मुख्यपृष्ठग्लैमरकभी-कभी : आसान नहीं था लताजी के सुर से सुर मिलाना

कभी-कभी : आसान नहीं था लताजी के सुर से सुर मिलाना

यू. एस. मिश्रा

आज हमारी फिल्में हॉलीवुड फिल्मों को टक्कर देती नजर आती हैं लेकिन एक जमाना ऐसा भी था जब भारतीय फिल्में टेक्नोलॉजी के मामले में इतनी आगे नहीं थीं, इसके बावजूद कलाकार अपनी मेहनत और लगन से फिल्मों सहित अपने किरदार में जान फूंक देते थे। अपने जमाने की मशहूर हीरोइन आशा पारेख जब अपनी एक फिल्म की शूटिंग कश्मीर की वादियों में कर रही थीं, तब कश्मीर में पड़ रही तेज धूप में लगे रिफ्लेक्टर्स से आ रही तेज रोशनी के चलते उनकी आंखें लाल हो गर्इं, जिसके चलते उन्हें फिल्म की शूटिंग तक रोक देनी पड़ी।
बेसुरा गाती हो- स्टेज पर डांस करते हुए बिमल राय ने जब नन्हीं आशा पारेख को देखा तो उन्होंने आशा पारेख से पूछा कि फिल्मों में काम करोगी। बिमल राय की बात समझ में न आने के बावजूद आशा ने काम करने के लिए हामी भर दी और फिल्म ‘बाप बेटी’ से उनका फिल्मों में पदार्पण हुआ। बचपन में रिकॉर्ड पर डांस करनेवाली आशा पारेख को एक बार डांस करते हुए प्रेमनाथ ने देखा। स्कूल के एक फंक्शन में जब आशा पारेख की मां ने प्रेमनाथ को आमंत्रित किया तो प्रेमनाथ ने कहा कि अगर आशा डांस करेगी तो मैं जरूर आऊंगा। अब आशा पारेख की मां मोहनलाल पांडे के पास पहुंचीं और उन्होंने उनसे आग्रह करते हुए कहा कि इसके लिए एक आइटम डांस बना दीजिए, ताकि ये स्टेज पर परफॉर्म कर सके। इसके बाद आशा पारेख ने बाकायदा क्लासिकल डांस सीखा। बचपन से ही वैâमरा प्रâेंडली होने के बावजूद जब शशधर मुखर्जी की फिल्म ‘दिल देके देखो’ से बतौर हीरोइन आशा पारेख ने फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत की तो फिल्म के गीतों की शूटिंग के दौरान वे ठीक से लिपसिंक नहीं कर पा रही थीं। बकौल आशा पारेख, ‘मुझे गाना नहीं आता था और मैं बहुत बेसुरा गाती थी।’ शॉट के बाद शम्मी कपूर मजाक में आशा पारेख से कहते, ‘तुम गाना मत। तुम इतना बेसुरा गाती हो कि मुझे हंसी आती है।’ खैर, शम्मी कपूर ने उनकी मदद करते हुए किस तरह गाने पर लिपसिंक किया जाता है, उन्हें लिपसिंक करना सिखाया। बकौल आशा पारेख, ‘आजकल बहुत सारी सुविधाएं हैं। आउटडोर शूटिंग के दौरान वैनिटी वैन होती है। लेकिन उस जमाने में वैनिटी वैन नहीं थी। अगर कपड़े बदलने होते थे तो पेड़ों के पीछे दो-चार साड़ियां बांध के हम लोग कपड़े बदलते थे। शूटिंग के वक्त हम लोगों को काफी दिक्कत होती थी। बेहद स्ट्रॉन्ग रिफ्लेक्टर्स हमारे चेहरे पर मारे जाते थे। फिल्म ‘आन मिलो सजना’ की शूटिंग के दौरान तेज रिफ्लेक्टर्स के चलते मेरी आंखें तीन-चार दिनों तक इतनी लाल हो गई थीं कि एक दिन मैं शूटिंग ही नहीं कर पाई। जब आंखें ठीक हुर्इं उसके बाद दोबारा शूटिंग शुरू हुई। उस जमाने में हम लोगों को इतनी सुविधाएं नहीं मिल पायीं, जितनी आज कलाकारों को मिलती हैं। आज फिल्मों में किसी भी गायक कलाकार के लिए गीत गाना आसान हो गया है। लेकिन उस जमाने में ढेर सारे साजिंदों के साथ एक ही टेक में रिकॉर्डिंग ओके हो जाया करती थी। फिल्म ‘आये दिन बहार के’ के गीत ‘सुनो सजना पपीहे ने…’ को लता जी ने इतने बेहतरीन ढंग से गाया है कि उस गीत के फिल्मांकन के दौरान लता जी के सुर से सुर मिलाकर गीत को गाते हुए मेरा दम निकल जाता था, मेरी सांस टूट जाती थी।’
मुझे जमीन पर फेंक दिया- खैर, परफेक्शन के चक्कर में १९६६ में प्रमोद चक्रवर्ती के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘लव इन टोक्यो’ के एक गीत ‘ले गई दिल गुड़िया जापान की पागल मुझे कर दिया…’ के फिल्मांकन के दौरान भी कुछ ऐसा घटित हुआ कि आशा पारेख के होश उड़ गए। इस गीत में परफेक्शन लाने के लिए आशा पारेख को हाथों में उठाकर भाग रहे जॉय मुखर्जी ने आशा पारेख को जमीन पर ही फेंक दिया। बकौल आशा पारेख, ‘फिल्म के इस गीत में जॉय मुखर्जी को मुझे हाथों में उठाकर भागना था। खैर, जैसे ही शूटिंग शुरू हुई और वैâमरा जॉय मुखर्जी की ओर पैन हुआ जॉय मुखर्जी मुझे अपने हाथों में उठाकर भागने लगे। अभी वो कुछ दूर ही लेकर मुझे भागे थे कि उन्होंने धड़ाम से मुझे जमीन पर फेंक दिया। मैं जमीन पर धाड़ से जा गिरी। उस वक्त मेरी समझ में बिल्कुल भी नहीं आया कि मेरे साथ अचानक ये क्या हुआ। इस तरह अचानक नीचे फेंके जाने से मुझे चोट लग गई। जैसे-तैसे मैं उठ तो गई लेकिन मेरे कदम जमीन पर सीधे नहीं पड़ रहे थे। सीधे चलने की बजाय चोट लगने के कारण मैं लंगड़ाकर चल रही थी। तभी वहां सेट पर गाने को शूट कर रहे सुरेश मास्टर ने मुझसे कहा, ‘तुम इसी तरह लंगड़ाकर चलो।’ उनकी बात को सुनकर मैं अवाक रह गई और उसी हालत में लंगड़ाते हुए ही गाने के उस सीन को शूट किया।’

अन्य समाचार