मुख्यपृष्ठस्तंभकभी-कभी : फौजी बनना चाहते थे विक्रम!

कभी-कभी : फौजी बनना चाहते थे विक्रम!

यू.एस. मिश्रा
हिंदी और मराठी फिल्मों का न वो केवल जाना-पहचाना नाम थे, बल्कि वो एक बेहतरीन और नर्मदिल इंसान भी थे। उनकी दादी और परदादी ने उस जमाने में फिल्मों में काम किया था, जब औरतें फिल्में तो दूर, घर की चौखट तक नहीं लांघती थीं। उनके पिता भी अपने जमाने के मशहूर कलाकार थे और उन्होंने मराठी फिल्मों के साथ ही हिंदी फिल्मों में भी काम किया था। घर में फिल्मी माहौल होने के बावजूद वो फिल्मों की बजाय फौज में जाकर देश सेवा करना चाहते थे लेकिन मन का सोचा कहां होता है। वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि वो फिल्मों में चले आए और उन्होंने रंगमंच के साथ ही टीवी के छोटे पर्दे सहित सिनेमा के बड़े पर्दे पर भी धूम मचा दी।
मराठी फिल्मों के जाने-माने कलाकार चंद्रकांत गोखले के घर १४ नवंबर, १९४५ को पुत्र रत्न ने जन्म लिया, जिसका नाम उन्होंने बड़े प्यार से विक्रम रखा। आगे चलकर फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाला यही विक्रम फिल्मों में विक्रम गोखले के नाम से मशहूर हुआ। विक्रम फौज में जाना चाहते थे लेकिन घर के हालात को देखते हुए उन्होंने एक कंपनी में १३५ रुपए माहवार पर क्लर्क की नौकरी ज्वॉइन कर ली। लेकिन उन्होंने महसूस किया कि वो इस नौकरी के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे इसलिए एक हफ्ते के भीतर ही नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ वो अभी घर पहुंचे ही थे कि शाम के वक्त पिता चंद्रकांत से मिलने उनके मित्र बाल कोल्हटकर घर आ गए। कोल्हटकर की नजर जब विक्रम पर पड़ी तो उन्होंने विक्रम को अपने साथ थिएटर करने का ऑफर दिया। प्रति नाटक उन्होंने विक्रम को ३० रुपए देना भी मंजूर कर लिया। इस तरह विक्रम की शुरुआत थिएटर से हो गई। एक दिन उनकी मुलाकात रंगकर्मी विजया मेहता से हुई। विजया मेहता के निर्देशन में उन्होंने नाटक ‘बैरिस्टर’ में एक अलग तरह की भूमिका निभाई लेकिन उन्हें प्रसिद्धि नाटक ‘स्वामी’ से मिली। कई नाटकों में गंभीर भूमिका निभानेवाले विक्रम गोखले नाटक ‘आप्पा और बाप्पा’ में हास्य भूमिका निभाते नजर आए। हिंदी फिल्म ‘परवाना’ और मराठी फिल्म ‘वर्‍हाडी आणी वाजंत्री’ करने के बाद उनके सामने अनगिनत भूमिकाओं का अंबार लग गया।
फिल्मों में काम करने के साथ ही विक्रम गोखले सामाजिक कार्य भी करते थे। परिवार द्वारा चलाया जानेवाला उनका चैरिटेबल ट्रस्ट विकलांग सैनिकों, कुष्ठरोगियों के बच्चों और अनाथ बच्चों की शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है। सहृदयी विक्रम गोखले को उन फिल्मी कलाकारों और दोस्तों के साथ वक्त बिताना पसंद था जो अब लाइमलाइट से दूर हो चुके थे, जिनसे न अब कोई मिलना चाहता था और न जिनके बारे में कोई जानना चाहता था। बकौल विक्रम, ‘मुझे दो चीजें बहुत अच्छी लगती हैं। एक तो ये कि एक्टर किसी भी उम्र का क्यों न हो, उसे काम करते हुए देखना और दूसरा ये कि जो कलाकार अब लाइमलाइट और हम सबकी नजरों से दूर हो गया है, मैं उसे समय देता हूं, उनसे जाकर मिलता हूं। शरद तलवलकर, डॉ. श्रीराम लागू, विजय तेंदुलकर, पु.ल. देशपांडे, बलराज साहनी, अशोक कुमार, शशि कपूर, ललिता पवार के संपर्क में मैं था। मैंने उन कलाकारों को अपनी आंखों से देखा है, जो अब लाइमलाइट से दूर हो गए हैं। जैसे ही शाम होती है, थिएटर करनेवाले कलाकारों को लाइट्स की आदत होती है। ऐसे लोगों को मैंने ऐसे देखा है, जैसे इनका कुछ बिगड़ गया हो। ललिता पवार तो शाम को अपना मेकअप शुरू कर देती थीं। मेरे पिता कहते थे कि मुझे पता है अब मेरी जरूरत इंडस्ट्री को नहीं है लेकिन ये शामें हमें मारती हैं। थिएटर की रिंगिंग बेल्स को सुनने की हमारी आदत है। इसलिए मैं पिता सहित इन सभी को समय देता था। घर में जो बुजुर्ग हैं, जो कुछ नहीं कर सकते। सिर्फ सांस ले सकते हैं, बैठ सकते हैं, टीवी देख सकते है, बातों को सुन सकते हैं, बच्चों को खेलते देख सकते हैं और घर के बाकी सदस्य, जो अपने काम में बिजी हैं और उनके पास उनके लिए समय नहीं है। लेकिन मैं फिर चाहे वो मेरी मां हो या पिता या फिर कोई अन्य बुजुर्ग, उसे मैं अपना वक्त जरूर देता हूं। ये मेरी ड्यूटी है।’
फरवरी २०१६ में गले की बीमारी के चलते विक्रम गोखले ने रंगमंच से संन्यास ले लिया था, परंतु उनका फिल्मी सफर जारी था। ५ नवंबर, २०२२ को तबीयत खराब होने के कारण पुणे स्थित ‘दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल’ में उन्हें भर्ती करवाया गया, जहां २६ नवंबर, २०२२ को ७७ साल की उम्र में मल्टीपल ऑर्गन फेलियर के चलते उनका निधन हो गया। अपनी कला से लोगों का मनोरंजन और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करनेवाले सहृदयी कलाकार विक्रम गोखले को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि…!

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