मुख्यपृष्ठग्लैमरकभी-कभी : किसिंग सीन से मचाया था तहलका...!

कभी-कभी : किसिंग सीन से मचाया था तहलका…!

यू.एस.मिश्रा। एक जमाना था जब लड़कियों को फिल्म इंडस्ट्री में काम करना तो दूर की बात घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी थी। ऐसे दौर में बिंदास स्वभाव की एक अभिनेत्री ने न केवल फिल्मों में कदम रखा, वरन अपनी पहली ही फिल्म में हीरो के साथ एक लंबा किसिंग सीन देकर उन्होंने खलबली मचा दी। भारतीय फिल्म उद्योग को आगे बढ़ाने में अपना सक्रिय सहयोग देनेवाली इस अभिनेत्री ने न केवल भारतीय फिल्मों को ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि फिल्मों के कलात्मक एवं तकनीकी उत्थान के लिए वे हमेशा प्रयत्नशील रहीं। मधुबाला, दिलीप कुमार जैसी कई प्रतिभाओं को फिल्म इंडस्ट्री में लाने का श्रेय भी इस अभिनेत्री को ही जाता है।
देविका रानी का जन्म आंध्र प्रदेश के बाल्टेयर गांव में ३० मार्च, १९०८ को हुआ था। कर्नल एम.एन. चौधरी की बेटी देविका ९ वर्ष की उम्र में शिक्षा हासिल करने के लिए इंग्लैंड चली गर्इं और वहीं पर उन्होंने ‘रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट’ में एक्टिंग की पढ़ाई की। फिल्मों के साथ ही वहां उन्होंने वस्त्र डिजाइनिंग का काम भी सीखा। १९२८ में उनकी मुलाकात प्रसिद्ध फिल्म निर्माता हिमांशु राय से हुई और हिमांशु राय की फिल्म निर्माण संस्था से जुड़कर देविका रानी कलाकारों की पोशाकों के चयन में अपनी राय देने लगीं। बोल्ड एंड बिंदास स्वभाव वाली खूबसूरत देविका रानी उस जमाने के हिसाब से बहुत ही मॉर्डन थीं। उनकी खूबसूरती को देख हिमांशु राय उनके दीवाने हो गए। हिमांशु राय के साथ परिणय सूत्र में बंधने के बाद हिमांशु राय और देविका रानी ने लंदन में ‘हिमांशु राय इंडो-इंटरनेशनल टाकीज’ के बैनर तले एक अंग्रेजी फिल्म ‘कर्मा’ बनाई, जिसका बाद में हिंदी रूपांतरण किया गया। किसी भारतीय द्वारा बनाई गई ये अंग्रेजी संवादों वाली पहली फिल्म थी। अपने पति हिमांशु राय के साथ फिल्म में चार मिनट का लंबा किसिंग सीन देकर उन्होंने खलबली मचा दी। १९३४ में हिमांशु राय ने मुंबई में ‘बॉम्बे टाकीज’ की स्थापना की। ‘बॉम्बे टाकीज’ की फिल्म ‘जवानी की हवा’, ‘कर्मा’, ‘जीवन नैया’, ‘अछूत कन्या’ जैसी कई फिल्मों में उन्होंने काम किया। मंझी हुई गायिका न होने के बावजूद देविका रानी के गाये गए गीतों ‘मैं बन की चिड़िया बन के बन-बन डोलूं रे…’, ‘अंखियां मोरी रैन की जागीं…’, ‘नगरी लागे सूनी सूनी…’, ‘कोई क्या जाने घायल मन की पीर…’ को श्रोताओं का भरपूर प्रतिसाद मिला था। १६ मई, १९४० को हिमांशु राय की मौत के बाद लोगों को लगा था कि देविका रानी ‘बॉम्बे टॉकीज’ के कार्यभार को नहीं संभाल पाएंगी। लेकिन पति हिमांशु राय की मौत के बाद लोगों की सोच पर पानी फेरते हुए देविका रानी ने न केवल ‘बॉम्बे टॉकीज’ का कार्यभार संभाल लिया, बल्कि उन्होंने ‘बंधन’, ‘झूला’, ‘किस्मत’ जैसी फिल्मों का निर्माण भी किया। १९४२ में मुमताज जहां देहलवी उर्फ मधुबाला को बेबी मुमताज के नाम से बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट देविका रानी ने ही अपनी फिल्म ‘बसंत’ में ब्रेक दिया था। १९४४ में यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार को अपनी फिल्म ‘ज्वार भाटा’ के जरिए फिल्मों में ब्रेक देने का श्रेय भी देविका रानी को ही जाता है। उन्होंने ही यूसुफ खान को नया फिल्मी नाम दिलीप कुमार दिया था। फिल्म ‘ज्वार भाटा’ के प्रोडक्शन पर काम करने के दौरान देविका रानी की मुलाकात प्रसिद्ध रूसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रोरिख से हुई। उनकी इस मुलाकात ने देविका रानी की जिंदगी बदल दी। स्टूडियो का कार्यभार संभालने के साथ ही अपनी बढ़ती हुई उम्र को देखते हुए देविका रानी ने पैâसला किया कि अब वे फिल्मों में हीरोइन की भूमिका नहीं निभाएंगी सिर्फ फिल्में ही प्रोड्यूस करेंगी। लेकिन बाद में प्रोड्यूस की गर्इं उनकी फिल्में नहीं चलीं और उन्होंने ‘बॉम्बे टॉकीज’ के शेयर बेच दिए और स्वेतोस्लाव रोरिख से विवाह कर १९४५ में फिल्मों से रिटायरमेंट लेकर बंगलुरू शिफ्ट हो गईं।
अपने करियर में १५ फिल्मों में काम करनेवाली और लगभग ६० गाने गानेवाली नायिका-गायिका देविका रानी एक प्रतिभा संपन्न अभिनेत्री थीं। उनके सहज, स्वाभाविक और मर्मस्पर्शी अभिनय ने उन्हें दर्शकों की पसंदीदा अभिनेत्री बना दिया था। वे ऐसी पहली अभिनेत्री थीं, जिन्हें १९५८ में ‘पद्मश्री’ अवॉर्ड से नवाजा गया। १९६९ में जब ‘दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड’ की शुरुआत हुई तो सर्वप्रथम ‘दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड’ देविका रानी को ही दिया गया। १९९० में सोवियत रूस द्वारा ‘सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड’ से सम्मानित देविका रानी के पति स्वेतोस्लाव रोरिख ने १९९३ को इस दुनिया से विदा ले ली। संतान न होने की वजह से एक साल तक लगभग अकेले तन्हा जीवन गुजारने वाली देविका रानी ने ९ मार्च, १९९४ को ८६ वर्ष की उम्र में इस सांसारिक रंगमंच को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह दिया और पीछे छोड़ गर्इं अपनी यादें और अथाह धन-संपत्ति, जिसका कोई वारिस न था।

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