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झांकी….नेताओं के आयात पर रोक

बंगाल भाजपा में फिलहाल तृणमूल कांग्रेस से नेता आयात करने पर रोक लग गई है। कारण यह है कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की जांच किए बिना उन्हें धड़ल्ले से पार्टी में शामिल करने पर भाजपा के भीतर भयंकर दर्जे की नाराजगी बढ़ रही थी। इस संदर्भ में यह तय हुआ है कि आगे से किसी भी दूसरी पार्टी के नेता को भाजपा में शामिल करने से पहले संबंधित स्थानीय नेतृत्व से राय ली जाएगी। मतलब बाहरी नेता की भाजपा में पैराशूट लैंडिंग नहीं होगी। भाजपा के बंगाल प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के अनुसार, `हम दागदार छवि वाले नेताओं को पार्टी में शामिल कर भाजपा को दागदार नहीं बनाना चाहते। हम उन लोगों को अपनी पार्टी में शामिल नहीं करना चाहते जिन पर आरोप लगे हैं या वे अनैतिक या अवैध गतिविधियों में लिप्त हैं। इसलिए आगे से समूह में नेताओं को शामिल नहीं किया जाएगा। आगे से जांच करने के बाद केवल चुनिंदा लोगों को ही शामिल किया जाएगा।’ भीतरखाने की खबर यह है कि समूह में पार्टी में शामिल होने के बहुत से मामलों को लेकर स्थानीय नेतृत्व की नाराजगी से पार्टी के भीतर घमासान इतना बढ़ गया कि मामला केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंच गया। अब भाजपा अन्य दलों के उन नेताओं के लिए नियम बनाने की व्यवस्था कर रही है जो पार्टी में शामिल होना चाहते हैं। शामिल होने को लेकर अंतिम निर्णय केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व ही करेगा, लेकिन जो शामिल होना चाहते हैं उन्हें पार्टी के स्थानीय या जिला नेतृत्व से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर आना होगा। पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार के आरोपी कई तृणमूल नेताओं ने भाजपा का दामन थामा है।
हरियाणा में एक इस्तीफा और
किसान आंदोलन के मुद्दे पर सत्तारूढ़ गठबंधन की साझीदार जननायक जनता पार्टी (जजपा) के एक नेता ने पार्टी को राम-राम बोल दिया है। दो दिन पहले ही पूर्व विधायक रामपाल माजरा ने भाजपा छोड़ी थी। दरअसल इनेलो के इकलौते विधायक अभय चौटाला द्वारा किसानों के समर्थन में इस्तीफा दिए जाने के बाद हरियाणा की राजनीति के केंद्र में किसान आ गए हैं। लगभग ६० गांवों के नागरिकों ने अपने-अपने गांवों में भाजपा-जजपा के नेताओं के प्रवेश पर रोक लगा दी है। जमीनी नेता किसानों के गुस्से से डरे हुए हैं। ऐसे में हरियाणा के करनाल जिले में जेजेपी के नेता और जिला अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह गोरैया ने अपने पद और पार्टी से इस्तीफा देकर किसानों के साथ खड़े होने का फैसला लिया है। उनका कहना है कि मैं अपना व्यक्तिगत फायदा नहीं देखना चाहता था बल्कि मैं किसानों के साथ मिलकर उनकी आवाज आगे बढ़ाना चाहता हूं। मैं आगे भी आंदोलन में लगातार जाता रहूंगा। अगर दुष्यंत चौटाला सरकार और किसानों के वार्ताकार बनते तो शायद उनका कद ऊपर होता, पर उन्होंने सरकार की बात की, किसानों की नहीं। इसलिए मैं पार्टी और पद से इस्तीफा दे रहा हूं। हरियाणा की राजनीति के जानकार बताते हैं कि २८ जनवरी के दिन टिकैत के आंसुओं ने हरियाणा की किसान राजनीति की दिशा बदल दी है। आनेवाले दिनों में जजपा के विधायक