मुख्यपृष्ठग्लैमरकभी-कभी : दुनिया बदल गई...!

कभी-कभी : दुनिया बदल गई…!

यू.एस. मिश्रा।  किसी ने सच ही कहा है कि तकदीर का लिखा कोई नहीं बदल सकता। इंसान की तकदीर आगे-आगे चलती है और इंसान पीछे-पीछे। खैर, बीते जमाने की एक खूबसूरत हीरोइन भी पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद मेडिकल की पढ़ाई शुरू भी कर दी थी। लेकिन तकदीर को तो कुछ और ही मंजूर था। मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर डॉक्टर बनने की बजाय वो हीरोइन बन गर्इं। अपने बारह साल के फिल्मी करियर में मात्र २८ फिल्मों में काम करनेवाली इस हीरोइन ने शादी के बाद भले ही फिल्मों को अलविदा कह दिया लेकिन अपनी प्रतिभा के दम पर वे अपना नाम इतिहास के पन्नों पर दर्ज करवा गर्इं।
चालीस और पचास के दशक में अपनी खूबसूरती से लोगों को अपना दीवाना बनानेवाली खूबसूरत हीरोइन मुनव्वर सुल्ताना का जन्म लाहौर, पाकिस्तान में ८ नवंबर, १९२४ को एक पंजाबी मुस्लिम परिवार में हुआ था। मुनव्वर सुल्ताना के पिता रेडियो अनाउंसर थे। मुनव्वर सुल्ताना पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद मेडिकल की बाकायदा पढ़ाई भी शुरू कर दी थी। लेकिन ऊपरवाले को तो कुछ और ही मंजूर था। उनकी तकदीर में डॉक्टर बनने की बजाय हीरोइन बनना लिखा था। १९४१ में दलसुख पंचोली के बैनर ‘पंचोली आर्ट्स फिल्म’ के बैनर तले उन्हें फिल्म ‘खजांची’ में एक छोटा-सा किरदार निभाने का ऑफर मिला। ‘पीने के दिन आए पिये जा…’ गीत उन्हीं पर फिल्माया गया था। फिल्म में उनके द्वारा निभाए गए इस छोटे से रोल ने उनके लिए इंडस्ट्री के दरवाजे भले ही खोल दिए लेकिन उनका डॉक्टर बनने का सपना अधूरा रह गया और वे फिल्मों की हीरोइन बन गर्इं। १९४५ में रिलीज हुई मुनव्वर सुल्ताना की दूसरी फिल्म ‘पहली नजर’ की प्लानिंग के दौरान मशहूर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर मजहर खान को अपनी इस फिल्म के लिए एक नई लड़की की तलाश थी। फिल्म ‘खजांची’ के छोटे से रोल में अपने अभिनय से लोगों का दिल जीतनेवाली मुनव्वर सुल्ताना के काम से मजहर खान बेहद प्रभावित थे। अत: उन्होंने मुनव्वर को लाहौर से मुंबई आने का बुलावा भेजा और मुनव्वर सुल्ताना के मुंबई आते ही उन्हें अपनी इस फिल्म के लिए बतौर हीरोइन साइन कर लिया। ‘दर्द’, ‘एलान’, ‘कनीज’, ‘मजबूर’, ‘बाबुल’ जैसी एक से बढ़कर एक फिल्मों में काम करनेवाली मुनव्वर सुल्ताना पर उमा देवी (टुनटुन) का गाया गया पहला गीत ‘अफसाना लिख रही हूं दिल-ए-बेकरार का…’ फिल्माया गया था। मात्र बारह वर्ष के अपने करियर में २८ फिल्मों में काम करनेवाली मुनव्वर सुल्ताना ने मोतीलाल, सुरेंद्र, श्याम, सज्जन, रहमान, याकूब, देव आनंद, दिलीप कुमार जैसे अपने समकालीन बड़े-बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया था। फिल्म ‘बाबुल’ में मुनव्वर सुल्ताना और दिलीप कुमार पर फिल्माए गए गीत ‘मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का…’, ‘दुनिया बदल गई, मेरी दुनिया बदल गई…’ को दर्शक आज भी नहीं भूले हैं। १९४८ की फिल्म ‘मेरी कहानी’ और १९५० की फिल्म ‘प्यार की मंजिल’ में निर्माता शरफ अली जो मुंबई के मशहूर फर्नीचर व्यवसायी भी थे, की फिल्मों में काम करनेवाली मुनव्वर सुल्ताना ने १९५४ में शरफ अली के साथ विवाह कर लिया। विवाहोपरांत फिल्मों को हमेशा के लिए अलविदा कह अपनी शादीशुदा जिंदगी में व्यस्त मुनव्वर सुल्ताना के कंधों पर अचानक पति शरफ अली के देहांत के बाद चार बेटों और तीन बेटियों के साथ ही उनके बिजनेस की सारी जिम्मेदारी आन पड़ी। मुनव्वर सुल्ताना ने न केवल अपने बच्चों की परवरिश की, बल्कि अपने पति के कारोबार को भी बखूबी संभाला। अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों में मुनव्वर सुल्ताना कुछ ऐसा डूबीं कि फिल्मी दुनिया से उनका नाता ही टूट गया। अपने अंतिम समय में मुनव्वर सुल्ताना अल्जाइमर नामक एक ऐसी लाइलाज बीमारी का शिकार हो गई थीं, जिसमें मरीज का दिमाग धीरे-धीरे क्षीण होता चला जाता है और वो अपनी याददाश्त खो बैठता है।
अपनी शोख अदाओं से दर्शकों को अपना दीवाना बना लेनेवाली मुनव्वर सुल्ताना अपने अंतिम दिनों में एक बुत में तब्दील हो गई थीं। घर के एक कोने में बैठी खुद से बेखबर हरदम शून्य में निहारती मुनव्वर सुल्ताना के लिए अपने और पराये के बीच का भेद तक मिट गया था। फिल्मी दुनिया की चमक-दमक से दूर गुमनामी भरी जिंदगी जीनेवाली मुनव्वर सुल्ताना ने १५ सितंबर, २००७ को ८३ वर्ष की उम्र में इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

अन्य समाचार