मुख्यपृष्ठस्तंभमुद्दा : फ्यूल कैप का रंग बचा सकता है करोड़ों का फ्यूल!

मुद्दा : फ्यूल कैप का रंग बचा सकता है करोड़ों का फ्यूल!

  • अनिल तिवारी

अगर मैं आपसे कहूं कि आपकी कार के फ्यूल कैप का रंग, कार के ईंधन को बर्बाद होने से बचा सकता है तो आप यकीन नहीं करेंगे, परंतु यह सच्चाई है।
असल में, हमारे देश में अधिकांश वाहन मुख्यत: डीजल और पेट्रोल से चलते हैं। लिहाजा, अधिकांश फ्यूल स्टेशनों पर दोनों ही ईंधन उपलब्ध होते हैं। कई बार होता यह है कि किसी वाहन विशेष में गलती से गलत ईंधन भर दिया जाता है। अर्थात, पेट्रोल गाड़ी में डीजल या फिर डीजल की गाड़ी में पेट्रोल। यहीं से होती है समस्या की शुरुआत। क्योंकि इन दोनों ही ईंधनों के रासायनिक गुणधर्म अलग-अलग होते हैं, जो विपरीत वेरिएंट के इंजिन में जाते ही उसे ब्लॉक कर देते हैं। तब मत्थे आता है हजारों-लाखों रुपए का अनपेक्षित खर्च, बेइंतहा समय की बर्बादी और लड़ाई-झगड़े की नौबत। यदि किसी तरह दूषित-मिश्रित ईंधन को इंजिन तक पहुंचने से रोक भी लिया जाता है, तब भी ईंधन टंकी से उस दूषित ईंधन को निकालने, टंकी को साफ करने व पूरी ईंधन प्रणाली को दोषमुक्त कर, दूषित ईंधन को फेंकने पर हजारों-लाखों रुपए की बर्बादी होती है। हर दिन देश में ऐसे तमाम हादसे होते हैं।
दरअसल, आज के वक्त में तमाम ऑटो मेकर्स, वाहनों के एक ही मॉडल-डिजाइन को अलग-अलग फ्यूल वेरिएंट में उतारते हैं, जिससे फ्यूल स्टेशनों पर वाहन के फ्यूल वेरिएंट को लेकर अक्सर कन्फ्यूजन रहता है। इस कन्फ्यूजन से बचने के लिए फ्यूल पंपों की नोब तो अलग-अलग रंगों की बनी होती हैं पर वाहनों के फ्यूल को लेकर कोई कलर स्पेसिफिकेशन नहीं होता। फ्यूल मशीन में डीजल के लिए नीले रंग की नोब तो पेट्रोल के लिए हरे रंग की नोब इस्तेमाल होती है। यदि इसी तर्ज पर पेट्रोल और डीजल वाहनों की टंकी पर लगी फ्यूल कैप का रंग भी (पेट्रोल के लिए हरा और डीजल के लिए नीला) निर्धारित कर दिया जाए तो फ्यूल कन्फ्यूजन की समस्या से लगभग छुटकारा ही मिल सकता है। साथ ही कर्मचारी की जिम्मेदारी भी तय हो सकती है।
केंद्र सरकार को चाहिए कि वह इस दिशा में एक छोटा-सा आदेश जारी कर ऑटो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को फ्यूल कैप के रंगों को निर्धारित करने का आदेश दे। यदि ऐसा होता है तो महज कुछ ही दिनों में, बिना किसी अतिरिक्त खर्च या व्यवस्था बदलाव के देश का करोड़ों रुपयों का फ्यूल बच सकता है। ऑटो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए फ्यूल कैप स्पेसिफिकेशन अनिवार्य हो जाए तो ईंधन रिफिलिंग के वक्त वाहन विशेष का फ्यूल स्पेसिफिकेशन पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी और ईंधन की बर्बादी, इंजिन के नुकसान, आए दिन के लड़ाई-झगड़ों व कानूनी दांवपेचों से मुक्ति के अलावा करोड़ों रुपयों की विदेशी मुद्रा भी बचाई जा सकेगी।

मुद्दा
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