" /> कभी-कभी… रमैया वस्तावैया…!

कभी-कभी… रमैया वस्तावैया…!

गीत और संगीत हमारी फिल्मों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और हमेशा रहेंगे। फिल्म की कहानी कितनी ही बेहतर क्यों न हो, गीत-संगीत उसमें चार चांद लगा देते हैं। कुछ दर्शक कहानी की वजह से तो कुछ गीतों की वजह से फिल्म देखने सिनेमाघरों तक खिंचे चले आते हैं। लेकिन कभी-कभार फिल्म के गीतों में ऐसे शब्दों का भी इस्तेमाल कर लिया जाता है, जिसका मतलब ज्यादातर श्रोता नहीं समझ पाते, फिर भी बिना मतलब समझे ही श्रोता उन गीतों को गाते और गुनगुनाते हैं और मौका मिले तो गाने और उसकी धुन पर जी भरकर ठुमका भी लगाते हैं। अपने जमाने की एक ऐसी ही सुपरहिट फिल्म के निर्माण के दौरान उस फिल्म के संगीतकार और गीतकार म्यूजिक सिटिंग के लिए खंडाला जा रहे थे, तभी रास्ते में एक ढाबे पर चाय-नाश्ते के लिए वे रुके। ढाबे पर काम करनेवाला तेलुगु भाषी लड़का दूसरे ग्राहकों में बिजी था। तभी टीम का एक संगीतकार जिसे तेलुगु भाषा आती थी, टेबल पर थाप देते हुए तेलुगु भाषा में उस लड़के को बुलाने लगा। टेबल की थाप पर पर संगीतकार के मुंह से निकले उन तेलुगु शब्दों को सुनकर गीतकार ने एक लाइन ऐसी जोड़ी की फिल्म के एक गीत के मुखड़े का सृजन हो गया।
किसी हिंदी भाषी फिल्म में तेलुगु शब्दों का इस्तेमाल करना कुछ समझ में नहीं आता। लेकिन राज कपूर की फिल्म ‘श्री ४२०’ के एक गीत में इस्तेमाल हुए तेलुगु शब्दों की वजह बड़ी दिलचस्प है। हुआ यूं कि राज कपूर की फिल्म ‘श्री ४२०’ की म्यूजिक सिटिंग के लिए संगीतकार शंकर-जयकिशन के साथ गीतकार शैलेंद्र और हसरत जयपुरी खंडाला जा रहे थे। अभी सफर आधा भी नहीं हुआ था कि सभी को चाय और नाश्ते की तलब लग गई। कुछ दूर आगे बढ़ने पर उन्हें एक होटलनुमा ढाबा दिखाई दिया। होटल को देखते ही उन्होंने अपनी गाड़ी होटल के बाहर रुकवाई और पहुंच गए होटल में चाय और नाश्ता करने। होटल में लोगों की अच्छी-खासी भीड़ थी। होटल का बैरा रमैया होटल के दूसरे ग्राहकों में बिजी था। होटल मालिक द्वारा रमैया को आवाज लगाए जाने पर ये चारों जान गए कि बैरे का नाम रमैया है। काफी देर तक रमैया का इंतजार करने के बाद जब रमैया इनकी टेबल पर पहुंचा तो बातचीत के दौरान संगीतकार शंकर जान गए कि रमैया तेलुगु भाषी है। शंकर का परिवार वैसे तो मूलतः उत्तर प्रदेश का रहनेवाला था लेकिन हैदराबाद में पैदा होने के साथ ही शंकर वहीं पले-बढ़े थे। अत: उन्हें तेलुगु भाषा आती थी। अब शंकर ने तेलुगु में ही रमैया को चाय-नाश्ते का ऑर्डर दिया और सारे टेबल पर बैठकर चाय-नाश्ते का इंतजार करने लगे। दूसरे ग्राहकों में बिजी रमैया जब काफी देर तक चाय-नाश्ता लेकर नहीं आया तो शंकर अपनी बोरियत मिटाने के लिए ‘रमैया वस्तावैया… रमैया वस्तावैया…’ (रमैया जल्दी आओ) कहते हुए गुनगुनाने लगे। शंकर को इस तरह गुनगुनाता हुआ देखकर जयकिशन टेबल को तबले की तरह बजाने लगे। शंकर को एक ही शब्द बार-बार गुनगुनाते हुए देखकर गीतकार हसरत जयपुरी खीझ गए। उन्होंने शंकर से कहा इसी एक लाइन पर अटके रहोगे या कुछ आगे भी बढ़ोगे। हसरत जयपुरी के कहने भर की देर थी कि तभी गीतकार शैलेंद्र के मुंह से तपाक से दूसरा शब्द निकला, ‘मैंने दिल तुझको दिया…!’ अब जब दोनों लाइनों को मिलाकर शंकर ने गुनगुनाना शुरू किया तो और अच्छा लगने लगा। तभी उनके दिमाग में ये बात कौंधी की अगर इन दो लाइनों को आगे बढ़ाते हुआ इस पर गीत लिखा जाए तो बहुत ही सुंदर गाना बन सकता है। खैर, तभी रमैया ने उनके टेबल पर चाय और नाश्ता पहुंचा दिया। चाय-नाश्ता करने के बाद सभी खंडाला के लिए निकल गए।
खंडाला से लौटने के बाद ये दो लाइनें और उस पर बनाई हुई धुन राज कपूर को सुनाई गई, जिसे सुनकर राज कपूर बेहद प्रभावित हुए और इस गीत को तत्काल पूरा करने का निर्देश गीतकार शैलेंद्र को देते हुए उन्होंने इस गीत के लिए फिल्म में एक सिचुएशन बनाने को कहा। गीत लिखने के दौरान शैलेंद्र ने तेलुगु शब्द ‘रमैया वस्तावैया’ को बदलने की कोशिश की लेकिन उपयुक्त शब्द न मिल पाने की वजह से कोई भी नहीं चाहता था कि तेलुगु के इन शब्दों को बदला जाए। अत: इस गाने में तेलुगु शब्द ‘रमैया वस्तावैया’ को जस-का-तस इस्तेमाल किया गया। फिल्म के गाने में बार-बार इस्तेमाल हुए ‘रमैया वस्तावैया’ का मतलब भले ही हिंदी फिल्मों के दर्शक न जानते हों लेकिन लता मंगेशकर, मुकेश, मोहम्मद रफी और साथियों की आवाज में सजा ये गीत फिल्म की रिलीज के बाद फिल्म की तरह ही सुपरहिट हो गया और गली-कूचे से लेकर महलों तक में बजनेवाला ये गीत हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में अपना परचम लहराते हुए मील का पत्थर बन गया।