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झांकी : हर बीमारी की एक दवा

  • अजय भट्टाचार्य

हर बीमारी की एक दवा
प्रधानसेवक भाजपा के लिए हर बीमारी की दवा हैं। इसलिए कांग्रेस छोड़ भाजपाई बने लोगों को टिकट देने के खिलाफ, अपने नेताओं के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर, उदासीन मतदाता और गुस्से का सामना कर रही भाजपा को मजबूत करने के लिए पिछले २५ दिनों में १२ बार गुजरात का दौरा कर कई रैलियों को संबोधित किया है। पार्टी ने २०१९ में मोदी हैं तो मुमकिन है का नारा लगाया था। ऐसा लगता है कि इस बार भी मोदी पर ही निर्भर है। मोदी ने ६ नवंबर को भावनगर में एक सामूहिक विवाह समारोह में भाग लेकर गुजरात में भाजपा के चुनाव अभियान की शुरुआत की थी। १ दिसंबर को पहले चरण के मतदान से पहले मोदी के २७-२८ नवंबर को गुजरात में होने की उम्मीद है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी लहर और निष्क्रिय भाजपा कार्यकर्ताओं के डर से कोई भी अवांछनीय परिणाम मोदी और अमित शाह के प्रदर्शन पर असर डालेगा, जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर सकते। पार्टी नेताओं की चिंता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनावों के लिए सूक्ष्म प्रबंधन किया जा रहा है और पार्टी आलाकमान शॉट्स लगा रहा है। राज्य पार्टी के नेता अगले कदमों से बेखबर हैं और आलाकमान से निर्देश लेते हैं। कांग्रेस से आयातित एक दर्जन से अधिक उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने से प्रतिबद्ध पार्टी कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और परेशान हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं ने एक नीरस दृष्टिकोण विकसित किया है, जो भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती है। पार्टी के सामने एक और चुनौती मतदान की है। अगर मतदान प्रतिशत कम होता है तो वह १४० सीटों के अपने लक्ष्य से चूक जाएगी। कांग्रेस का वोट शेयर लगातार बढ़कर ४१ फीसदी हो गया है। २००२ के बाद से भाजपा की सीटों में लगातार गिरावट आई है
सुकांत-सुवेंदु में शीतयुद्ध
बंगाल प्रदेश भाजपा में आपसी कलह चरम पर है। प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार विधानसभा में पार्टी विधायकों के साथ बैठक करने गए तो पार्टी के अन्य विधायकों ने भले ही स्वागत किया लेकिन विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी उनके पहुंचने के पहले ही किसी को कुछ बताए बगैर विधानसभा से बाहर निकल गए। मतलब साफ है कि दोनों शीर्ष नेताओं में जबरदस्त सरफुटव्वल है। पार्टी में कुछ नेताओं का मत है कि विधानसभा में सुकांत मजूमदार को इस तरह नजरंदाज कर सुवेंदु ने उनका अपमान ही किया है। वहीं गत सोमवार को भी दोनों के बीच की दूरियां सामने आयी थीं, जब राष्ट्रपति को लेकर अखिल गिरी के बयान के विरोध में धर्मतल्ला के वाई चैनल पर आयोजित भाजपा की सभा में सुकांत मजूमदार ने सुवेंदु अधिकारी को नजरंदाज किया था। सभा मंच पर मौजूद रहने की बात होने पर भी सुकांत बीच रास्ते से ही वापस लौट गए थे। दूसरी ओर कॉलेज स्क्वायर में आयोजित पार्टी की रैली में शामिल न होकर सुवेंदु ने विधानसभा से अलग रैली निकाली थी। किसी भी कार्यक्रम में दोनों को एक मंच पर नहीं देखा जा रहा है। पंचायत चुनाव से पहले सुकांत व सुवेंदु में चल रहा शीतयुद्ध पार्टी में चर्चा का केंद्र बन गया है।
पहचान कौन…?
यह फोटो एक महीने पहले की है, जब दीवाली के दिन हिमाचली चुरहा लिबास पहनकर परिधान प्रेमी प्रधानसेवक केदारनाथ गए थे। यह स्वयंघोषित सबसे बड़े चैनल के एक शो की याद दिलाती है, जिसमें शो की होस्ट दीर्घा में बैठे लगभग डेढ़-दो सौ लोगों से पूछती है कि यहां जिसको गुजरात के मुख्यमंत्री का नाम पता हो, वह हाथ खड़ा करे। पूरे पंडाल में सन्नाटा छा गया। एक भी हाथ नहीं उठा। वह पूछती है सीरियसली किसी को गुजरात के मुख्यमंत्री का नाम नहीं पता? पंडाल में फिर से खामोशी। जबकि बहस की प्रतिक्रिया से पता चल रहा था कि पंडाल में ८० प्रतिशत से भी ऊपर समर्थक भाजपा के थे। आज यही आलम है कि आसाम और उत्तर प्रदेश को छोड़कर भाजपा के बाकी मुख्यमंत्रियों के नाम कोई नहीं जानता क्योंकि मीडिया में यही दो दिखाई पड़ते हैं। फोटो में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हैं। यदि देश के प्रधानमंत्री का सम्मान जरूरी है तो प्रदेश के मुख्यमंत्री का भी सम्मान व प्रोटोकॉल जरूरी है। इतना तामझाम यदि किया है तो एक कुर्सी उनकी भी बनती है? सम्मान व्यक्ति का नहीं, पद का होता है। बाकी वन मैन आर्मी की छवि तो बन गई पर अपने-अपने सांसद की भूमिका और चेहरे को भी याद कर लीजिए। हम केवल उन्हें पार्टी, व्यक्ति इत्यादि के एवज में चुनते जा रहे हैं? यदि यही उचित है तो बादशाहों, शहंशाहों को भी मत कोसना क्योंकि उनके एक आदेश को हम तब भी ऐसे मानते थे।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और देश की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनके स्तंभ प्रकाशित होते हैं।

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