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मुश्किल है डगर!

कोरोना की पहली लहर के ‘लॉकडाउन’ के दौरान आरंभिक दिनों में मुंबई के ६० लाख से ज्यादा यूपी और बिहारवासियों में से अंदाजन २० लाख ट्रेनों व दूसरे वाहनों से, या पैदल ही गांव-देस लौटे, पर ‘अनलॉक’ शुरू होते ही उनके कदम वापस होने लगे। उनके मुंबई वापस लौटने के पीछे रोजी-रोटी की मजबूरियां तो थीं ही, मुलुक में अपनों का ही बेगाना व्यवहार भी कम जिम्मेदार नहीं था। पहली बार था, जब शहरों से गांवों की ओर पलायन हुआ था। देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नई उम्मीदें बनी थीं। गांव लौटे बाकी कुशल और अकुशल श्रमिकों ने स्थिति पूरी तरह काबू होने तक गांवों में ही ठहरकर खेती-बाड़ी या दूसरे काम-धंधे करने का मन बना लिया था। पर, गांवों की व्यावहारिक दिक्कतों ने जल्द ही उनमें से ज्यादातर के कदम भी लौटा दिए। इनका बड़ा कारण था इन गांवों की खुशहाली की मुंबई की मनीआर्डर इकोनॉमी पर ‌निर्भरता।
कोरोना की दूसरी लहर पर महाराष्ट्र में संचारबंदी के रूप में अब जब से नए सिरे से पाबंदियां लगीं, उत्तर हिंदुस्थान की ओर पलायन का सिलसिला फिर शुरू हो गया है। मुंबई से जानेवालों को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में पिछले दिनों प्रकाशित एक अखिल भारतीय सर्वेक्षण पर नजर जरूर डालनी चाहिए। सर्वेक्षण के अनुसार, पलायन करनेवाले ऐसे जो पुरुष कोराना के पहले हमले के बाद बीते वर्ष शहरी कार्यस्थलों पर वापस लौटे, वापसी पर उन्होंने उन लोगों की तुलना में पांच गुना ज्यादा कमाई की, जो मूल जगहों पर ही बने रहे। लौटनेवालों ने जल्द ही अपनी कमाई की पूर्वस्थिति ९० फीसदी तक हासिल कर ली। जो लोग मूल स्थानों से नहीं लौटे, उनकी आमदनी पूर्व कमाई की २३ प्रतिशत तक ही सीमित रह गई। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के कार्यस्थलों पर लौटने का प्रतिशत कम था और गृहस्थल पर उनकी कमाई तो और भी कम। इसकी वजह थी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कमाई के सीमित अवसर। शहरी क्षेत्रों में लौटनेवालों के पास तो और भी कम अवसर थे। इस वर्ष मार्च में देश में बेरोजगारी की दर ६.५ प्रतिशत रही, कोरोना की दूसरी लहर के बाद, जिसके अब आठ प्रतिशत से ऊपर जाने की आशंका है। मजदूरों के निरंतर पलायन से श्रम बाजार की हालत पतली हो गई। इससे सक्रिय श्रम शक्ति कम होती जा रही है। एलपीआर (लेबर पार्टिसिपेशन रेट) गिरने लगा है। मुंबई छोड़कर जाने वालों को इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि कहीं स्थिति को और विकट बनाने में उनका भी दोष तो नहीं?
