" /> झांकी… पिता की लीक पर

झांकी… पिता की लीक पर

नवीन पटनायक, अशोक चव्हाण, फारुक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, पेमा खांडू, विजय बहुगुणा, अखिलेश यादव, एचडी कुमारस्वामी, जगनमोहन रेड्डी, हेमंत सोरेन और एमके स्टालिन के बाद बसवराज बोम्मई उन नेताओं में शामिल हो गए हैं, जिनके पिता भी उसी राज्य के मुख्यमंत्री रहे, जहां वे इस समय मुख्यमंत्री बने हैं। बसवराज के पिता एसआर बोम्मई १९८० के दशक में जनता दल में रहते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने थे। इनमें जम्मू-कश्मीर का शेख अब्दुल्ला परिवार ऐसा है, जिसकी तीन पीढियां (शेख अब्दुल्ला, फारुक अब्दुल्ला व उमर अब्दुल्ला) सूबे की मुख्यमंत्री रहीं। महबूबा मुफ्ती इकलौती महिला हैं, जिन्होंने अपने पिता की तरह मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली। ओडिशा में पिता बीजू पटनायक द्वारा तैयार की गई राजनीतिक जमीन को अब नवीन पटनायक संभाल रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दोरजी खांडू की विरासत उनके बेटे पेमा खांडू ने संभाली। महाराष्ट्र के दो बार मुख्यमंत्री रहे शंकरराव चव्हाण के पुत्र अशोक चव्हाण भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री (२००८-२०१०) रह चुके हैं। विजय बहुगुणा के पिता हेमवतीनंदन बहुगुणा आपातकाल से पहले (१९७३-७५) अविभाजित उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। जबकि अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव की लीक को उत्तर प्रदेश में आगे (२०१२-१७) बढ़ाया। स्टालिन के पिता एम करुणानिधि ५ बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। इसी तरह जगनमोहन रेड्डी के पिता वाईएसआर रेड्डी आंध्रप्रदेश, हेमंत सोरेन के पिता शिबू सोरेन झारखंड तथा एचडी कुमारस्वामी के पिता एचडी देवेगौड़ा कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे हैं। बहरहाल बसवराज बोम्मई की कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी कर भाजपा ने उत्तर कर्नाटक की पुरानी मांग को पूरा किया है कि मुख्यमंत्री वहां का हो। साथ ही राज्य में सत्ता दिलाने में निर्णायक लिंगायत समाज को भी खुश करने की कोशिश की है। यह अलग बात है कि बोम्मई सदर लिंगायत हैं जबकि येदियुरप्पा गनिगा लिंगायत हैं। राज्य में सदर लिंगायत ज्यादा ताकतवर नहीं है। राज्य में वीरशैव-लिंगायत समुदाय के १६ फीसदी मतदाता हैं, जिन्हें भाजपा का प्रबल समर्थक माना जाता है। येदियुरप्पा इसी समुदाय से संबद्ध हैं। उल्लेखनीय है कि कुदालसंगम आधारित पंचमसली मठ के मठाधीश जगद्गुरु बासव जया मृत्यंजय स्वामी ने भाजपा से मांग की थी कि मुख्यमंत्री उत्तर कर्नाटक आधारित लिंगायत समाज का हो। लिंगायत समाज का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि लिंगायत समाज के संस्थापक १२वीं सदी के समाज सुधारक बासवन्ना की मूर्ति विधान सभा में स्थापित करने के निर्णय पर पूर्व मंत्री व कांग्रेस नेता शिवशंकरप्पा येदियुरप्पा को धन्यवाद देने पहुंचे थे।
मनहूस बंगला
