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इस्लाम की बात : धर्मनिरपेक्षता और इस्लाम!

सैयद सलमान मुंबई

जहां पूरा विश्व इजरायल और फिलिस्तीन मुद्दे पर बहसबाजी में व्यस्त है, वहीं देश में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का मुद्दा गरमाया है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के चुनाव में कहीं न कहीं मूल मुद्दों से हटकर जातीय और धार्मिक मुद्दों को हवा दी जा रही है। एक विशेष पार्टी को तो इस मामले में महारत ही हासिल हो गई है। वह एक एजेंडा और नैरेटिव तय करती है और बाकी पार्टियां उसके जाल में फंस जाती हैं। जवाब देने के चक्कर में वह ध्रुवीकरण को जाने-अनजाने हवा दे बैठती हैं। हमारे देश की फिजा में यह जहर गहरे तक बैठा दिया गया है। खासकर मुस्लिम समाज इसकी चपेट में है। उसके कथित धर्मगुरु इन मुद्दों पर ऊलजुलूल बयानात देकर मामले को और भी विवादित बना देते हैं। लेकिन समझने की बात यह है कि यह देश लोकतंत्र का सबसे बड़ा संवाहक है। लोकतांत्रिक देश के सभी राज्य जनता के प्रतिनिधियों द्वारा बनाए गए कानूनों द्वारा शासित होते हैं। लोकतंत्र समाज में प्रचलित हर चीज को स्वीकार करता है। जो स्वीकार्य नहीं है, उसे अस्वीकार कर दिया जाता है। जहां धार्मिक समुदाय बहुसंख्यक है, वहां कानून में उनकी भूमिका है, लेकिन फिर भी यह धर्मनिरपेक्षता का हिस्सा है। उदाहरण के लिए, हिंदुस्थान में गाय को पवित्र माना जाता है, इसलिए उसके वध पर प्रतिबंध लगाना धर्मनिरपेक्षता के बिल्कुल खिलाफ नहीं है। लेकिन ‘गौरक्षा’ के नाम पर लोगों की हत्या करना और उन पर अत्याचार करना धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है और मानवता का अपमान है। बिलकुल उसी तरह जैसे पाकिस्तान में इस्लामिक शिक्षाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती क्योंकि वहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, लेकिन वहां अल्पसंख्यक पर बहुसंख्यक का कोई भी अत्याचार सभी बुनियादी मानवाधिकारों, लोकतंत्र, इस्लाम और धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है। यह बात अलग है कि यहां भी अल्पसंख्यक परेशान है और वहां भी।
हमारे देश की धर्मनिरपेक्षता की दूसरे देशों में मिसालें दी जाती थीं। लेकिन वह दौर अब नहीं रहा। राजनीतिक रूप से धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि चुनी हुई सरकारों का अपने नागरिकों के धार्मिक मतभेदों से कोई लेना-देना नहीं है और उसे धार्मिक मतभेदों की परवाह किए बिना सभी नागरिकों को बुनियादी मानवाधिकार प्रदान करना है। सरकारों को नागरिकों के किन्हीं भी मामलों का निर्णय करते समय किसी एक संप्रदाय या धर्म के प्रति पक्षपाती नहीं होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका मतलब धर्म के अस्तित्व को नकारना नहीं है। धर्मनिरपेक्षता प्रभावी इसलिए है, क्योंकि वह सभी को साथ लेकर चलने पर विश्वास करती है। वैसे इस्लाम और लोकतंत्र के बाद इस देश में ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द का सबसे ज्यादा दुरुपयोग होता रहा है। इन दोनों शब्दों की तुलना में धर्मनिरपेक्षता को समझना आसान है, लेकिन देश में कुछ चालबाजों के कारण इस शब्द को गलत अवधारणाओं से जोड़ दिया गया है।
न तो धर्मनिरपेक्षता इस्लाम के खिलाफ है और न ही इस्लाम धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है। धर्मनिरपेक्षता का मूल आधार समाज में दूसरों की मान्यताओं का सम्मान करना है। स्वतंत्रता के बाद, हिंदू भाइयों को बहुसंख्यक और मुसलमानों को अल्पसंख्यक का तमगा दिया गया। इसका उद्देश्य शुद्ध राजनीतिक था। लेकिन बाद में धर्म के नाम पर एक खाई पैदा की गई, जो भरने के बजाय अब और गहरी करने की कोशिश हो रही है। हालांकि, मुसलमानों को अपने हमवतन भाइयों के साथ वैâसे रहना चाहिए, यह अपने पैगंबर से सीखना चाहिए। पैगंबर मोहम्मद साहब ने सामूहिकता और समावेशिता पर अधिक जोर दिया था। उदाहरण के लिए, मोहम्मद साहब ने मदीना की संधि और राज्य के स्थापित कानून के अनुसार, यहूदियों और ईसाइयों को भी मुसलमानों की ही तरह सभी बुनियादी अधिकार दिए थे।
यह केवल हिंदू बहुल हिंदुस्थान की बात नहीं है, बल्कि यही बात मुस्लिम देशों पर भी लागू होती है। इस्लाम और धर्मनिरपेक्षता में कोई अंतर नहीं है, बल्कि इस्लाम सभी मुसलमानों को धर्मनिरपेक्षता सिखाता है। धर्मनिरपेक्षता का इस्लाम के साथ स्वाभाविक संबंध है, क्योंकि दोनों ही सभी मानवाधिकारों और जरूरतों को स्वीकार करते हैं। जहां भी मुसलमानों का शासन है, उनके लिए न्याय, समानता और नागरिकों के आत्मसम्मान के मूल्यों को अपनाना और भेदभाव की भावना को उखाड़ फेंकना अनिवार्य है। पवित्र कुरआन ने खुद धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में मार्गदर्शन करते हुए यह आदेश दिया है कि ‘धर्म के मामले में कोई जबरदस्ती नहीं’ और ‘तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए और मेरा धर्म मेरे लिए।’ अर्थात, इस्लाम और धर्मनिरपेक्षता प्रेम और सद्भाव से बंधे हैं और कट्टरता से नफरत करते हैं। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इस्लाम में विविधता और सहिष्णुता का सार निहित है। काश कट्टरपंथी सोच के मुसलमान इस बात को समझ पाते, ताकि हमवतन भाइयों को किसी प्रकार की गलतफहमी न होने पाती।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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