" /> कश्मीर क्रंदन… फूस का छप्पर आपका है…

कश्मीर क्रंदन… फूस का छप्पर आपका है…

कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों पर हुई बर्बरता और उसके बाद के पलायन को ३२ वर्ष बीत चुके हैं। घाटी में एक बार फिर वही खौफनाक अध्याय दोहराया जा रहा है। उस पर दुर्भाग्य यह कि इस बार भी उक्त मुद्दे पर वही विवश मूक बधिरता हावी है। कश्मीरी पंडितों और सिखों के दर्द पर अतिरेक का दावा करनेवाले सुन्न खड़े हैं। शांति बहाली के सारे सरकारी दावे धोबी पछाड़ खा चुके हैं। एक राष्ट्र के तौर पर हमारी याददाश्त कमजोर पड़ रही है। ऐसे में १९९० के कुछ स्याह पन्ने पलटना बेहद जरूरी है।

आज भी तो बिल्कुल वैसा ही डर और सकपकाहट लगभग हर उस कश्मीरी पंडित के चेहरे पर है, जैसा उस दिन अभय कौल के उस बेनामी फोन के बाद उनकी पत्नी आरती के मन मस्तिष्क पर थी। अभिमन्यु को अच्छी तरह से याद है कि अब भी एक सुरक्षाकर्मी अभय प्रताप की बात सुन रहा था। उसे पूरी तरह से अंदाजा था कि यह जिहादियों का फोन था। अभय प्रताप शांति से अपने ऑफिस के लिए निकल ही रहे थे कि उस सुरक्षाकर्मी ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘सर प्लीज, आप बाहर मत जाइए सर।’
‘मैं घर पर नहीं रुक सकता सोल्जर। ऐसे मैं उन्हें गलत मैसेज दूंगा कि मैं डर गया। इससे उनके हौसले और बुलंद हो जाएंगे, जो मैं नहीं चाहता।’ यह बातचीत चल ही रही थी कि फिर एक बार फोन बजा। इस बार फोन पर अभय प्रताप के सहायक कृष्णावतार थे। वे बहुत डरे हुए थे। ‘उन्होंने अखबार के ऑफिस को आग लगा दी है, सर! पूरी बिल्डिंग जल रही है। सब कुछ खत्म हो रहा है, सर! आप जल्दी आ जाइए।’ अभय प्रताप कुछ पल के लिए एकदम शांत हो गए। इतने सालों की मेहनत से बनाया हुआ मुकाम अब जलकर खाक होनेवाला था। पल दो पल तो उन्हें समझ में ही नहीं आया कि क्या करना है, पर तुरंत उन्होंने अपना होश संभाला और पूछा- ‘तुम कहां हो… बाकी स्टाफ ठीक है न?’
‘मैं और बाकी स्टाफ वहां से निकल आए सर। बाजू की गली से आपको फोन कर रहा हूं। दमकल की गाड़ियों ने भी आने से मना कर दिया। कुछ कीजिए, सर… सब खत्म हो जाएगा।’
‘तुम अपने घर पहुंचो, अवतार… मैं कुछ करता हूं।’ अभय प्रताप ने उसका फोन रखकर तुरंत अग्निशमन दल को फोन किया। फोन की रिंग जाती…रही, जाती रही और हर एक सेकंड अभय प्रताप मन में कहते रहे… उठाओ, जल्दी उठाओ फोन। ‘हैलो…’ किसी ने फोन उठाकर कहा। ‘हैलो, मैं अभय प्रताप बोल रहा हूं। ‘द ट्रुथ’ के ऑफिस में आग लग गई है। आप जल्दी वहां गाड़ियां भेज दीजिए। फौरन, मैं भी पहुंचता हूं।’
‘नहीं जा सकते…’ सामने से डरी हुई आवाज में जवाब आया।
‘क्यों?’ अभय प्रताप ने चिल्लाकर पूछा। ‘ड्राइवर नहीं है, जनाब।’
‘ड्राइवर क्यों नहीं है? और ड्राइवर नहीं है तो तुम चले आओ।’
‘ड्राइवर हैं पर जाएंगे नहीं। उन्होंने यहां कागज चिपकाया है कि जो कोई भी ‘द ट्रुथ’ के वहां जाएगा… अपनी जान से जाएगा।’ अभय प्रताप ने फोन काटकर सीधा डी.एस.पी. के ऑफिस में फोन लगाया। ‘हैलो… हां, मैं अभय प्रताप बात कर रहा हूं।’
