मुख्यपृष्ठग्लैमरकभी-कभी : छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा...!

कभी-कभी : छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा…!

यू.एस. मिश्रा।  रुपहले पर्दे पर चमकनेवाले हर सितारे को जब हम पर्दे पर लोगों का मनोरंजन करते हुए देखते हैं तो मन-ही-मन सोचते हैं कि इनका जीवन हम सबसे कितना सुखद और बेहतरीन होगा, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत होती है। अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी, जिन्हें कुदरत ने दौलत और शोहरत के साथ भरपूर दर्द दिया था, जीवनभर दूसरों पर अपना सर्वस्व लुटाती रहीं। उनके अपनों के साथ ही धन-दौलत ने भले ही अंतिम दिनों में उनका साथ छोड़ दिया था लेकिन मौत ने उनसे बेवफाई नहीं की। अपने करियर में जहां वे नित नई ऊंचाइयों को छू रही थीं, वहीं उनकी जिंदगी रसातल में जा रही थी। ‘क्या करोगे सुनकर मेरी कहानी, बेलुत्फ जिंदगी के किस्से हैं फीके-फीके…’ जैसी नज्मों और शेरों के जरिए अपने शब्दों से अपनी पीड़ा को बयां करनेवाली मशहूर शायरा-अभिनेत्री मीना कुमारी इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा गर्इं।
१ अगस्त, १९३२ को जन्मी महजबीं उर्फ मीना कुमारी, जिन्हें घर में प्यार से ‘मुन्ना’ कहकर बुलाया जाता था, की जड़ें बांग्ला के सुप्रसिद्ध साहित्यकार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के परिवार से कहीं गहरे तक जुड़ी थीं। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के भाई जदुनंदन ने हेमसुंदरी से परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह कर लिया था। शादी के कुछ दिनों बाद जदुनंदन का देहांत हो गया और हेमसुंदरी को बंगाल से लखनऊ आना पड़ा। लखनऊ में नर्स की नौकरी के दौरान उनकी मुलाकात एक क्रिश्चियन पत्रकार प्यारेलाल से हुई। आगे चलकर उन्होंने शादी कर ली। इनकी दो संतानों में से एक प्रभावती बड़ी होने पर काम की तलाश में मुंबई आ गई और यहां उसकी मुलाकात थिएटर में हारमोनियम बजानेवाले अली बक्स से हुई। अली बक्स ने खूबसूरत डांसर प्रभावती के सामने अपने प्यार का इजहार करते हुए विवाह का प्रस्ताव रखा। अली बक्स से निकाह पढ़ने के बाद प्रभावती धर्म परिवर्तन कर इकबाल बानो बन गर्इं। आर्थिक हालात अच्छे न होने के कारण बड़ी मुश्किल से दोनों अपना गुजर-बसर कर रहे थे। बेटी खुर्शीद के जन्म के बाद जब दोबारा बेटी पैदा हुई तो मुफलिसी के चलते अस्पताल की फीस न भर पानेवाले अली बक्स ने कड़ा पैâसला लेते हुए बच्ची को एक मुस्लिम यतीमखाने की सीढ़ियों पर छोड़ दिया। बेटी को छोड़ने के चंद मिनटों बाद ही उनका दिल पसीज उठा और वे पलटकर उन सीढ़ियों की ओर बेतहाशा दौड़ पड़े जहां उन्होंने उस मासूम को बेसहारा छोड़ दिया था। सीढ़ियों पर पड़ी बच्ची को सीने से चिपकाकर वे घर ले आए। जिस उम्र में बच्चे गुड्डे और गुड़ियों से खेलते हुए पढ़ाई करते हैं मीना कुमारी को अपने परिवार का पेट पालने के लिए वैâमरे के सामने खड़ा होना पड़ा। अपनी पहली फिल्म ‘लेदर फेस’ के लिए २५ रुपए मेहनताना पानेवाली ४ वर्षीया मीना कुमारी को १९५२ में रिलीज हुई फिल्म ‘बैजू बावरा’ ने रातों-रात स्टार बना दिया। मीना कुमारी जहां कमर्शियली सक्सेस स्टार थीं, वहीं दूसरी तरफ मीना ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि यही स्टारडम और फेम एक दिन उन्हें अपने पति कमाल अमरोही से दूर कर देगा, जिसे वे दिल से चाहती हैं। अपने से उम्र में १५ वर्ष बड़े शादीशुदा कमाल से विवाह करनेवाली मीना जिंदगी भर सच्ची मोहब्बत और एक औलाद के लिए तरसती रहीं। सेट पर किसी बच्चे को देखतीं तो उनका वात्सल्य उमड़ पड़ता। बचपन में मां-बाप सहित परिवार के लिए कमाती रहीं तो शादी के बाद शौहर के लिए। ‘दिल एक मंदिर’, ‘साहब बीबी और गुलाम’, ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ जैसी एक से बढ़कर एक फिल्मों में काम कर जहां वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ रही थीं, वहीं कमाल के साथ उनके रिश्ते बिगड़ते जा रहे थे। रिश्ते बिगड़ने के बावजूद ‘पाकीजा’ के निर्माण के दौरान हुई फाइनेंशियल प्रॉब्लम को देखते हुए उन्होंने अपनी सारी कमाई कमाल को दे दी और बदले में कमाल से एक रुपए मेहनताना लिया था। लेकिन दोनों के बिगड़ते रिश्तों और कमाल के सेक्रेटरी बाकर अली द्वारा मीना पर हाथ उठाए जाने के बाद तो उनके रिश्तों का दुखद अंत हो गया।
खैर, अकेलेपन का जहर सबसे ज्यादा जहरीला होता है। इसे वही समझ सकता है, जिसने इस जहर को पीया हो। कमाल से अलगाव के बाद मीना कुमारी जीते जी मर गर्इं, उनकी आंखों से नींद गायब हो गई। मजबूरन डॉक्टर को उन्हें एक पैग ब्रांडी प्रिस्क्राइब करना पड़ा। यही एक पैग उनकी आदत बन गया और वे अल्कोहलिक होती चली गर्इं। जिंदगी में हर एक के साथ वफा करनेवाली मीना कुमारी के साथ कभी किसी ने वफा नहीं की सिवाय मौत के, जिसने उनसे किनारा नहीं किया। ३१ मार्च, १९७२ को जब सोरायसिस ऑफ लीवर के चलते उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा तो जिंदगी भर अपनी कमाई से दूसरों की मदद करनेवाली और करोड़ों रुपए कमानेवाली मीना कुमारी के पास अस्पताल का बिल चुकाने के लिए भी पैसा शेष न था…!

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