देहरादून में बने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के सरकारी आवास को ‘मनहूस बंगले’ के नाम से प्रसिद्धि हासिल है क्योंकि बंगले में रहते हुए आज तक कोई भी मुख्यमंत्री अपना ५ साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर है। पहाड़ी शैली में डिजाइन किया गया ६० कमरोंवाला मुख्यमंत्री आवास २०१० में बनाया गया था। इसमें बैडमिंटन कोर्ट, स्विमिंग पूल, कई लॉन हैं और मुख्यमंत्री व उनकी टीम के लिए अलग कार्यालय भी शामिल है। यहां रहनेवाले रमेश पोखरियाल निशंक, मेजर जनरल बीसी खंडूरी, विजय बहुगुणा और त्रिवेंद्र सिंह रावत- अपना ५ साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। अभी तक सिर्फ नारायण दत्त तिवारी पांच साल का कार्यकाल पूरा करने में सफल एकमात्र मुख्यमंत्री रहे। लेकिन तब यह बंगला मुख्यमंत्री निवास नहीं था। पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह इस सरकारी आवास से दूर रहना ही पसंद करते थे। वे इस बंगले को स्थानीय आवास की बजाय ‘कोविड हेल्थ केयर सेंटर’ में बदलना चाहते थे। लेकिन रावत के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद जब पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने तीरथ के फैसले को न मानते हुए गृह प्रवेश कर लिया। धामी ने ज्योतिषियों और वास्तु शास्त्रियों के सुझावों पर वास्तु के अनुसार भवन में धार्मिक अनुष्ठान करवाया। घर को किसी भी तरह की नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त रखने के लिए कुछ वास्तु निवारण उपाय भी किए गए। ऐसा माना जाता है कि इस बंगले में रहनेवाले मुख्यमंत्री अपना ५ साल का पूरा कार्यकाल खत्म करने में विफल रहे हैं। इसी कारण इस आधिकारिक निवास को अशुभ कहा जाता है। देखा जाए तो त्रिवेंद्र सिंह रावत, एनडी कार्यकाल के सबसे करीब रहे थे क्योंकि उन्होंने चार साल पूरे किए थे। २०१७ में त्रिवेंद्र सिंह रावत सब बातों को अफवाह बताते हुए बंगले में आने से पहले दो घंटे की पूजा रखी थी। निशंक यहां रहने आए और इसके तुरंत बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद विजय बहुगुणा इस सरकारी बंगले में एक साल से भी कम समय तक रहे। हरीश रावत इस बंगले में न रहकर बीजापुर गेस्ट हाउस में रहे थे, जो कि बमुश्किल ५०० मीटर दूर है।
साहनी के खिलाफ बगावत के सुर
बिहार में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बैठक का बहिष्कार करने पर विकासशील इन्सान पार्टी के मुखिया मुकेश साहनी के खिलाफ उनकी ही पार्टी में बगावत के सुर उठे हैं। पार्टी के साहेबगंज से विधायक राजू कुमार सिंह ने अपनी पार्टी के अगुवा व बिहार के पशुपालन मंत्री मुकेश साहनी की यह कहते हुए खिंचाई की है कि सोमवार को राजग की बैठक में नहीं जाना दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय है। यह निर्णय मुकेश साहनी का अपना है, पार्टी का नहीं। अगर मुकेश साहनी राजग में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं, तो हम वीआईपी में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। अगर उन्हें राजग के साथ नहीं रहना है, तो यह तय करना पड़ेगा। ऐसे पार्टी नहीं चलती है कि हमें गठबंधन में परेशानी भी है और हमारे नेता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। इसलिए हम और हमारे साथ के पार्टी विधायकों का मानना है कि हमें बैठक में भाग लेकर ही अपनी बात को रखना चाहिए था। घर में छुपकर कर मीडिया के माध्यम से नहीं। हम साफ कहते हैं कि अगर सरकार के साथ रहना है, तो गठबंधन की बैठक में जाकर सबके सामने अपनी बातों को रखना चाहिए था लेकिन यह जो हो रहा है, यह सही नहीं है। मुकेश साहनी ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि पार्टी में सभी को अपनी बात रखने का हक है। हमारे सभी विधायक एकजुट हैं। मुकेश साहनी के नहीं पहुंचने पर भाजपा सांसद अजय निषाद ने कहा कि मुकेश साहनी के राजग में रहने या नहीं रहने से कोई असर नहीं पड़ेगा। नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में पांच साल सरकार चलेगी। मुकेश साहनी का कोई जनाधार