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कश्मीर में शांति लौटने के दावों के बीच पिस रहे हैं कश्मीरी पंडित

  • कश्मीरी पंडितों का क्या कसूर?

सुरेश एस. डुग्गर / जम्मू
कश्मीर में तमाम दावों के बावजूद लक्षित आतंकी हमले और हत्याओं के न रुक पाने का परिणाम यह है कि कश्मीरी पंडित समुदाय के सदस्य सैंडविच बन गए हैं। इनमें अब वे भी शामिल हो गए हैं जो कश्मीर में आतंकवाद के बावजूद कई सालों से टिके हुए थे।
ताजा घटना कश्मीरी पंडित सुनील भट की हत्या की है। वह अपने परिवार के साथ कई सालों से अपने मुस्लिम पड़ोसियों के आश्वासन पर कश्मीर में ही टिका हुआ था लेकिन दुर्भाग्यवश आतंकी हमले से न तो उसके प़ड़ोसी उसे बचा पाए और न ही उसके पड़ोसी उस कश्मीरियत को बचा पाए जिसके मायने मिल-जुल कर कश्मीर में रहना होता है।
आधिकारिक रिकॉर्ड बताता है कि एक साल के अरसे में पांच कश्मीरी पंडितों की हत्या कश्मीर में हुई है। इनमें वे भी शामिल हैं जो प्रधानमंत्री पैकेज के अंतर्गत कश्मीर में नौकरी करने के लिए राजी हुए हैं। हालांकि पिछले कई महीनों से पीएम पैकेज वाले अधिकतर सरकारीकर्मी जम्मू में डेरा और धरना जमाए बैठे हैं। गौरतलब है कि पिछले साल जब आतंकियों ने बाहरी लोगों के साथ ही कश्मीरी पंडितों को भी ताबड़तोड़ निशाना बनाना शुरू कर दिया था तब सरकार ने उन्हें सुरक्षा का आश्वासन दिया था लेकिन कश्मीरी पंडित समुदाय और उनके संगठन इससे आश्वस्त नहीं हो पाए थे क्योंकि ऐसे आश्वासनों के बावजूद आतंकी हमलों में मासूमों की जानें जाती रहीं हैं। ताजा मामले में कश्मीरी पंडित सुनील भट की हत्या के बाद भी प्रशासन आश्वासनों के अलावा कोई कड़ा कदम नहीं उठा पा रहा है सिवाय इस दावे के कि सुरक्षाबल आतंकवादियों पर फाइनल असाल्ट के करीब पहुंच चुके हैं और अगले साल तक कश्मीर को आतंकवाद से मुक्ति मिल जाएगी।

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