जब दे मेट

मनमोहन सिंह

भाग-६

एन्ना को उसका शहर याद आया। वह उसमें खो गई थी और उसे नींद आ गई। पूरा दिन उसका ब़हुत व्यस्त गुजरा था। अचानक शोर से फिर उसकी नींद टूट गई। उसका सेल फोन बज रहा था। साथ में डोर बेल भी। दोनों की आवाज से उसकी नींद टूट गई। उसने देखा रात के २ बज रहे थे। उसे बड़ी हैरानी हुई, इतनी रात को कौन आ सकता है? उसने सेल फोन उठाया, नंबर देखा। नंबर उसके लिए अनजान था। कौन हो सकता है रात के दो बजे! सेल फोन फिर बजने लगा। उसने बेमन से सेल फोन कान से लगाते हुए हल्के स्वर में पूछा, `कौन…?’
`अरे कब से डोर बेल बजा रहे हैं… दरवाजा क्यों नहीं खोल रही हो? नहीं तो कम से कम फोन तो उठा लिया होता, कितना परेशान हूं मैं। अब दरवाजा खोलो तुरंत।’
यह आवाज उसे कुछ-कुछ पहचानी सी लग रही थी। एक बार उसने सोचा कि वह दरवाजा खोले या नहीं! फिर वह उठी उसने हल्के से दरवाजा खोल दिया। उसके मुंह से बेसाख्ता से निकला `ओ बोशे मी…वई !’ उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। एक बार फिर दोहराया `वई!’
ओ या ईट्स मी `या रूहे’
दोनों को ही पता नहीं चला कि कब दोनों एक दूसरे की बाहों में समा गए थे। काफी समय तक दोनों उसी अंदाज में रहे। उनके लिए जैसे वक्त ठहर गया था। `अब बस भी करो राशाद एन्ना उर्फ मेरे रोमियो जूलियट… कुछ तो शर्म करो हम भी यहां पर हैं।’ इस शोख भरी आवाज को सुनकर दोनों एक झटके से अलग हो गए। एक्रिन हंसते हुए भीतर आ रही थी। `एक्रिन तुम?’ अन्ना ने पूछा।
`माय डियर जूलियट तुम्हारा रोमियो तुम्हारे पास जादू से नहीं आया… उसे मैं लेकर आई। समझी आप? बड़ी भूख लगी है, कुछ खाने को मिलेगा? उसने पूछा।
हां-हां क्यों नहीं। तुम बैठो तुम दोनों बैठो मैं कॉफी लाती हूं।
मेरे लिए `पिस्मनिया’ कैटरीना हंसते हुए देखा और आज तो बनता ही है।
पिस्मनिया…फ्लॉस हलवा सही कहा न? राशन ने पूछा।
हां, बिल्कुल सही कहा तुमने। हमारी अन्ना को यह बहुत पसंद है और उसके फ्रिज में होगा जरूर उसने कहा।
अन्ना पलक झपकते कॉफी और पिस्मनिया ले आई। अन्ना ने कॉफी का घूंट पीते हुए पूछा, तुम अचानक क्यों चले गए थे और यहां पहुंचे तो वैâसे? तुम तो कुछ १०-१५ दिन के बाद आने वाले थे।
राशाद ने हंसते हुए कहा कि सभी एक ही साथ पूछ लोगी। इसके बाद राशाद ने बताया कि कैसे अलेप्पो के एक मामले में वह गलती से फंस गया था और इस सिलसिले में उसे वहां पर बुलाया गया था। इसके अलावा वह सीरिया के जिस ह्यूमन राइट ऑर्गनाईजेशन के साथ जुड़ा हुआ है, ऑर्गनाईजेशन के एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में भी उसे भाग लेना था और जहां तक रही मेरे जल्दी आने की बात, तो जब तुम मुझे ढूंढ़ती हुई `रूम ४१’ पहुंची और वहां से मेरे घर पर तो मुझे जोबान का फोन आया था। उसने मुझसे तुम्हारी हालत बताई और मुझे रहा नहीं गया…’
`…और अब जनाब तुम्हारे सामने हैं’ राशाद की बात को काटते हुए एक्रिन ने उसका वाक्य पूरा किया। `अब मैं चलती हूं’ उसने जोड़ा। `पागल हो गई हो क्या इतनी रात को कहां जाओगी?’ एन्ना ने नाराजगी जताते हुए कहा। राशाद ने उसकी हां में हां मिलाते हुए उसे नहीं जाने के लिए कहा।
`ठीक है मैं एक शर्त पर नहीं जाती तुम कोई गीत गाओ…. मेरे लिए नहीं एन्ना के लिए। अरे तुम भी रिक्वेस्ट करो एन्ना।’ एक्रिन ने हंसते हुए कहा। एन्ना शरमा गई।
आज मैं कोई गीत नहीं, बल्कि एक कविता सुनाऊंगा तुम्हें सीरिया की मेरे देश की मोहब्बत की इसे लिखा है निजार कब्बानी ने।
सुनो…
मेरी रूह, मैं तुम्हारे दूसरे आशिकों जैसा नहीं हूं
यदि दूसरा दे तुम्हें एक बादल
मैं तुम्हें देता हूँ बारिश
यदि वह दे तुम्हें एक लालटेन, मैं
दूँगा तुम्हें चाँद
यदि वह देगा तुम्हें एक डाली
मैं दूंगा तुम्हें पेड़
और अगर दूसरा तुम्हें देता है एक जहाज
मैं दूंगा तुम्हें सफर
राशाद अपने तरन्नुम में गाए जा रहा था। अन्ना उसकी तरफ लगातार अब अपलक देखे जा रही थी। उनींदी आंखों से। वह चुपके से उठकर उसके बगल में आकर बैठ गई। उसने उसके गोद में अपना सिर रख लिया। राशाद उसके बालों को सहलाने लगा। उसे लग रहा था जैसे यह पल सदियों तक इसी तरह स्थिर रहे। एक्रिन को नींद आ गई थी सुनते-सुनते।

(क्रमश:)

अन्य समाचार