‘जी बोलिए, सर।’ आसिफ ने उधर से जवाब दिया। ‘ये क्या व्यवस्था हो रही है शहर में सुरक्षा की? कोई भी आकर सरकारी मुलाजिमों को धमकाकर जाता है और डर के मारे वे अपना काम नहीं कर रहे।’
‘हुआ क्या है?’ आसिफ ने अनजान बनते हुए पूछा। ‘जी, मेरे ऑफिस में आग लगी है। आप तुरंत उसे बुझाने का कुछ इंतजाम कीजिए। मैं भी वहां पहुंच रहा हूं।’
‘जनाब, अब आपके सिर पर बंदूक रखकर कोई कुछ करने को कहता है तो मजाल है किसी की, जो उसकी हुकुम खिलाफी करे? उन बेचारों को क्यों कोस रहे हैं आप?’
‘आपके पास तो उस बंदूक का जवाब बंदूक से देने की ताकत है न? कुछ कीजिए…’ अभय प्रताप बरसे। आसिफ उस तरफ से बेफिक्री से बोले, ‘सौ बात की एक बात, जनाब। सच कहूं तो मैं इसमें कुछ कर नहीं सकता। यह मजहबी मामला हो चुका है। मेरा परिवार भी इसी शहर में रहता है। आप समझ सकते हो। और जनाब, सिर्फ बिल्डिंग ही जली है न… खैर मनाइए कि बिल्डिंग के अंदर आप नहीं थे। क्यों आप अपने साथ दूसरों की जान खतरे में डाल रहे हो? आप समझ रहे हो न मैं क्या कह रहा हूं?’
‘जी, जो समझना था… मैं समझ चुका हूं!’ अभय प्रताप ने गुस्से में फोन रख दिया और उतने ही गुस्से से घर के बाहर चले आए और तेज रफ्तार के साथ अपनी गाड़ी की तरफ बढ़े। उन्हें जल्द-से-जल्द अपने ऑफिस पहुंचना था। तभी सेना की एक गाड़ी उनके आंगन में रुकी। कमांडोज ने उन्हें घेर लिया और उनमें से एक ने कहा- ‘सर, आपकी जिम्मेदारी हम पर है। हम अभी आपके अखबार की तरफ से ही आए हैं। वो कोई मुजाहिदी नहीं थे। जिहादियों की एक पूरी पलटन थी। जिहाद कर रहे हैं वे। जुनून सवार है उन पर। उनके रास्ते में जो भी आएगा, मारा जाएगा। आपको कुछ हो गया तो सेना पर सवाल उठाए जाएंगे। आप हमारी सहायता कीजिए और प्लीज घर में रहिए सर, वरना मुझे आपको आदेश देना पड़ेगा। जो मैं करना नहीं चाहता। हमारी भी मजबूरी समझिए सर।’ उस ऑफिसर ने अभय प्रताप से कहा।
अभय प्रताप समझ गए थे कि मेरे अहं के लिए मैं सेना का नाम खराब नहीं कर सकता। वे अपने घर के अंदर लौट गए, पर उनका एक-एक पल परेशानी में डूबा था और फिर फोन बजा। सामने वही लोग थे, ‘तेरी देशभक्ति हमने जलाकर राख कर दी है, अभय प्रताप। अब तो हमारे साथ आ जा।’
‘देशभक्ति कागज के चंद पुर्जों में वैâद नहीं हो सकती। तुम्हारी जहालत का नमूना पेश किया है तुम लोगों ने। देशभक्ति उस जली हुए बिल्डिंग में नहीं, मेरे विचारों में है, हमारे जमीर में है। मेरे साथ जुड़े ऐसे हजारों लोगों में है।’ अभय प्रताप गरजकर बोले। ‘भाषण बंद कर! आज शाम तक का वक्त देता हूं तुमको। हम अभी भी चाहते हैं कि तू हममें शामिल हो जाए। वरना तेरे और तेरे लोगों के साथ जो करेंगे, तू खुद देख ही लेगा। बस, शाम तक का वक्त है… वरना ईशा की नमाज हम तेरे घर आकर पढ़ेंगे।’ फोन एक बार फिर कट गया। अभय प्रताप का दिमाग गुस्से से भरा हुआ था। घर में ही बैठकर वे अपना नया आर्टिकल लिखने बैठे।
जिसका शीर्षक था- ‘
जलते घर को देखनेवालों फूस का छप्पर आपका है।
आपके पीछे तेज हवा है आगे मुकद्दर आपका है।’
(क्रमश:)
(आशीष कौल वरिष्ठ मीडियाकर्मी और डॉक्टोरल रीसर्च स्कॉलर हैं। कश्मीर पर लिखी इनकी किताबें रीफ्यूजी कैंप, दिद्दा-द वॉरियर, क्वीन ऑफ कश्मीर, रक्त गुलाब बेस्टसेलर रही हैं।)