मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव : भैंस और भंउकी भरि पिसान

काहें बिसरा गांव : भैंस और भंउकी भरि पिसान

पंकज तिवारी

झूलन ददा के घर में बिटिया पैदा हुए करीब साल भर हो गया। नाम है गुड़िया। बेचारी गुड़िया को पिलाने के लिए कायदे का दूध भी नहीं। दादी कब से कहे जा रही हैं कि एक ठो भैंस ले लीजिए। बच्ची के लिए दूध का भी काम चल जाएगा कुछ पतोहू भी ले लेगी। हम बूढ़ा-बुढ़ऊ भी खूब दूध पीकर मस्त रहेंगे। हड्डी मजबूत रहेगी। उमिर कुछ और बढ़ जाएगी। आखिर बुढ़ौती सबको खराब कर ही देती है, दूध पीकर कुछ तो संवार लीजिए। सारा पैइसवा टिक्ठी में बांधकर ले जाइएगा का? खा-पीकर कुछ जान तो लीजिए, हमहूं के जनवा दीजिए। बेचारी नतिनिया के दूध पीया-पीया के मोट करे के मौका भी नहीं दे रहे हैं आप। बेचारा बेटवा परदेश में पड़ा कमा रहा है तो कम-से-कम ओकर बहुरिया तो खा-पीकर खुश रहे। ओकर बिटियवा दूधे बिना न झंखे, बहुरिया अपने ससुर पर गर्व करे। ई आधा लीटर मोल के दूधे में वो भी जिसमें आधा पानी मिला होगा मतलब पाव भर दूध में का नहाई का निचोड़ी वाला हाल हो गया है। बहुरिया बोलती नहीं है तो का उसे खाने-पीने की चाहत नहीं होगी। मेरे रोज-रोज के कहने को मजाक समझ लिए हैं आप। कहेगी और कह के चुप हो जाएगी यही नऽ। तो सुनिए, मैं आपको बता दूं आज बिना भैंस आए मैं खाना नहीं खानेवाली समझ लीजिए। पैसा कम पड़ रहा है तो हमार गहना ले जाकर धर दीजिए पर भैंस जरूर लेकर आइए।
एक समय था जब घरों में गाय, भैंस, गोरू का खूब-खूब खयाल रखा जाता था। उनके खाने-पीने रहने तक की व्यवस्था बड़े तरीके से होती थी। चरी, बरसीन की खेती अलग से होती थी। गोबर से खाद और खाद को सिर पर लादे खेतों तक पहुंचाने की व्यवस्था होती थी। दूध, दही, मट्ठा तो पूछिए ही मत। किसी के आ जाने पर सीधे बड़का गिलास भर कर दूध पीने के लिए परसा जाता था। मट्ठा तो लोग मटका भर-भर कर ढो ले जाते थे। कम पड़ने पर पानी मिलाकर देते थे पर देते सबको थे। पीने वाला भी खुश पिलाने वाला भी खुश। सुबह सब्जी-दाल नहीं बनी तो दही-मट्ठे से ही खाकर लोग दिन भर के लिए मस्त हो जाते थे पर आज दही नोहर हो गया है, पैकेट वाला छोड़ दें तो। मट्ठा पूरे गांव में लालटेन लेकर ढूंढ़ने से भी नहीं मिल रहा है। होत भेनसार सारा दूध लिए सब बाजार पहुंच जा रहे हैं। ई डेरी नामक राछसवा पता नहीं कहां से आ गया है। गांव, जहां दूध से लोगों को दुआएं दी जाती थी, दूध के गिलास में नजर झाड़कर बच्चों को पिलाया जाता था। सुबह-शाम बच्चों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर गरियाकर जबरदस्ती दूध उसके मुंह में ढकेला जाता था। दो-दो, तीन-तीन अंगीठिया बनाकर दूध सहेजा जाता था। घी इकट्ठा किया जाता था। वही गांव आज एक गिलास मट्ठा को तरस रहा है।
मैं ये नहीं होने दूंगी, दादी झूलन ददा से बिना ब्रेक वाली गाड़ी के स्पीड से कहे जा रही थी।
झूलन ददा परेशान हो उठे थे। इतनी हठी तो ये न थी। इसे वैâसे समझाऊं कि इतनी आसानी से वैâसे मिल जाएगी भैंस। ढूंढ़ने के लिए कम-से-कम दो दिन तो चाहिए महारानी।
अरे तऽ भोजनवा मिलेगा बूढ़ा? नहाने के बाद झूलन ददा खाना मांगते हुए बोले।
नाहीं हो बुढ़ऊ। पहिले भैंस तब भोजन।
झूलन ददा गुस्से में लोटा फेंकते हुए उठ गए। घर से बाहर कहीं दूर हट गए।
दादी जोहती रहीं, जोहते-जोहते रात हो गई। ददा नहीं आए। रात दस बजे परेशान दादी दिया जराये ताक रही थीं कि अचानक टन्…टन्…टन्…टन्… घंटी के साथ ही गोरू का पदचाप सुनाई दे गया। दादी के कान खड़े हो गए। दीया लिए धाय पड़ीं दादी। भैंसिया हमार आइ गइ का?
हे बूढ़ा आवऽ हो… पूजा पाठ करऽ… आइ गइ भंइस तोहार।
पूरा खानदान अपना-अपना दीया लिए बाहर आ गया। खुशी सबके चेहरे पर चमक उठी। ददा भैंस बांधकर भूसे की तरफ दौड़ पड़े, दादी टीकने के लिए हल्दी खातिर भागीं। लोलारक अपने घरे से बरसीन लिए आ गए। भंउकी भरि पिसान लिए अपने घरे से केशव भी दौड़ पड़ा। गांव में एक भैंस आ गई कम-से-कम खानदान भर को मट्ठा तो नसीब हुआ, चचा भगेलू बोल उठे।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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