भी किसानों के साथ हो सकते हैं। अभय चौटाला ने अपने दादा देवीलाल की विरासत का असली हकदार होने के लिए जो इस्तीफा उछाला है, उससे खट्टर सरकार की मुश्किलें और बढ़नेवाली हैं। कई जिलों में तो सत्ता समर्थक विधायकों का विरोध हो चुका है। अभय चौटाला के इस्तीफा देने के बाद ऐलनाबाद सीट खाली हो गई है और नियमानुसार वहां छह माह के भीतर उपचुनाव कराया जाना है। यह उपचुनाव बरोदा विधानसभा के उपचुनाव से भी ज्यादा रोचक होने की संभावना रहेगी।
एक और तुगलकी फरमान
सोशल मीडिया पर किसी जनप्रतिनिधि, सरकारी अधिकारी पर अमर्यादित टिप्पणी करने पर कानूनी कार्रवाई के निर्देश देने के बाद बिहार में एक और तुगलकी फरमान जारी किया गया है। इस फरमान के बाद अब बिहार में सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन खासा भारी पड़ सकता है। बिहार पुलिस मुख्यालय द्वारा चरित्र सत्यापन को लेकर जारी इस आदेश के तहत अगर कोई व्यक्ति विधि व्यवस्था की स्थिति में सड़क जाम और विरोध प्रदर्शन के दौरान किसी आपराधिक कृत्य में शामिल होता है और अगर उसके खिलाफ पुलिस चार्जशीट दाखिल कर देती है तब ऐसा शख्स किसी भी तरह के सरकारी ठेके में भाग लेने या फिर सरकारी नौकरी में योगदान करने के काबिल नहीं माना जाएगा। बिहार पुलिस के मुखिया एस के सिंघल के आदेश से निकले फरमान का सीधा अर्थ यह है कि पुलिस मुख्यालय इस तरह का आदेश निकाल कर लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करने में जुटा है। राजधानी पटना में विभिन्न मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन करने वाले सड़क पर उतरते हैं तो फिर उन्हें नौकरियां, सरकारी ठेके से वंचित कर दिया जाना कितना उचित होगा? पटना के इंडिगो स्टेशन हेड रूपेश हत्याकांड के बाद मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक बैठक आयोजित की गई थी, इसमें डीजीपी भी बतौर सदस्य शामिल हुए थे। इस बैठक में यह पैâसला लिया गया था कि सरकारी ठेके में चरित्र सत्यापन जरूर देना होगा।
किसानी अंदाज में शादी
अभी तक किसी शादी समारोह में शाही अंदाज की बात होती थी मगर फतेहाबाद के कंवरपाल सिंह ने इस कहावत को बदल दिया है। करीब १५ दिन तक दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन में भाग लेने के बाद शादी की तारीख आने पर फतेहाबाद में अपने गांव दिवाना लौटे कंवरपाल सिंह ने किसानी अंदाज में शादी संपन्न की है। कंवरपाल सिंह ने शादी को किसानी अंदाज में संपन्न करने के लिए अपनी होनेवाली पत्नी मनिंदर से लेकर दुल्हन पक्ष के परिवार के तमाम सदस्यों से बात की और फिर सहमति मिलने के बाद तय हुआ कि दुल्हन ट्रैक्टर पर विदा होगी। दुल्हन ने भी एक कदम आगे बढ़कर अपने पति का किसानी मान बढ़ाया। कंवरपाल सिंह ने जहां खुद ट्रैक्टर चलाया तो अपने पति के साथ ट्रैक्टर पर बैठी दुल्हन ने किसान एकता का झंडा हाथ में लेकर किसान आंदोलन को समर्थन दिया। कंवरपाल के मन में था कि दूर रहकर किसान आंदोलन को समर्थन दिया जाए। दुल्हन से लेकर दुल्हन पक्ष के सभी परिजन भी किसान आंदोलन को समर्थन करनेवाले अंदाज में शादी आयोजन को राजी हुए और फिर किसानी अंदाज में शादी संपन्न हुई।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और देश की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनके स्तंभ प्रकाशित होते हैं।)