नहीं है। उल्लेखनीय यह है कि सहनी विधानसभा चुनाव हार गए थे। जदयू ने उन्हें अपने कोटे से विधान परिषद सदस्य बनाया और मंत्री पद दिया। वीआईपी के चार विधायक हैं। जदयू की ताकत बढ़ाने में जुटे नीतीश कब साहनी को चिराग बना दें, यह देखनेवाली बात होगी। शायद इसीलिए मुकेश साहनी ने सीधे-सीधे चेतावनी दे डाली है। मुकेश साहनी को इस बात का डर सता रहा है कि उनके विधायकों को तोड़ने की योजना बन चुकी है। साहनी ने खुल्लम-खुल्ला एलान कर दिया कि पर्दे के पीछे से साजिश रचनेवाले साथियों को मैं मुंहतोड़ जवाब दूंगा। जो लोग पर्दे के पीछे से खेल खेल रहे हैं, मैं उन्हें एक बात साफ करना चाहता हूं। मेरा नाम मुकेश साहनी है और मैं उस पर्दे को आग लगा दूंगा, जिसके पीछे से खेल खेला जा रहा है। हालांकि मुकेश साहनी ने यह दावा भी किया है कि उनके सभी विधायक एकजुट हैं।
लालू-पवार भेंट से सियासी पारा चढ़ा
देश की राजधानी दिल्ली में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी के दौरे के बीच एक अन्य राजनीतिक जमावड़े ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। लालू यादव के दिल्ली स्थित आवास पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सुप्रीमो शरद पवार, सपा महासचिव रामगोपाल यादव और कांग्रेस नेता अखिलेश प्रसाद सिंह का मिलना नए राजनीतिक उतार-चढाव का संकेत दे रहा है। जिसके बाद नए राजनीतिक गठबंधन को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया है। राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चा के मुताबिक चारों नेताओं के बीच आगामी विधानसभा में उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर बातचीत हुई। हालांकि मुलाकात के बाद अखिलेश प्रसाद सिंह ने इसे औपचारिक बताया। बताया जा रहा है कि उप्र चुनाव में २०२४ के लोकसभा इलेक्शन से पहले नए गठबंधन का प्रयोग हो सकता है। सपा के साथ राजद और राकांपा मिलकर चुनाव लड़ सकती है, जबकि ममता बनर्जी के पहले ही अखिलेश यादव के समर्थन में प्रचार करने की बात कही जा चुकी है। इधर कांग्रेस की स्थिति को लेकर सियासी चर्चा जोरों पर है। कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए पहले से मोदी सरकार के खिलाफ सक्रिय हैं, ऐसे में नए मोर्चे में कांग्रेस भी रहेगी या नहीं? इस पर संशय बरकरार है। विपक्षी नेताओं का मानना है कि अगर उप्र में भाजपा पिछड़ गई तो, आनेवाले लोकसभा चुनाव में उसे मात दी जा सकती है। इस बीच लखनऊ से खबर है कि समाजवादी पार्टी ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन कर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है। राकांपा महासचिव केके शर्मा ने इस गठबंधन की पुष्टि की है। साथ ही योगी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि प्रदेश का बुरा हाल है, जिसे सुधारना होगा। हमारी पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव से बात हो गई है। हम साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। हमारे बीच अब केवल सीटों का चयन होना है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमाशंकर यादव के अनुसार पार्टी एक अगस्त से उप्र में ‘प्रदेश बचाओ संविधान बचाओ’ आंदोलन की शुरुआत करेगी। इसमें किसानों और नौजवानों पर फोकस किया जाएगा। उत्तर प्रदेश में किसान अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन उनकी सुनी नहीं जा रही है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और देश की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनके स्तंभ प्रकाशित होते हैं।)