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इस्लाम की बात : सरापा मोम हो या संग हो जा…

सैयद सलमान
मुंबई

यह साल आम चुनाव का साल है। इस वर्ष की शुरुआत से ही राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का मुद्दा ही चारों तरफ छाया हुआ है। राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन करते हुए सभी दल अपनी सुविधानुसार इस विषय पर अपनी भूमिका तय कर रहे हैं। अगर यह कहा जाए कि भाजपा ने इस पूरे कार्यक्रम को हाईजैक कर लिया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। राम मंदिर आंदोलन के दौरान के सभी प्रमुख चेहरे, भाजपा के सहयोगी संगठन नेपथ्य में चले गए हैं या शायद कर दिए गए हैं। आखिर चुनावी वैतरणी पार करने के लिए फ्रंट फुट पर आकर खेलना जो है। बस एक व्यक्ति के महिमामंडन में पूरी मशीनरी लगी हुई है। खैर, यह तो हुई राजनीतिक बिसात। लेकिन इसका सामाजिक असर मुस्लिम समाज पर डालने, उन्हें शर्मिंदा करने और उन्हें आहत करने के लिए किया जा रहा है। मुस्लिम समाज के भी कुछ कथित रहनुमा आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार, राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा २२ जनवरी को होनी है। ऐसे ही लोगों के बयानों से घबराकर अधिकांश मुस्लिम कर्मचारियों ने १९ से २६ जनवरी तक छुट्टियां ले ली हैं। देशभर के लगभग सभी मुसलमानों ने अपनी कई यात्रा योजनाएं रद्द कर दी हैं। कई व्हॉट्सऐप ग्रुप और सोशल मीडिया के बाकी प्लेटफॉर्म पर मुसलमानों को क्या करें और क्या न करें का निर्देश देते हुए कई लोग मिल जाएंगे। मानो किसी भी देश को सामूहिक रूप से अल्पसंख्यकों के खिलाफ इतना असुरक्षित, हिंसक पहले कभी नहीं देखा गया हो। इस माहौल के बजाय हिंदू-मुस्लिम नेता अगर लोगों को दूसरे धर्मों के साथ सांप्रदायिक सद्भाव से रहने की सलाह देते तो ज्यादा अच्छा होता। इस बीच, राम मंदिर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक केस लड़नेवाले इकबाल अंसारी खुशी-खुशी अयोध्या में रह रहे हैं। उन्होंने मंदिर की प्रतिकृति उपहार में दी है और २२ जनवरी के समारोह में शामिल होने के लिए उत्सुक हैं। यानी आम मुसलमान इस लड़ाई से खुद को दूर रखना चाहता है।
भाजपा एक तरफ राम मंदिर का श्रेय लेने की होड़ में है तो दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में मुसलमानों को साधने की कोशिश भी कर रही है। साल २००८-२००९ में यूपीए सरकार ने मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने के लिए मदरसों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की एसपीक्यूईएम नामक एक योजना शुरू की थी। इसके तहत मदरसों में गणित, विज्ञान, अंग्रेजी और अन्य सामाजिक अध्ययन पढ़ानेवाले शिक्षकों की नियुक्ति की गई थी। योजना के मुताबिक, केंद्र प्रति शिक्षक १२ हजार रुपए और राज्य ३ हजार रुपए देता था। पहले २०१७-१८ में फंडिंग बंद की गई और अब पूरी योजना को ही बंद कर दिया गया है यानी लाखों शिक्षकों की नौकरी खतरे में है। मोदी जी ने खुद कहा था कि मुझे ऐसा छात्र चाहिए, जिसके एक हाथ में कुरआन हो और दूसरे हाथ में कंप्यूटर हो। फिर यह कैसा निर्णय है? यानी सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास महज एक जुमला है। इस तरह के निर्णय से तो यही साबित होता है कि सरकार मुसलमानों का विकास नहीं चाहती उन्हें और नीचे धकेलना चाहती है। वह उनकी हालत दलितों से भी बदतर करना चाहते हैं, जैसा की सच्चर कमिटी में पहले ही दर्ज है। हालांकि, दूसरी तरफ सरकार में शामिल भाजपा मुसलमानों को मायाजाल में भी फंसाए रखना चाहती है। पिछले दिनों ‘शुक्रिया मोदी भाईजान’ अभियान के जरिए मुस्लिम बहुल इलाकों में विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस अभियान के जरिए मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों पर मोदी सरकार के लिए गए पैâसले की जानकारी दी जा रही है। इस तैयारी के पीछे का मकसद साफ है। कौमी चौपाल के जरिए भी वह अपनी मुस्लिम विरोधी छवि को तोड़ने की कोशिश कर रही है। पार्टी की नजर यूपी में करीब २० फीसदी मुस्लिम वोट बैंक पर है। वह मुस्लिम बहुल इलाकों में पहुंचकर मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए गांवों में कौमी चौपाल लगाकर उनकी समस्याएं सुनने की कोशिश करेगी। यही नहीं, आगामी चुनाव में यूपी की ७५ से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही भाजपा का पसमांदा सम्मेलन, सूफी सम्मेलन और कौमी चौपाल मुसलमानों को लुभाने का ही प्रयास है। कौमी चौपाल लगाकर मुसलमानों को बताया जाएगा कि राम मंदिर पर पैâसला सुप्रीम कोर्ट ने दिया है, सरकार बस उस पर अमल कर रही है, जबकि हिंदू भाइयों के बीच राम मंदिर का पूरा श्रेय लिया जा रहा है। यह दोमुंहापन नहीं तो और क्या है?
भाजपा की ऐसी भूमिका के लिए ही शायद किसी शायर ने कहा है,
दो-रंगी छोड़ दे यक-रंग हो जा,
सरापा मोम हो या संग हो जा..।।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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