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…यहां पढ़ना मना है! … ऑनलाइन पढ़ाई पर पहरा!

•  और भी ज्यादा क्रूर हुआ तालिबान
•  बंदूक की नोक पर हक के लिए लड़ रही महिलाएं

मनमोहन सिंह

रात हो गई है… शहर में सन्नाटा- सा पसरा हुआ है… अंधेरे कमरे में मोबाइल पर एक लड़की ऑनलाइन पढ़ाई कर रही है, मोबाइल उसके भाई का है। भाई का इसलिए यदि अगर कोई ट्रेस कर भी ले तो पता नहीं चलेगा कोई लड़की पढ़ाई कर रही थी। ऐसी एक नहीं, लड़कियों की लंबी फेहरिस्त है, जो दिन ढलने के बाद चोरी-छुपे अंधेरे में अपने पिता अपने भाई यानी किसी मर्द के मोबाइल के जरिए अपनी पढ़ाई कर रही होती हैं।
यह अफगानिस्तान के किसी भी शहर की तस्वीर हो सकती है। हालांकि, कुछ बड़े शहरों में लड़कियां थोड़ी-सी छूट के साथ दिन में भी लैपटाप, कंप्यूटर के जरिए ऑनलाइन पढ़ाई कर रही हैं। लेकिन एक मुसीबत है जो सभी जगह परेशानी का सबब बनती है वह है इंटरनेट और बिजली की दस्तेयाबी।
पिछले साल दिसंबर में तालिबानी फरमान के बाद महिलाओं के कॉलेज और यूनिवर्सिटी गन पॉइंट्स पर बंद कर दिए गए। इस देश की लड़कियों और औरतों के लिए पढ़ाई का एकमात्र जो जरिया बचा है वह है वर्चुअल ऑनलाइन क्लासेस का। तालिबान ने इंटरनेट पर प्रतिबंध इसलिए नहीं लगाया है, क्योंकि इसका इस्तेमाल वह सोशल मीडिया के जरिए अपने फरमान जारी करने के लिए करता है। यही इंटरनेट लड़कियों के लिए अलादीन का चिराग बना हुआ है।
बार-बार यहां की महिलाओं और लड़कियों ने यूनिवर्सिटी और कॉलेज फिर से खोलने की मांग की है लेकिन तालिबान अपने फरमान को लेकर अडिग है। हां, इतना जरूर है कि तालिबान ने लड़कियों को घर पर जातिय तौर पर पढ़ने की इजाजत दी है। यूएसए की यूनिवर्सिटी ऑफ द पीपल के अलावा फ्यूचरलर्न, हेरात स्कूल और एजुकेशन ब्रिज जैसे कई यूनिवर्सिटी और शिक्षा संस्थान अफगान छात्रों, विशेषकर महिलाओं को उनकी शिक्षा जारी रखने में मदद कर रहे हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ द पीपल के प्रेसिडेंट शाई रेशेफ मानते हैं कि अफगानिस्तान के छात्रों का भविष्य वास्तव में धूमिल है। वह शिक्षा पर तालिबान के प्रतिबंधों को बेहद अदूरदर्शी और असंवेदनशील करार देते हैं। रेशेफ का कहना है कि दिसंबर में प्रतिबंध की घोषणा के बाद से उनके यूनिवर्सिटी को ६,००० से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं, जबकि पूरे पिछले वर्ष में यह संख्या १०,००० थी। यूनिवर्सिटी के पास सभी के लिए पर्याप्त स्कोलरशिप नहीं है।
रोशनी ए उम्मीद- एक ऑनलाइन इंस्टिट्यूट जो अफगानिस्तान में लड़कियों को ऑनलाइन शिक्षा देता है, के चीफ लाइक जिरैक का कहना है कि स्कूली शिक्षा पर तालिबान के प्रतिबंध ने लाखों लड़कियों से उनकी शिक्षा का अधिकार छीन लिया है, जिससे वे गरीबी और निराशा के चक्र में फंस गई हैं। सीखने और बढ़ने के अवसर से वंचित इन लड़कियों को कम उम्र में शादी के लिए मजबूर किए जाने, इनके हिंसा का शिकार हो जाने का खतरा है। यह प्रतिबंध सिर्फ उनके मौलिक अधिकारों पर हमला नहीं है बल्कि अफगानिस्तान के भविष्य के लिए एक त्रासदी है।

ऑनलाइन पढ़ाई के लिए सबसे जरूरी है बिजली और इंटरनेट। अफगानिस्तान में, जहां प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद जो २०२० में ५१६ डॉलर था, २०२१ में गिरकर ३६८ डॉलर हो गया और अब और भी कम होने की संभावना है, जहां ९७ फीसदी आबादी गरीबी रेखा के भीतर है, उनके लिए ७ डॉलर का इंटरनेट डेटा पैकेज बहुत खर्चीला है। ऑनलाइन पढ़ाई में लड़कियों और महिलाओं को बिजली कटौती से लेकर बेहद धीमी इंटरनेट स्पीड जैसी कई समस्याओं से जूझना पड़ता है, कंप्यूटर और वाईफाई की तो बात ही छोड़ दें। यह बात वाकई काबिले तारीफ है कि तालिबानी गनों की नोक पर रहते हुए भी अफगानिस्तान में महिलाएं और लड़कियां पढ़ाई को लेकर हर दिन अपनी लड़ाई लड़ रही हैं। आमीन।

 

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