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कश्मीरी पंडितों को प्यारी है अपनी माटी, असुरक्षित है घाटी!

सामना संवाददाता / जम्मू
कश्मीर घाटी में सभी सदमे में है। लोग भय और चिंता में हैं। आंदोलित होकर कह रहे हैं, अब और नहीं। यह सब कश्मीरी मुस्लिमों में नहीं है, जैसा कि अक्सर कहा जाता हैं, बल्कि कश्मीर में नौकरियां कर रहे हिंदुओं और पंडितों में है, जो अब कश्मीर घाटी में नहीं रुकना चाहते हैं, जिन्होंने अपने जीवन और अस्तित्व पर खतरे के भय और भविष्य की अनिश्चितताओं के बावजूद घाटी में अपनी सेवाएं देना मंजूर किया था। वे हिंदू, कश्मीरी पंडित अब रोष और गुस्से से भरे हुए हैं। राजस्व विभाग के लिपिक कश्मीरी पंडित राहुल भट्ट और डोगरा समुदाय की शिक्षिका रजनी बाला की हत्याओं के बाद घाटी में जो हुआ, उसका वहां रहने वाले पंडितों व डोगरा हिंदुओं के मानस पर गहरा प्रभाव पड़ा है। तीन दशक पूर्व अपनी ज़ड़ों से उखड़ने के लिए मजबूर किया गया था लेकिन अब वे खुद अपनी मातृभूमि छोड़ना चाहते हैं। उनकी एक ही मांग है, ‘हमें कश्मीर में नहीं रुकना।’ ऐसा पहली बार हो रहा है, जब आतंकवाद और हिंदुओं की लक्षित हत्याओं के कारण घाटी खूनी खेल देख रही है। घाटी में लक्ष्य बनाकर हिंदुओं की हत्याएं हो रही और प्रशासन की नाकामी पर गुस्सा है। जबकि अनुच्छेद ३७० को निरस्त करते हुए मोदी सरकार ने पंडितों को वापस घाटी में बसाने की बातें की थी, उनसे बड़े लुभावने वादे किए गए थे लेकिन एक बार भी केंद्र सरकार और न ही स्थानीय प्रशासन ने घाटी में रह रहे या सरकारी नौकरी देकर बसाये गए हिंदुओं पर आतंकी जुल्म ढा रहे है।

 

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