मुख्यपृष्ठस्तंभकथा अनंता: गोबर की महिमा

कथा अनंता: गोबर की महिमा

गोबर की महिमा
विश्‍व में सबसे ज्‍यादा गोबर पैदा करनेवाला देश हिंदुस्थान है। सबसे ज्‍यादा गोबर गणेश भी इस देश में ही मिलते हैं। कुछ के दिमाग में गोबर भरा रहता है। सूखने पर यह उपला बन जाता है। जब घपला होता है, गोबर का उपला ही काम आता है। गुड़ गोबर करने पर लीपापोती के भी काम आता है। कुछ लोग ‘गोबर करते’ रहते हैं मतलब काम बिगाड़ते रहते हैं। गो का अर्थ-गाय है, बर का अर्थ श्रेष्‍ठ या उत्तम से है। गोमल बोलने की अपेक्षा गोबर बोलने का चलन है। गाय श्रेष्‍ठ पशु है और उसके गोबर में लक्ष्‍मी का वास है, जो अब सिद्ध भी हो रहा है। गोबर खेत में हो तो खाद का काम करता है। कुछ लोग गाय से नफरत करते हैं पर गोबर से जी भर प्‍यार करते हैं, गोबर की मार्वेâटिंग हो रही है। मतलब हंसुए के ब्‍याह में लोग खुरपी के गीत गाते हैं…की तर्ज पर। छत्तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री बघेल जी का गोबर प्‍यार जगजाहिर है। उनकी गोधन न्‍याय योजना से गौपालक गोबर बेचकर लखपति हो गए। बघेल जी ने पिछले सप्‍ताह बजट पेश किया, इस दौरान उनके हाथ में गोबर से बना ब्रीफकेस था जिस पर संस्‍कृत में ‘गोमय वसते लक्ष्‍मी’ लिखा था। उप्र और मप्र की सरकारें गोबर किलो के भाव से खरीद रही हैं। ग्‍वालियर के निगमायुक्‍त किशोर कन्‍याल डेयरी संचालकों से गोबर खरीदते हैं। हम तो साबूत नाक लेकर गोबर से दूर भागते हैं पर कंपनियां इसका संचय करके शानदार पैकिंग में बेच रही हैं। गोबर स्‍टॉक में रखा जा रहा है। कृषि प्रधान देश को गोबर का महत्व समझना ही चाहिए। कथा सम्राट प्रेमचंद ने एक बार लिखा था कि जब किसान के बेटे को गोबर में बदबू आने लगे तो समझ जाओ कि अकाल आनेवाला है लेकिन आजकल गोबर से खूश्‍ाबू आ रही है। गोबर की जय हो।
असली और नकली
आजकल हम ‘नकली सामान’, नकली शराब, घी, शहद, हींग के साथ-साथ लोगों के नकली व्‍यवहार तक से दुखी हैं। असली-नकली पर कई फिल्‍में भी बनी हैं। १९६२ में हृषिकेश मुखर्जी ने देव आनंद-साधना को लेकर व १९८२ में और १९८६ में के.सी. बोकाड़िया ने शत्रुघ्‍न सिन्‍हा-अनिता राज को लेकर फिल्‍में बनार्इं। फिल्‍मों में हम नकली बारिश का असली मजा लेते हैं। असली प्‍लास्टिक के नकली फूलों से घर सजाते हैं। किसी ने कहा है कि मां की ममता को छोड़कर इस दुनिया में सब कुछ नकली है। हालात ऐसे हो गए हैं कि अब हमें प्राकृतिक संतुलन बनाने के लिए भी नकलीपन का सहारा लेना पड़ रहा हैं। मुंबई से सटे मीरा-भायंदर शहर में पक्षियों की संख्‍या बढ़ाने के लिए विभिन्न स्‍थानों पर नकली घोसलों के निर्माण की योजना है, जहां भोजन-पानी (बर्ड फीडर) रखा जाएगा। कुल ७२ उद्यान तैयार कर उनके वृक्षों पर नकली घोंसले बनाए जाएंगे। पक्षियों को दाना-पानी का भी लालच दिया जाएगा। मनपा आयुक्‍त दिलीप ढोले व उपायुक्‍त संजय शिंदे के अनुसार शहर के वृक्षों पर भी कृत्रिम घोंसले लटकाए जाएंगे जिनकी देखरेख बगीचे-मनपा के कर्मचारी करेंगे। कहीं ऐसा न हो कि आनेवाले वर्षों में इन कृत्रिम घोंसलों में पक्षी भी नकली लाने पड़ें। उनकी आवाजें भी टेपरिकॉर्डर के माध्‍यम से सुननी पड़े। स्थिति दयनीय है, हम प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं, ये उसी का नतीजा है। (हालांकि अल्गोरिदम के अनुसार जीव वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर ५० अरब परिंदों का घर है।) पंक्तियां देखें, रहने दे मुझे इन अंधेरों में गालिब, कमबख्‍त रोशनी में अपनों के असली चेहरे सामने आ जाते हैं….
