मुख्यपृष्ठनए समाचारदम तोड़ रही है ‘जन धन’ योजना! ...हर पांचवां खाता हुआ निष्क्रिय

दम तोड़ रही है ‘जन धन’ योजना! …हर पांचवां खाता हुआ निष्क्रिय

सरकार के दावों की खुली पोल
मोदी सरकार हमेशा दावा करती है कि उसने देश के गरीबों का बहुत भला किया है। उनके लिए इतने करोड़ घर, शौचालय और बैंकों में जन धन एकाउंट खोले हैं। यह सब सरकारी आंकड़ों के लिए किया गया भी है, पर क्या किसी ने जानने की कोशिश की है कि आज उनकी क्या हालत है? मीडिया को भी इसकी सुध लेने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसे तो बस सरकार की स्तुति करने से फुर्सत नहीं है। लेकिन हकीकत वह नहीं है जो ऊपर से नजर आती है। गरीबों के लिए बनाए गए बहुत से शौचालय बिना इस्तेमाल के पड़े हैं। घटिया डिजाइन व निर्माण कार्य के कारण उनका इस्तेमाल ही नहीं हो पा रहा है। जबकि ठेकेदार ने आंकड़ा गिनाकर पैसे ले लिए। सोशल मीडिया का जमाना है और लोगों ने न जाने कितने ही गांवों के ऐसे शौचालयों के फोटो पोस्ट किए और लोगों ने उसके ऊपर कमेंट भी किए। पर आज हम यहां बात करते हैं गरीबों के लिए खोले गए बैंक एकाउंट की। एक ताजा डेटा बताता है कि गरीबों के लिए खोले गए बहुत सें बैंक एकाउंट यूं ही निष्क्रय पड़े हुए हैं। ये डेटा खुद केंद्र सरकार का है।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने गत मंगलवार खुद ही बताया कि देश में जन धन योजना के तहत खोले गए २० प्रतिशत बैंक खाते निष्क्रिय हैं। यानी कुल १० करोड़ खाते सिर्फ नाम भर के हैं। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि १० करोड़ गरीबों के पास इतने पैसे हैं ही नहीं कि वे उसे बैंक में रख सकें। फिर सवाल है कि आखिर ऐसे खातों का मतलब क्या है?
संसद से आई एक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय लोक दल के सांसद जयंत चौधरी द्वारा राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री भागवत कराड ने बताया कि लगभग ५१.११ करोड़ पीएमजेडीवाई खातों में से लगभग २० प्रतिशत खाते ०६.१२.२०२३ की तारीख में निष्क्रिय थे। निष्क्रिय खाते का अर्थ होता है कि भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुसार, एक बचत और चालू खाते को तब निष्क्रिय माना जाना चाहिए, यदि जब दो वर्ष से अधिक अवधि तक खाते में ग्राहक की ओर से कोई लेनदेन नहीं होता है। खाते के निष्क्रिय होने के कई कारण हो सकते हैं और इसका खाताधारक के लापता हो जाने से कोई सीधा परस्पर संबंध नहीं है। यहां एक मतलब यह भी है कि ऐसे खाते कहीं जबरन तो नहीं खुलवाए गए? यानी सरकारी डेटा को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए गरीबों के खाते खुलवा दिए गए। ऐसा करके सरकार ने अपनी पीठ तो थपथपा ली पर उन गरीबों की कमाई वैâसे बढ़े इस ओर कोई काम नहीं किया। देश में बेरोजगारी दूर हो इसके लिए सरकार को पहल करनी चाहिए थी मगर विवादों की राजनीति करनेवाली भाजपा सरकार को इसकी फुर्सत कहां है?
बहरहाल, इस संबंध में कुछ दिलचस्प आंकड़े हैं। इसके अनुसार, आधे से कुछ कम निष्क्रिय खाते महिलाओं के हैं। कुल १०.३४ करोड़ निष्क्रिय पीएमजेडीवाई खातों में से ४.९३ करोड़ खाते महिलाओं के हैं। निष्क्रिय पीएमजेडीवाई खातों में जमा राशि लगभग १२,७७९ करोड़ रुपए है जो पीएमजेडीवाई खातों में कुल जमा राशि का लगभग ६.१२ फीसदी है। यानी ऐसा नहीं है कि इन खातों में पैसा नहीं है। पैसा है पर उसे ऑपरेट नहीं किया गया है। ऐसे में यह भी संदेह उठना स्वाभाविक है कि कहीं मालिकों ने गरीबों के खातों में अपना धन तो नहीं छिपा रखा है। क्योंकि नोटबंदी के वक्त इस तरह की शिकायतें काफी आई थीं। अब केंद्र सरकार का दावा है कि बैंक निष्क्रिय खातों का प्रतिशत कम करने के लिए प्रयास कर रहे हैं, जिसके तहत जागरुकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं।

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