध है। यही वजह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ इस तरह के कानून के खिलाफ है। कई इस्लामिक देशों और दुनिया भर में नाबालिग से विवाह आम बात है। १८ वर्ष से कम उम्र की लड़कियों और अक्सर यौवन की उम्र से भी बहुत कम उम्र में उनकी जबरन शादी करा दी जाती है।
जहां तक विवाह की वैधता का संबंध है, इस्लाम में विवाह दो व्यक्तियों के बीच एक लिखित अनुबंध है और इस तरह के समझौते की जिम्मेदारियों और पेचीदगियों को समझने के लिए दोनों का वयस्क होना जरूरी है। एक हदीस में है कि पैगंबर मोहम्मद साहब ने एक नाबालिग लड़की को अपनी शादी को अस्वीकार करने का विकल्प दिया था, जब उन्हें सूचित किया गया कि लड़की के पिता ने लड़की की मर्जी के खिलाफ उसकी शादी तय की थी। इससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस्लाम में बाल विवाह या जबरन विवाह की कोई कानूनी वैधता नहीं है। यह निष्कर्ष एक अन्य हदीस द्वारा समर्थित है, जो सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम दोनों में पाया जाता है, जिसमें पैगंबर को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि एक विधवा या तलाकशुदा की तब तक शादी नहीं की जाएगी, जब तक वह अपनी सहमति नहीं देती है और न ही किसी कुंवारी की शादी तब तक की जा सकती है, जब तक कि उसकी सहमति नहीं मांगी जाती है।
मुस्लिम समाज न जाने क्यों खुद बाल विवाह को जईफ हदीसों के आधार पर भी जायज ठहराना चाहता है, जिसमें दावा किया गया है कि पैगंबर मोहम्मद साहब ने हजरत आयशा से तब शादी की थी, जब वह सिर्फ ९ साल की थीं। कुछ हवालों में उन्हें ६ साल का बताया जाता है। इसकी प्रामाणिकता कई कारणों से संदिग्ध है। इस मामले में बाल विवाह की अवधारणा की जड़ पर प्रहार करने वाली कुरआन की आयत ४:६ का गहराई से अध्ययन करना चाहिए जो विवाह की उम्र को बौद्धिक परिपक्वता की उम्र के बराबर करती है। यानी एक ऐसा चरण जो यौवन की उम्र के बाद में आता है। सबसे पहले, मोहम्मद साहब शारीरिक और बौद्धिक रूप से अपरिपक्व लड़की से शादी करने के लिए कुरआन के खिलाफ नहीं जा सकते। दूसरा, हजरत आयशा की उम्र का अंदाजा उनकी बहन हजरत अस्मा की उम्र से आसानी से लगाया जा सकता है जो हजरत आयशा से १० साल बड़ी थीं। हदीस संग्रह मिश्कात के लेखक ने अपनी जीवनी ‘अस्मा उर रिजाल’ में लिखा है कि हजरत अस्मा की मृत्यु ७३ हिजरी में हुई। तब वह १०० वर्ष की थीं। यह सामान्य ज्ञान है कि इस्लामिक वैâलेंडर हिजरी पैगंबर के मक्का से मदीना प्रवास के वर्ष से शुरू होता है। ऐसे में हजरत अस्मा की १०० वर्ष की आयु से मृत्यु के वर्ष हिजरी ७३ को घटाएं तो हम आसानी से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वह हिजरी पूर्व २७ वर्ष की थीं। इससे हजरत आयशा की उम्र इसी अवधि में १७ वर्ष हो जाती है। जैसा कि पैगंबर के सभी जीवनीकार इस बात से सहमत हैं कि मोहम्मद साहब ने २ हिजरी में हजरत आयशा के साथ निकाह किया, तो यह निर्णायक रूप से कहा जा सकता है कि तब उनकी उम्र १९ वर्ष थी। दुर्भाग्य यही है कि मुस्लिम समाज मोहम्मद साहब और कुरआन से ज्यादा मौलवियों पर विश्वास करने लगा है। उनकी इसी मूर्खता से इस्लाम बदनाम होता है।
विभिन्न हाईकोर्ट और केरल हाईकोर्ट के अलग-अलग आदेशों की पृष्ठभूमि में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को चिंतन करने की आवश्यकता है। ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर भी टकराव के बाद आखिर आदर्श निकाहनामा पर सहमति बनी थी। तो क्यों न कम उम्र शादियों को लेकर भी एक गाइडलाइन बनाकर मुसलमानों को जागरूक किया जाए। आने वाले दिनों में पॉक्सो एक्ट को लेकर कई शादियां खतरे में पड़ सकती हैं। जरा सी नाराजगी पर मामला पॉस्को एक्ट के दायरे में लाया जा सकता है। तो क्यों न नाबालिग विवाह को ही हतोत्साहित किया जाए। यह भी तो एक सामजिक जिम्मेदारी है। आखिर यौवन की उम्र तक पहुंचने और मानसिक रूप से विवाह की जिम्मेदारियों को निभाने में फर्क है। मुसलमानों को इस बात को गहराई से समझने की खास जरूरत है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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