मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकथा अनंता : संभलकर दांत निपोरें

कथा अनंता : संभलकर दांत निपोरें

डाॅ. अनंत श्रीमाली।  कुछ जन्‍मजात गंभीर होते हैं तिस पर महंगाई ने मनुष्‍य को मनहूस कर मुस्‍कुराना छीन लिया। पहले तो आदमी बुक्‍का फाड़, फोकट में हंस देता था। हंसते थे तो आसमां में ३२ सितारे जगमगाते थे। जिंदगी बहुत छोटी है, हंसो कि जब तक तुम्‍हारे दांत हैं, बुढ़ापे में दांत साफ हों, उसके पहले उन्‍हें साफ करा लो, कारण आपके दांत राजनीति की तरह आड़े-तिरछे, पीले पच्‍च हों तो दांत न निपोरें। आप सोचते होंगे कि डेंटिस्‍ट से दांतों को लेवल में ले आएंगे पर अब जेब लेवल में आ जाएगी क्‍योंकि दांतों पर १८ प्रतिशत वस्‍तु-सेवा कर लगेगा। दांत वस्‍तु हो गए और हंसने-हंसाने की शाश्‍वत परंपरा पर ‘सेवा कर’ लगेगा। पहले दांतों का इलाज ‘स्‍वास्‍थ्‍य’ के लिए जरूरी था। अब ये ‘कॉस्‍मेटिक’ उपचार मानकर जीएसटी के दायरे में है। भविष्‍य में पता नहीं, किस-किस पर जीएसटी लगेगा? तो भय्ये या तो जेब ढीली करो या मुस्‍कुराना छोड़ दो। वैसे भी महंगाई में ठहाका मारकर हंसने की किसकी हिम्‍मत है। तो मुंह बंद रखने में ही भलाई है। अलबत्ता राज्‍य सरकार ‘राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्य मुख’ कार्यक्रम के अंतर्गत खड़वली के आदिवासियों के दांत चमकाने में लगी है। लगे रहो मुन्ना भाई, जब तक कि आदिवासियों का जीएसटी से पाला पड़े या समझ आए कि ‘मकड़ी जैसे मत उलझो, तुम गम के ताने-बाने में, तितली जैसे रंग बिखेरो, हंसकर इस जमाने में’…
सरकारी सेवा तीर्थ यात्रा समान
सुलतानपुर के अपर जिला जज जगदीश प्रसाद शुक्‍ल अपनी जमीन सरकार को नहर बनाने हेतु देने के लिए तैयार नहीं हैं, वे खुदाई मशीन के आगे कोट-टाई पहनकर लेट गए, न्‍याय देनेवाले न्‍याय के लिए लड़ रहे हैं। दूसरी तरफ मुंबई उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायमूर्ति एस.जे. काथावाला २३ मार्च को सेवा निवृत्त हुए। वे ऐसे जस्टिस के रूप में लोकप्रिय रहे हैं, जिन्‍हें घंटों तक मामलों की सुनवाई के लिए जाना जाता है। उन्‍होंने गर्मी की छुट्टी से पहले लंबित मुकदमों को निपटाने के लिए सुबह साढ़े तीन बजे तक लगातार सुनवाई कर इतिहास रचा। उन्‍होंने अपनी सरकारी न्‍यायिक यात्रा को ‘तीर्थ’ करार दिया। काम के लिए इतने समर्पित कि वे अदालत के अवकाश में भी काम करते थे। काथावाला एनसीबी के मुंबई निदेशक समीर वानखेड़े, पिता ज्ञानदेव वानखेड़े और एनसीपी नेता व मंत्री नवाब मलिक मानहानि केस से उपजे एमएलसी विवाद, अभिनेत्री कंगना रनौत के कार्यालय को ढहाने के मामले से जुड़े रहे। बहरहाल, ऐसे जस्टिस हों तो हमारे यहां ढेरों लंबित मुकदमों में कमी आ सकती है। बिखरे पड़े हैं खुशियों के मोती यहां-वहां, तू अपनी जिंदगी में कभी डूब के तो देख…
मौन भी मुखर होता है
महिलाओं के बोलने पर खूब बोला जाता है। महिलाएं बिना विषय के घंटों बोल सकती हैं (इसलिए कोई उन्‍हें विषय देने का जोखिम नहीं उठाता) हमारे यहां मौन की महिमा का बखान मिलता है। मौन व्रत होता है क्‍योंकि मौन भी मुखर होता है। द्रौपदी के एक वाक्‍य से महाभारत हुआ था। दिनकर ने कहा था कि वाणी का वर्चस्‍व रजत है पर मौन कंचन है। एक कहानी है, राजकुमार बोलता ही नहीं था। उसे बुलवाने का काम सेनापति को दिया गया। सेनापति राजकुमार को शाही बगीचे में ले गया कि वहां की सुंदरता देख, राजकुमार कुछ बोलने लग जाए। बगीचे में एक कौ‍वा कांव-कांव कर रहा था। सेनापति को लगा कि इसकी कर्कश आवाज राजकुमार को पसंद न आए, उसने तीर से कौ‍वे को मार दिया। राजकुमार जोर से बोला-कौवा चुप रहता तो मरता नहीं। सेनापति राजा से बोला कि राजकुमार बोलने लगे। राजा खुश हुआ, सेनापति को पुरस्‍कार दिए पर राजकुमार उसके बाद पहले की तरह फिर मौन। राजा को लगा कि सेनापति ने झूठ बोला, उसने सेनापति को मृत्‍युदंड सुनाया। राजकुमार सेनापति से बोला, चुप रहते तो मृत्‍युदंड नहीं मिलता…पर प्रâांस के वर्सेलीज निवासी मैडम रेनियर ने इतिहास रचा। मैडम सुबह से चहक रही थीं कि पति ने प्‍यार से झिड़का कि थोड़ा चुप रहो, मैडम को बात इतनी चुभी कि शॉक के कारण जीवन भर मौन रहीं। यहां तक कि अपनी इकलौती बेटी के लिए लड़का पसंद करने के समय भी मौन, अंतिम समय में पति ने हाथ जोड़कर माफी मांगी कि अपनी अंतिम इच्‍छा बताओ पर वह चुप रही। तो भाई लोगों संवाद बनाए रखें, उसी से संपर्क रहेगा।
पेट्रोल में आग
पेट्रोल के दामों में निरंतर बढ़ोतरी से संभाजीनगर के शेख यूसुफ मोटर साइकिल की बजाए १५ किमी दूर स्थित ऑफिस जाने के लिए काठियावाड़ी ‘जिगर’ नामक घोड़े से जा रहे हैं, जिससे १० हजार की बचत हो रही है। वाई.बी. चव्‍हाण कॉलेज में प्रयोगशाला सहायक पेट्रोल के बढ़ते भाव के विरोध में ऐसा कर रहे हैं। इसके लिए जिगर चाहिए। शहरों में पार्किंग के बदले अस्‍तबल खुलेंगे। वैâसा दृश्‍य होगा- सब अपने पसंदीदा ऊंट, खच्‍चर, गधों पर बैठकर ऑफि‍स जाएं। पशुओं को महत्‍व मिलेगा। चालान, आरटीओ, रांग साइड, सिग्‍नल से मुक्ति, प्रदूषण कम होगा। शेख की मांग है कि पशु की सवारी के लिए अलग से ट्रैक बनना चाहिए। महंगाई जो कराए, सो थोड़ा है…
(लेखक सुप्रसिद्ध व्‍यंग्‍यकार, मंच संचालक और स्‍तंभकार हैं)

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