और अब दिमाग भी नकली…
आईआईटी, चेन्नई के शोधकर्ताओं ने इंसानी दिमाग की तरह सोचनेवाली मोशन प्‍लानिंग अल्‍गोरिदम को विकसित किया है। करने को तो वे कुछ भी विकसित कर सकते हैं पर दिमाग भी जो पहले से ही इतना शातिर है… एयरोस्‍पेस इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर सतदल घोष का कहना है कि इससे कई खोजें, भूकंप प्रभावित क्षेत्रों का पता लगाने में सुविधा होगी। यदि नकली दिमाग बन गया तो लोग अपने ओरिजनल दिमाग के प्रति लापरवाह हो जाएंगे, ये भी संभव है कि अपने दिमाग को बैंक में डबल होने के लिए फिक्‍स डिपॉजिट में रख दें, नकली दिमाग से काम चलाएंगे। दिमाग की भी खेती, काला बाजारी, दलाली, कमीशन सब शुरू हो जाएगा। कुछ के पास एक्‍स्‍ट्रा दिमाग होता है। वे शानदार कंपनियां खोल लेंगे, मतलब तमाम बुराइयों की संभावना है। नई पीढ़ी गीत गाएगी-‘नन्‍हे-मुन्ने बच्‍चे तेरी मुट्ठी में क्‍या है…’ वो उत्तर देगा- दिमाग। बलिहारी हो वैज्ञानिकों के दिमाग की।
पुरानी यादों की बिदाई
मुंबई के एक वरिष्‍ठ पत्रकार ने मुझसे कहा कि वे अब ज्‍यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह पाएंगे तो मैंने कहा- अभी तो आप बहुत हट्टे-कट्टे हैं, ऐसी बातें क्‍यों कर रहे हैं? वे बोले, कल घर में मेरी किताबें एक कपड़े में लपेटकर पीछे के कबाड़ में रख दी गई और मुझसे कहा गया कि जिसकी जरूरत हो, वहां से ले लिया करो। वे इस घटना से टूट गए और बोले कि मैंने एक समय खाना-नाश्‍ता नहीं किया, पैसा बचाकर पुस्‍तकें खरीदी, जिनसे जिंदगी भर मेरा लगाव रहा। उन पुस्‍तकों की ये गत देखकर मैं गश खा गया, लेकिन अब वही समय आ रहा है। मुंबई में लोग स्‍थानाभाव, छोटे घरों के कारण किताबें रद्दी में या भेंट में दे रहे हैं। अमेरिका तक में महामारी के बाद घरों को सुव्‍यवस्थित करनेवाली कंपनियों, संस्‍थानों का कहना है कि अब पुराना फर्नीचर, किताबें, यहां तक की पुरानी यादों की भी बिदाई हो रही है, जिनसे वे आजीवन भावनात्‍मक रूप से जुड़े रहे। भारी मन से कहते हैं कि जीवन भर जमा अंबार का बोझ हम अपने प्रियजनों पर नहीं छोड़ सकते। पुराने सामान की सफाई को पेशेवर लोग ‘डैथ क्‍लीनिंग’ कहते हैं। २०१८ में स्‍वीडन की मागरिट मेगनुसन की पुस्‍तक ‘द जेंटल आर्ट ऑफ स्‍वीडिश डैथ क्‍लीनिंग’ के छपने के बाद ये शब्‍द प्रचलन में आया है। यदि आप भी संग्रह कर रहे हों तो सतर्क हो जाएं, वैâसा समय आ रहा है, तेरी यादों को पसंद है मेरी आंंखों की नमी / हंसना भी चाहूं तो रुला देती है तेरी कमी…ये तन्‍हाई ज्‍यादा गहरी है जो आंसुओं से भरी है…आमीन।
(लेखक सुप्रसिद्ध व्‍यंग्‍यकार, मंच संचालक और स्‍तंभकार हैं)

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