मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकभी-कभी : तेरा जाना...!

कभी-कभी : तेरा जाना…!

यू.एस. मिश्रा / मुंबई। फिल्मों की दुनिया बड़ी रंग-रंगीली है। यहां नित नए किस्से देखने और सुनने को मिल जाते हैं। ६० के दशक में एक ऐसा ही वाकया उस समय उपस्थित हो गया था जब अपनी एक फिल्म में काम करनेवाली अभिनेत्री अपनी ही फिल्म के प्रीमियर पर पहुंची तो दरबान ने उन्हें अंदर जाने से मना करते हुए ये कहकर दरवाजे पर ही रोक दिया कि उम्र में छोटी होने के कारण आप इस ‘एडल्ट’ फिल्म को नहीं देख सकतीं और उन्हें फिल्म को देखे बिना ही थिएटर से बैरंग वापस लौटना पड़ा। ये अभिनेत्री कोई और नहीं, बल्कि जानी-मानी अभिनेत्री नूतन थीं।
४ जून, १९३६ को मुंबई में पैदा होनेवाली नूतन के घर का माहौल फिल्मी था। पिता कुमार सेन समर्थ फिल्मों के निर्देशक थे, तो वहीं मां शोभना समर्थ एक मशहूर अभिनेत्री थीं। कुमार सेन समर्थ और शोभना समर्थ की संतानों में सबसे बड़ी नूतन ने मात्र ८ साल की छोटी उम्र में अपने पिता द्वारा निर्देशित फिल्म ‘नल दमयंती’ में बतौर बाल कलाकार काम किया। १९५० में उम्र के १४वें पायदान पर कदम रखते ही नूतन ने फिल्म ‘हमारी बेटी’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की, जिसका निर्माण उनकी मां शोभना समर्थ ने किया था। अगले ही वर्ष यानी १९५१ में आई फिल्म ‘नगीना’ में उन्होंने काम किया। लेकिन ये क्या जब फिल्म ‘नगीना’ सेंसर बोर्ड में पास होने के लिए गई तो सेंसर बोर्ड वालों ने उसे एडल्ट फिल्म का सर्टिफिकेट दे दिया। नूतन जब अपनी इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमाहॉल में पहुंची तो दरवाजे पर ही दरबान ने उन्हें रोकते हुए उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। नूतन ने दरबान को लाख समझाया कि उन्होंने उस फिल्म में काम किया है लेकिन नूतन की कम उम्र को देखते हुए दरबान ने उन्हें थिएटर के गेट से बैरंग वापस लौटा दिया। १९५२ में मात्र १६ बरस की उम्र में ‘मिस इंडिया’ का ताज पहननेवाली नूतन को १९५५ में आई फिल्म ‘सीमा’ से एक नई पहचान मिली। पर्दे पर उन्होंने विद्रोही नायिका की सशक्त भूमिका को साकार किया था। अपने दमदार और शानदार अभिनय से उन्होंने दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी और उनके दमदार अभिनय के चलते उन्हें सर्वश्रेष्ठ फिल्म अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। ५० के दशक में जहां हीरोइनें अक्सर साड़ी में नजर आती थीं, वहीं १९५८ में बनी फिल्म ‘दिल्ली का ठग’ में उन्होंने पर्दे पर स्विमिंग कॉस्ट्यूम पहनकर हंगामा ही बरपा दिया था। उस दौर में इसे काफी बोल्ड स्टेप माना जाता था। अपने इस बोल्ड कदम के लिए उन्हें आलोचनाओं का भी शिकार होना पड़ा। लेकिन फिल्म ‘सुजाता’ और ‘बंदिनी’ जैसी फिल्मों में अपने अत्यंत मर्मस्पर्शी अभिनय से नूतन ने अपनी बोल्ड अभिनेत्री की छवि को बदलते हुए लोगों का मुंह बंद कर दिया। स्विट्जरलैंड से अभिनय का प्रशिक्षण लेनेवाली नूतन ने कत्थक और संगीत की भी शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने फिल्म ‘हमारी बेटी’, ‘छबीली’ और ‘पेइंग गेस्ट’ जैसी फिल्मों में गाने भी गाये हैं। ‘सुजाता’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘सीमा’, ‘बंदिनी’, ‘सरस्वती चंद्र’, ‘मिलन’, ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ जैसी एक से बढ़कर एक फिल्मों में अपनी बेहतरीन अदाकारी का जलवा बिखेरनेवाली नूतन के करियर में फिल्म ‘बंदिनी’ उनके करियर में मील का पत्थर थी। वहीं फिल्म ‘सुजाता’ में अछूत लड़की की भूमिका निभानेवाली नूतन ने फिल्म में अपने चेहरे और आंखों से ऐसे भाव प्रकट किए हैं, जो बिना डायलॉग बोले ही अपनी हर बात व्यक्त कर जाते हैं।
फिल्म ‘सरस्वती चंद्र’ से फिल्मों में खुद को स्थापित करनेवाली नूतन को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। पांच बार ‘फिल्मफेयर’ अवॉर्ड जीतनेवाली नूतन को भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। २३ वर्ष की उम्र में लेफ्टिनेंट कमांडर रजनीश बहल से विवाह के उपरांत दो वर्ष बाद बेटे मोहनीश बहल को जन्म देनेवाली नूतन ने लगभग चार दशकों तक इंडस्ट्री पर राज किया। जब उन्हें पता चला कि वे वैंâसर जैसी दु:साध्य बीमारी से ग्रसित हो गई हैं, तो उन्होंने ये बात किसी से नहीं छुपाई, बल्कि कम समय के चलते उन्होंने अपने निर्माताओं से कहा कि वे जल्द-से-जल्द अपनी फिल्मों को पूरा कर लें। चार दशकों के अपने फिल्मी करियर में एक से बढ़कर एक उम्दा किरदार निभानेवाली सादगी की प्रतिमूर्ति और सौम्य मुस्कान बिखेरनेवाली सांवली-सलोनी अभिनेत्री नूतन का वैंâसर के चलते १९ फरवरी, १९९१ को निधन हो गया।

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