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झांकी : लोकतंत्र शर्मसार

अजय भट्टाचार्य।  बंगाल विधानसभा सदन के लिए कल सोमवार का दिन सबसे काला दिन कहा जा सकता है। सदन में सत्ता पक्ष व विपक्ष के विधायकों के बीच मारपीट हाल के वर्षों में इस तरह की घटना विधानसभा के भीतर कभी नहीं हुई थी। तृणमूल के असित मजूमदार की जहां नाक फटी, वहीं भाजपा के मनोज टिग्गा के कपड़े फाड़ डाले गए। लोकतंत्र को शर्मसार कर देनेवाली इस घटना पर राजनीति गरमा गई है। हाथापाई के मामले में विधायक शुभेंदु, शंकर घोष, मनोज टिग्गा, दीपक बर्मन, नरहरी महतो को निलंबित कर दिया गया है। ये पांचों विधायक तब तक निलंबित रहेंगे, जब तक सत्र की समाप्ति नहीं होती। इस धमाचौकड़ी में विधानसभा की महिला सुरक्षाकर्मी भी घायल हुई हैं। असित मजूमदार को घायलावस्था में एसएसकेएम ले जाया गया, वहीं भाजपा विधायक मनोज टिग्गा का कहना है कि उन्हें भी तृणमूल के विधायकों ने पीटा है। चोट लगी है।
भाजपा भी नहीं बच पाई
राजनीति में परिवारवाद के मुद्दे पर प्रधानसेवक विपक्ष पर आक्रामक रहते हैं और इसे लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हैं। भाजपा संसदीय दल की बैठक में भी बोले थे, उनकी वजह से ही भाजपा के कई सांसदों या विधायकों के बेटों को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिला। लेकिन नई-नवेली योगी सरकार भी परिवारवाद से बच नहीं पाई। अतरौली के विधायक व पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पोते संदीप सिंह मंत्री बने हैं। उनके पिता राजवीर सिंह भी सांसद के साथ पार्टी के बड़े नेता हैं। हरदोई से भाजपा सांसद नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल को भी मंत्री बनाया गया है। दो बार सपा विधायक रहे नितिन अग्रवाल ने चुनाव के कुछ वक्त पहले पाला बदल भाजपा का दामन थामा था और उन्हें डिप्टी स्पीकर बनाया गया था। सहयोगी दलों अपना दल सोनेलाल और निषाद पार्टी को पारिवारिक पार्टी ही माना जाता है। अपना दल अध्यक्ष आशीष पटेल को मंत्री बनाया गया है, जो केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल के पति हैं। निषाद पार्टी प्रमुख संजय निषाद को मंत्री बनाया गया है। प्रतिभा शुक्ला के पति अनिल शुक्ला कई पार्टियों से पाला बदल भाजपा में पहुंचे हैं। अनिल राजभर के पिता रामजीत राजभर भी विधायक रहे हैं। जितिन प्रसाद को ब्राह्मण चेहरे के तौर पर कांग्रेस से इंपोर्ट किया गया है, उनके पिता जितेंद्र प्रसाद बड़े कांग्रेस नेता रहे हैं।
न घर, न घाट के रहे सहनी
आखिरकार बिहार के पशुपालन मंत्री और वीआईपी के अध्यक्ष मुकेश सहनी न घर, न घाट वाली श्रेणी में आ गए हैं। भाजपा के दबाव के चलते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रविवार देर शाम सहनी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया। सहनी ने इस्तीफे की मांग को यह कहकर टाल दिया था कि ये पैâसला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेना है और नीतीश कुमार ने भाजपा से इस संबंध में लिखित अनुशंसा लेकर अपने बचाव का रास्ता निकाल लिया। राजनीति में जल्दी ऊंची छलांग मारने के चक्कर में फिलहाल सहनी भाजपा के सामने बौना साबित हुए हैं और अपने सहयोगी से दो-दो हाथ करना उनके लिए राजनीतिक रूप से आत्मघाती कदम साबित हुआ। दिक्कत है कि राष्ट्रीय जनता दल के शीर्ष नेताओं के साथ भी उनके संबंध बहुत मधुर नहीं रहे, ऐसे में भविष्य में उन्हें फिर शून्य से अपनी राजनीति की शुरुआत करनी होगी। इधर, जैसे मुकेश सहनी की बर्खास्तगी की खबर आई, राजद नीतीश कुमार पर हमलावर हो गया। पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने एक बयान में कहा कि भाजपा के इशारे पर नीतीश कुमार ने मुकेश सहनी की राजनीतिक हत्या की है। बदली हुए सियासी हालात में बोचहां से मुकेश जी को अपना उम्मीदवार वापस लेकर राजद के उम्मीदवार का समर्थन करना चाहिए।
घरवापसी होते ही मिला टिकट
अखिलेश यादव द्वारा आजमगढ़ लोकसभा सीट से इस्तीफे के बाद गुड्डू जमाली ने फिर पलटी मारी है। नवंबर २०२१ में बसपा छोड़कर ओवैसी का दामन थामकर मुबारकपुर से चुनाव लड़े लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया और हार गए। अब गुड्डू जमाली की बसपा में घर वापसी हो गई है। गुड्डू जमाली को बसपा ने आजमगढ़ सीट पर उपचुनाव में लोकसभा उम्मीदवार भी घोषित कर दिया है। गुड्डू जमाली इसके पूर्व भी मुलायम सिंह यादव के खिलाफ आजमगढ़ लोकसभा सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। आजमगढ़ की मुबारकपुर सीट से शाह आलम (गुड्डू जमाली) ही एक मात्र उम्मीदवार थे, जिन्होंने पार्टी की लाज बचाई थी। उ.प्र. की ४०३ विधानसभा सीटों में असदुद्दीन ओवैसी ने १०० से ज्यादा प्रत्याशी उतारे थे, सिर्फ गुड्डू जमाली ही अपनी जमानत बचा पाए थे। गड्डू जमाली का बसपा छोड़ना मायावती के लिए बड़ा झटका माना जा रहा था।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और देश की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनके स्तंभ प्रकाशित होते हैं।

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