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जयहिंद, आजाद हिंद रेडियो से मैं शाही बोल रहा हूं…

विक्रम सिंह / सुल्तानपुर
‘जय हिंद, मैं योगेंद्र प्रताप शाही आजाद हिंद रेडियो से बोल रहा हूं। अब आप सुनिए न्यूज बुलेटिन..।’ ये शब्द हैं आजाद हिंद फौज के कैप्टन योगेंद्र प्रताप शाही के। उनके शब्दों की ये गूंज वर्षों तक रेडियो पर गूंजती रही। १९४० में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साहस, वीरता एवं देशभक्ति से प्रभावित होकर उन्होंने ब्रिटिश आर्मी छोड़ इंडियन इंडिपेंडेंस लीग ज्वाइन की।…और फिर नेताजी के होकर रह गए। उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने फौज की रेडियो शाखा में एनाउंसर की जिम्मेदारी सौंपी थी। वे लड़ाई के विभिन्न मोर्चों पर उनके साथ ही रहते थे।

मूलत: अवध की सुल्तानपुर स्थित मशहूर दियरा राज-रियासत से ताल्लुक रखने वाले योगेंद्र प्रताप शाही, कुंवर कौशलेंद्र प्रताप शाही (बब्बन साहब) के बेटे थे। २३जून,१९१७ को उनका जन्म दियरा पैलेस में हुआ था और फिर उन्होंने लखनऊ में उच्च शिक्षा ग्रहण की। कैनिंग कॉलेज से बीएससी करने के बाद वे तीसवें दशक में ब्रिटिश आर्मी में कैप्टन के रूप में भर्ती हुए, लेकिन इसी बीच नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन कर अंग्रेजों के खिलाफ सीधी जंग छेड़ दी। उस वक्त द्वितीय विश्वयुद्ध भी चल रहा था, जिसमें शाही साहब सक्रिय भूमिका में थे। नेताजी के स्वाभिमान, देशभक्ति और वीरता से वे काफी प्रभावित हुए। उन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग के मलाया स्थित मुख्यालय में आजाद हिंद फौज के कमांडर सुभाषचंद्र बोस से सन १९४० में सीधी मुलाकात की और ब्रिटिश आर्मी छोड़ने का फैसला किया। उच्च शिक्षा प्राप्त शाही की वाक्पटुता से प्रभावित होकर नेताजी ने उन्हें आजाद हिंद रेडियो का स्पोक्समैन व एनाउंसर नियुक्त कर दिया। इस दौरान आईएनए ने फिरंगियों के खिलाफ विभिन्न मोर्चों पर जंग लड़ी। जिसमें हिंदुस्थानियों को वस्तु स्थिति से अवगत कराने की जिम्मेदारी कैप्टन शाही ही उठाते रहे। शहर के दियरा पैलेस कलाभवन में रह रहे उनके भतीजे अधिवक्ता यतींद्र प्रताप शाही व दीपेंद्र शाही बताते हैं कि न्यूज बुलेटिन की शुरूआत वे सदैव ‘जयहिंद’ के साथ करते थे। सन् १९४२ तक आजाद हिंद फौज में रहने के बाद वे कानपुर आ गए और स्वदेशी कॉटन मिल में सुरक्षा प्रमुख बन गए। देश आजाद हुआ तो उन्होंने अपनी भूमिका बदली और मजदूरों के हक व अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए सक्रिय हो उठे। विधि में स्नातक की डिग्री हासिल की और अदालतों में मजदूरों का पक्ष रखने में कभी कोताही नहीं की। इसके बाद वे जीवन पर्यन्त कानपुर में ही रह कर मजदूरों के शोषण के विरुद्ध लड़ाई लड़ते रहे।यही नहीं वे कला- संगीत और साहित्य के भी मर्मज्ञ थे। शास्त्रीय संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। अंततः९३वर्ष की उम्र में १४ फरवरी सन् २०१० को उन्होंने अंतिम सांस ली।

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