लॉकडाउन के पहले चरण की तरह कुशल-अकुशल श्रमिकों के पलायन का असर मुंबई के उद्योग-धंधों व अन्य क्षेत्रों पर अब फिर से दिखने लगा है। ७५ फीसदी टैक्सी चालकों के गांव चले जाने से परिवहन पर इसका असर पड़ा है। अब जल्द ही यह असर मुंबई के सामान्य जन-जीवन पर भी दिखने लगेगा, क्योंकि मुंबई के दूध वालों व सब्जी-फलवालों के साथ मोची, धोबी व लांड्रीवाले, फरसाणवाले, सैलूनवाले, हमाल व ड्रॉइवर, वॉचमैन, छोटे दुकानदार और मंदिरों के पुजारी, श्रमजीवी वर्ग के अंदाजन १० लाख लोग भी चले गए हैं या जाने की राह पर हैं। इनमें ज्यादातर उत्तर हिंदुस्थान के हैं। यही हालत देश के लगभग सभी बड़े शहरों में है।
मौसम गांव जाने का
कोरोना की इस सूनामी के शुरुआती दिनों में मध्य और पश्चिम रेल द्वारा उत्तर हिंदुस्थान के लिए चलाई ५० से अधिक सामान्य और समर स्पेशल ट्रेनों में रोजाना एक लाख से अधिक लोग मुंबई से मूल स्थानों के लिए रवाना हुए। हालांकि इन सबों को कोरोनाजन्य स्थितियों के कारण पलायन करनेवाले प्रवासियों में गिनना ठीक नहीं होगा। गर्मी के मौसम में इन दिनों मुंबई में उत्तर हिंदुस्थान के लिए रवानगी सामान्य बात है। इस बार यह भीड़ ज्यादा इसलिए लगी, क्योंकि यही वक्त उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव और हरिद्वार के कुंभ का भी था। गत वर्ष लॉकडाउन की तकलीफों से आजिज इनमें बहुतों ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रवासियों को दिए राहत पैकेज की भी परवाह नहीं की। जानेवालों की भीड़ को देखते हुए रेलवे ने मुंबई से ट्रेनों की संख्या बढ़ाई। इसके विपरीत मुंबई की ओर आनेवाली ट्रेनों में भीड़ आम तौर पर काफी कम देखी गई। जहां देश के अन्य भागों की ट्रेनों में यात्री संख्या घटकर ३० प्रतिशत रह गई और कुछ ट्रेनें रद्द भी करनी पड़ीं, उत्तर प्रदेश व बिहार, आदि राज्यों की ट्रेनें खचाखच भर कर जाती रहीं। निगेटिव आरटी-पीसीआर रिपोर्ट की अनिवार्यता और प्रतीक्षा सूची के यात्रियों को अनुमति नहीं देने के बावजूद।
महाराष्ट्र सरकार ने हालांकि इन लोगों को राहत देने के लिए कई फौरी और स्थाई उपाय किए हैं। इनमें पहले लॉकडाउन के बाद प्रदेश से जानेवाले उन प्रवासियों के रद्द राशन कार्ड पर राशन की बहाली शामिल है। कई प्रवासियों के पास आज भी राशन कार्ड नहीं हैं। वाशी की एक डेनिम पैâक्टरी में काम करनेवाले समीर शेख भी इन्हीं लोगों में से हैं। बांदा का यह निवासी बताता है, ‘दो महीनों से घर पैसे नहीं भेज पाया हूं। रिश्तेदारों से उधार मांगकर काम चला रहा हूं। गांव लौटना चाहता हूं, पर टिकट के पैसे भी नहीं हैं।’
त्रासदी प्रवासी मजदूरों की
रोजगार-धंधों के लिए दूसरे राज्यों में गए लोगों की दुर्दशा वैâसी है, इसकी बानगी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की हालिया रिपोर्ट में देखी जा सकती है। रिपोर्ट के अनुसार यूपी, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिसा, असम और पश्चिम बंगाल से आनेवाले प्रवासी मजदूरों को दूसरे राज्यों में खाद्य, स्वास्थ्य, ‌शिक्षा, सामाजिक, सुरक्षा, पेयजल, आवास, साफ-सफाई सरीखी मूलभूत सुविधाओं तक के लिए तरसना पड़ता है और ‘बाहरी’ समझकर उनसे दोयम दर्जे के नागरिक के बतौर व्यवहार किया जाता है। इनमें ज्यादातर मजदूर निर्माण, भारी उद्योग, परिवहन जैसे जोखिमवाले धंधों में लगे हैं, जो भारी जोखिमवाले हैं।
प्रवासी श्रमिकों की डगर कोरोना की पहली लहर की अपेक्षा इस बार कठिन है। पिछली बार जब वे रास्तों में तरह-तरह की तकलीफें झेलते हुए मुंबई से गांव-देस पहुंचे थे, वहां कोरोना से हालत संभले हुए थे। केवल क्वॉरंटीन होने से उनका काम चल गया था। पर इस बार वहां हालत मुंबई के मुकाबले ज्यादा बेकाबू हैं। ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि मुंबई या दूसरी जगहों से चले कई प्रवासी मजदूर बगैर क्वॉरंटीन हुए ठिकानों पर पहुंच रहे हैं। ऐसे में वहां के प्रशासन ने जल्दी ही निवारक कदम नहीं उठाए तो वे ‘सुपर स्प्रेडर’ बन जाएंगे और तब गांवों में क्या गुजरेगी, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। यूपी और बिहार जैसे प्रांतों की अर्थव्यवस्था कोरोना की पहली लहर के बाद लौटे प्रवासियों के बोझ से पहले ही डगमगा रही है। कोरोना की इस सूनामी में वहां मौजूदा स्थिति को लेकर जो खबरें आ रही हैं, वे आश्वस्त कतई नहीं करतीं।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)