मुख्यपृष्ठस्तंभगुड़, खांड़ और मिठका चिनगा

गुड़, खांड़ और मिठका चिनगा

पंकज तिवारी

काहें बिसरा गांव

कमला फुआ शाम को ही घरे-घरे खबर कर आई थीं कि सबेरे ऊंख कटेगा। जिसको भी अगाव चाहिए ऊंख छोलने खेत पर आ जाना। पिछली बार खूब ओरहन था लोगों का कि फुआ हमको भी बताना चाहिए था। गोरू खातिर हरियर मिलवन का जुगाड़ तो हो जाता। सबेर हुआ झूलन ददा ऊंख के खेत में पहुंच गए। दादी और कमला फुआ अभी पीछे थीं बस आ ही रही थीं। ददा का मन खेत में घुसने को तो होता था पर ओस देखकर हिम्मत नहीं पड़ रही थी। खड़े-खड़े आगा-पीछा कर ही रहे थे कि निगाह सुरुज देव पर चली गई। एकदम लाल-लाल फल की भांति खिल रहे थे। आसमान बिल्कुल साफ नीली टाठी की भांति चमक रहा था। चमक तो ददा की आंखें भी रही थीं कारण आज ऊंख पेरने के बाद गुड़ बनाना था और खिचड़ी का दिन भी कपारे पर था। लोग गुड़-खांड़ खातिर टूट पड़ेंगे, खूब बिक्री होगी। हर साल खिचड़ी से करीब महीने भर पहले ही फुआ आ जाती हैं। साथ में लगकर खिचड़ी की तैयारी करवाने के बाद खुद ही अपनी गठरी बांधकर ले जाती हैं।
ऊंख की खेती में मेहनत इतना है कि लोग अब खेती ही छोड़ दिए हैं। अकेले झूलन ददा सम्हारे हैं पूरे गांव में। मेहनत तो खैर सबमें ही है पर मन है गांव वालों का, भ्रम से भर गया है सो गांव के बच्चे ऊंख चुहने को तरस गए हैं। हालांकि, जो भी मांगा है ददा किसी को भी ना नहीं करते हैं फिर भी हर घर ऊंख बोने का जो मजा था वो अब कहां। ददा जैसे ही खेत की तरफ बढ़े कि पों… मोटका सांड़ चिल्ला उठा। ददा ठिठके, फिर झटके में उसको भगाने के लिए दौड़ पड़े। पल भर में ढेला मारते हुए तीन-चार खेत डका आए। सांड़ एक-दो बार ददा की तरफ झुका भी पर ददा डहपट थे। भगा ही दिए। वापस खेत के पास पहुंचने से पहले ही पनही और ठुगुनी के नीचे तक धोती भीज गई थी। ददा अब बिना सोचे ही सीधे घुस गए खेत में। फुआ और दादी भी आ गई थीं। ददा फटाफट ऊंख काटकर गिराए जा रहे थे, बाकी अगाव और सूखी पत्ती अलग करके रखने का काम दुनौ जने करे जा रहे थे।
‘बिट्टी केहु के बोलाए नाइ रहू का अगउआ बरेऽ?’
‘बोलाए तऽ रहे भउजी, अब नाइ आइन तऽ हम का करीऽ।’
‘अरे, हम सब आइ गए हे ननदों, परेशान जिनि हो रानी।’ कलुआइन चाची बोल पड़ीं जो अभी-अभी पांच-छह जने के साथ खेत में पहुंच गई थीं।
सभी लोग एक साथ ऊंख की छोलाई में जुट गए। देखते ही देखते कराहे भर का काम हो गया। भर्र… लेड़ियहवा ददा के सामने से इतना जोर से भागा कि बेचारे पीछे धड़ाम से गिर पड़े। ‘अरे, का भऽ हो भैया’, कहते हुए पूâआ झट से पहुंच गर्इं। सभी डर गए। तब तक दूसरा भी भागा। अब लोगों ने देख लिया कि ‘हां, सियार ही है।’ जिउ में जिउ हुआ।
ददा और फुआ ऊंख को बोझा के रूप में बांधने लगे और ददा बारी-बारी ढोकर दुआरे पहुँचाने लगे। चाची लोग अपने-अपने गोरू भरे के अगाव इकट्ठा करने में लगी हुई थीं। सूखी पत्तियां छान बनाने के काम आती थीं जो गर्मियों में खूब आनंद दायक होती थी। कई-कई साल तक छान टस से मस नहीं होती थी।
कच्ची मिट्टी से बनी दीवार, दीवार में बना गंउखा और छान गजब की शान थी। छान में लटकी जुगुर-जुगुर जलती लालटेन और खटिया, मचिया पे बैठे लोग बड़ा ही मजेवाला दिन होता था। बंसवारी, गोरुवारी, घूर सब अपने-अपने जगह विशेष थे और सबका अपना-अपना महत्व होता था।
ददा अब चरखी के पास बैठकर ऊंख लगाए जा रहे हैं और चरखी में नधे बरधे गोल-गोल घूमे जा रहे हैं। बेचारे चाहकर भी कुछ खा नहीं पा रहे हैं कारण मुंह में खोंच बंधा हुआ है। बच्चे रस के लालच में आस-पास मंडराने लगे हैं। शाम तक पनुआ तथा चिनगा भी मिलने का उम्मीद बढ़ गई है, महक पूरे गांव तक फैल उठेगी।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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