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कौन किसके इश्क में

जल गए सब तारे आसमां के,
नींद नहीं आई कभी इन आंखों को
मैंने जिक्र किया क्या था वो…
जो सदियों से आंख लगाए थे
क्या भूल थी वो सुहानी-सी
जो बातों में भी अनकही-सी
कितने अनजाने कितने बेगाने
जो तन्हा ही हंसते तन्हा ही रोते
क्या फिक्र करूं इन हाथों के लकीरों पे
क्यूं खुलूं ये सिमटी इश्क की तकदीरों पे
कौन किसका है इन बस्ती-बस्ती में,
ये तो बस वहम है कि प्यार सच्चा होता है
मैंने देखा है जलते अलाव के पास,
सर्दियों में चिंगारियां उड़ते,
मैंने देखा है आशिकों को सड़कों पे आवारा घूमते
मैंने देखा है कदम-कदम पे गमों के अंगारे गिरते
एक एहसास खुले हैं, तो लबों के प्यास खुले
चाहा कि मैं चाहूं उसे तो वो न हुए…
झाँकती रही रूह कि वो हकीकत में होंगे,मगर ये कभी न हुआ कि वो दूर न होगें ‘ हमेशा….
– मनोज कुमार, गोण्डा

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