कर्म बोलता है

यहां कर्म बोलता है
विचार थिरकता है
आश्वासन नाचता है
समय गाता है।
आजकल तो
झूठ भी उछलता है
और चढ़ जाता है
सर पर
बैताल की तरह।
और बोलवाता है
विक्रमादित्य से
वही, जो वह चाहता है।
मनमाना डाहता है।
कभी-कभी तो
निःशब्द कर देता है।
वक्त को अपने शब्दों से।
जो हमेशा निरर्थक होते हैं
अज्ञान वर्धक होते हैं
और विस्फोटक भी।
जिसका राष्ट्रगान करता है
असमय विवश होकर
कभी-कभी तो
सचेत होकर भी
अपने अज्ञान में ।।

-अन्वेषी

अन्य समाचार