मुख्यपृष्ठस्तंभकभी-कभी : पिता का आशीर्वाद...!

कभी-कभी : पिता का आशीर्वाद…!

यू.एस. मिश्रा

‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात!’ ये कहावत दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री लता मंगेशकर पर शत-प्रतिशत फिट बैठती है, जिन्होंने इंदौर के सिख मोहल्ले में शनिवार २८ सितंबर, १९२९ की रात दीनानाथ मंगेशकर की पत्नी श्रीमती शुद्धमती मंगेशकर की बहन के घर जन्म लेते ही जतला दिया था कि वो कोई आम नहीं, बल्कि खास कन्या है, जो पिता सहित अपने देश का नाम रोशन करेगी। मां शुद्धमती मंगेशकर के गुजराती होने के कारण खुद को ‘अड़धी गुजरातण’ कहनेवाली लता को महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर बसे अपनी नानी के छोटे से गांव थालनेर में रहने का ज्यादा मौका तो नहीं मिला लेकिन अपनी नानी से भजन, आरती, लावणी और पावागढ़ के गरबे के साथ ही पूरनपोली बनाना सीखनेवाली लता और उनकी बहनों को पिता दीनानाथ सुबह पांच बजे उठा देते और उनसे कोई-न-कोई बंदिश बड़ी मेहनत से गवाते।
मात्र ५ वर्ष की थीं लता मंगेशकर, जब उन्हें चेचक निकल आयी। शरीर में ऐसी कोई जगह नहीं बची थी, जहां माता ने अपना प्रकोप न दिखाया हो। ऐसा लग रहा था कि देवी या तो बच्ची को विकलांग कर देंगी या उसे मंगेशकर परिवार से हमेशा के लिए छीन लेंगी। रिस रहे घावों से कराहती बच्ची को केले के बड़े-बड़े पत्तों पर लिटाकर माई उसे लोरियां सुनाती, वहीं बच्ची भी कराहती हुई माई के सुर में अपना सुर मिलाती। चेचक के चलते बालिका लता का मुंह इतना सूज गया था कि अन्न का दाना भी गले से नहीं उतरता। माई बच्ची को बूंद-बूंद कर दूध पिलाती। डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि बच्ची की आंखें चली जाएंगी। लेकिन तीन महीने बाद जब लता स्वस्थ हुईं तो पिता ने बैंड बाजा बजवाकर उत्सव मनाया। अपने पिता से प्रभावित आठ साल की नन्हीं लता से एक दिन जब दीनानाथ ने कहा, ‘अगर तुम्हें एक बार विश्वास हो जाए कि जो तुम कर रही हो वह सही है, सत्य है, तो बस फिर किसी से डरना नहीं।’ उस समय पिता की इन गूढ़ बातों का अर्थ भले ही लता न समझ पायीं हों लेकिन बड़े होने पर जब कोई उनसे उनकी सफलता का राज पूछता तो वे कहती, ‘मुझे जो कुछ मिला है ईश्वर की कृपा, पिता के आशीर्वाद और लोगों की शुभकामनाओं से मिला है।’ अपनी सफलता का श्रेय अपनी पुत्री लता के घर में पड़े कदमों को देनेवाले दीनानाथ जब शाम को घर लौटते तो मां द्वारा कही गई हर अच्छी-बुरी, छोटी-बड़ी बात वो उन्हें बताती। जब माई उन्हें डांटती तो वे कहती, ‘क्यों नहीं बताऊं, वो मेरे बाबा हैं।’ अपनी लाडली लता को पिता दीनानाथ ने अपने जीवन में कभी हाथ तक नहीं लगाया। बस उन्होंने लता को केवल एक बार ही सजा दी थी। हुआ यूं कि लता एक गीत को ताल में नहीं गा पा रही थीं। तब दीनानाथ ने नन्हीं लता को आलमारी के ऊपर जहां गद्दे रखे जाते थे, वहां बैठा दिया और जब तक लता ने उस गीत को ताल में नहीं गाया तब तक उन्हें नीचे नहीं उतारा। माई जब सो जाया करती तो माई के बैग में रखे छोटे डिब्बे से पैसे निकालकर शरारती लता पंसारी की दुकान से खट्टी-मीठी गोलियां खरीद लाती और चटखारे लेकर खाती। लेकिन एक दिन जब पकड़ी गईं तो माई ने ऐसी खबर ली कि वे गोलियों का स्वाद भूल गईं । माई के हाथों कई बार पिट चुकी लता को माई की मार से ज्यादा डर उनके हाथों में पहने सोने के मोटे कंगनों से लगता था क्योंकि मार खाते वक्त वो कंगन बहुत लगते थे।
सांगली के ‘मुरलीधर शाला’ में लता का दाखिला करवाया गया। पहले ही दिन जब मास्टर साहब ने बोर्ड पर उनसे ‘श्री गणेशाय नम:’ लिखने को कहा तो लता ने लिख दिया। मास्टर साहब शाबाशी देते हुए बोले, ‘बेटी तुझे पूरे दस नंबर मिले।’ लेकिन अगले दिन लता के स्कूल के लिए तैयार होते ही जब आशा रोने लगी तब आशा को कमर पर उठाए हुए बालिका लता स्कूल पहुंच गईं और स्कूल पहुंचते ही गाना सुनाने लगीं। ये देख मास्टर साहब नाराज होते हुए बोले, ‘ये पाठशाला है अपने भाई-बहनों को बहलाने की जगह नहीं।’ मास्टर साहब की बातों को सुनकर लता तिलमिला गईं। इस घटना के बाद फिर उन्होंने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। एक दिन दीनानाथ ने माई से पूछा, ‘अभी तक लता और मीना क्यों नहीं आईं ? इस पर माई ने कहा, ‘आप ही ने तो भेजा है उन्हें संस्कृत सीखने के लिए। आप ही तो कहते हो कि संस्कृत सीखने से अन्य भाषाओं का ज्ञान अपने आप हो जाता है।’ जब लता और मीना घर वापस आईं तब पिता ने उन्हें अपने पास बुलाते हुए बड़े प्रेम से पूछा, ‘आज मास्टर जी ने क्या सिखाया?’ बेटियों ने कहा, ‘गायत्री मंत्र!’ पिता ने कहा, ‘अच्छा, गाकर सुनाओ।’ सामने बैठी लता और मीना के गायत्री मंत्र गाते ही दीनानाथ के मुंह से निकला, ‘सबकी सब सुर में हैं।’ बेटियों के शब्दों के उच्चारण से ज्यादा उनके सुरों से प्रभावित होनेवाले दीनानाथ ने आंखों को मूंदते हुए ‘मंगेश-मंगेश’ की रट लगा दी। ऐसे लगा जैसे मानों अपनी बेटियों को वे कोई दैवीय आशीर्वाद दे रहे हों!

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