मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिजहांआरा ने लगाया रक्तदान में शतक

जहांआरा ने लगाया रक्तदान में शतक

– जात-पांत न देखा मजहब, अनजानों की जान बचाने के लिए सौ बार दे डाला खून

विक्रम सिंह / सुल्तानपुर

नाम-जहांआरा
उम्र-५४ वर्ष
पदनाम-डिप्टी कमांडेंट (होमगार्ड्स)

…ये एक संक्षिप्त परिचय है उस वीर महिला का , जिसकी पहचान है ‘रक्तदान’। १८ वर्ष की उम्र से इसने ये सिलसिला शुरू किया। खून की कमी से जूझ रही अपनी वृद्धा मां के कूल्हे की सर्जरी की खातिर जरूरी अपने रक्त निकलवाने का।…और फिर साढ़े तीन दशकों से लगातार चल रहा ये सिलसिला मुहिम में परिवर्तित हो गया। आज वे अपनी ‘वर्दी वाली’ रौबीली सरकारी सेवा के लिए कम, खून देने वाली महिला के रूप में ज्यादा मशहूर हैं। यूपी होमगार्ड्स की इस डिप्टी कमांडेंट जहांआरा ने गत दिवस रक्तदान का शतक पूरा कर कीर्तिमान गढ़ डाला है।
बता दें कि मूलतः उत्तराखंड राज्य के एक छोटे से गांव में जन्मी जहांआरा लंबे समय से सुल्तानपुर जिले में रह रही हैं। वॉलीबाल की राष्ट्रीय खिलाड़ी व कोच रहते हुए शुरुआत में काफी नाम कमाया और फिर यूपी होमगार्ड्स में सब इंस्पेक्टर (बीओ) रैंक से सरकारी सेवा में आ गईं और सुल्तानपुर व आस-पड़ोस के जिलों में तैनात रहने के दौरान समाजसेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहने लगीं। चूंकि मां की बीमारी के दौरान व्यक्ति के लिए रक्त के महत्व को जाना-समझा और महसूस किया था, सो जुट गईं महादान मानकर रक्तदान में। इस रक्तदानी वीरांगना का रक्तसमूह है ‘एबी पॉजिटिव’। इस रक्तसमूह की उपलब्धता बहुत सहज नहीं रहती। अतः जब जहां जरूरत पड़ी, पहुंचने लगीं दान देने खून का जहांआरा। जान न पहचान, बस अपना खून देकर मरीज की जान बचाने का जुनून जहांआरा की पहचान बनता गया।
सुल्तानपुर जिला अस्पताल हो या अयोध्या का सिविल अस्पताल अथवा अमेठी का संयुक्त अस्पताल। शायद ही कोई वर्ष खाली गया, जब इस वीर महिला ने किसी न किसी की खातिर रक्तदान न किया हो। पहले खून देने का अर्द्धशतक और अब देखते ही देखते गत २८ जनवरी २०२४ को १००वीं बार रक्तदान कर कीर्तिमान रच दिया। सामाजिक संगठन राष्ट्रीय सामाजिक सेवा संघ के मार्गदर्शक निजाम खान बताते हैं कि इस समय जिले के ब्लड बैंक में एबी पॉजीटिव ब्लड की किल्लत है। जब ब्लड डोनेशन की ‘आईकॉन’ जहांआरा से रक्तदान महादान शिविर में खून दान करने के लिए निवेदन किया गया तो वे तत्काल तैयार हो गईं।
…और रक्तदान का शतक पूरा किया, जिससे कि उस ब्लड ग्रुप के अभाव में इलाज के लिए जूझ रहे मरीजों की मदद हो सके। मानवीय मूल्यों की सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने वाली जहांआरा ने जीवन के तकरीबन साढ़े पांच दशक पूरे कर लिए हैं। उन्होंने किसी भी परिस्थिति में अपने नैतिक दायित्वों के निर्वहन का मौका चूका नहीं, जिसे भी आवश्यकता हुई उसके लिए उन्होंने रक्तदान किया। ब्लड बैंक के नियमानुसार, एक बार रक्तदान करने के बाद तीन महीने बाद पुनः रक्तदान कर सकते हैं। अनजान मरीजों की जीवन रक्षा के लिए इस नियम को भी उन्होंने तोड़ अपनी जिंदगी जोखिम में डालने में कभी पीछे नहीं हटीं। इस वीरांगना के ऐसे जज्बे को सलाम!

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