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कविता: आओ मतदान करें…

– अमित बैजनाथ गर्ग

अम्मा भूखी है, बच्चे बिलख रहे हैं
काका रो रहे हैं, अंगारे सुलग रहे हैं
सिसकती रूहों को चुप कराने के लिए
अंधेरे में उजाले चमकाने के लिए
आओ मतदान करें…
कर्ज लेकर कई हरसूद मर रहे हैं
बूढ़े बाप बेटी के लिए तरस रहे हैं
बुझे हुए चूल्हों को जलाने के लिए
खेतों पर बादल बरसाने के लिए
आओ मतदान करें…
कौओं की पांख खुजलाने के लिए
खामोश चक्की को जगाने के लिए
भूखे-नंगे बदन को छुपाने के लिए
तन को निवाला खिलाने के लिए
आओ मतदान करें…
इंतजार को सिला दिलाने के लिए
कोशिशों को आजमाने के लिए
बहरों को नींद से उठाने के लिए
बिछड़ों को फिर से मनाने के लिए
आओ मतदान करें…
सुलगते दंगों को बुझाने के लिए
अबला को सबल बनाने के लिए
आशा का दीया जलाने के लिए
खोया विश्वास जगाने के लिए
आओ मतदान करें…
जेलों से झांकती आहों के लिए
बॉर्डर को ताकती निगाहों के लिए
घर की ओर जाती राहों के लिए
जिस्म से लिपटी बांहों के लिए
आओ मतदान करें…
सबको संग लाने के लिए
सभ्यता-संस्कृति बचाने के लिए
विकसित अमन बनाने के लिए
चांद को चमन बनाने के लिए
आओ मतदान करें…
खेतों में हल उठाने के लिए
डूबते बाजार बचाने के लिए
उदास संसद बहलाने के लिए
धूर्तों को सबक सिखाने के लिए
आओ मतदान करें…
घर से मंदिर का रास्ता बनाने के लिए
सूनी मांग को फिर से सजाने के लिए
धर्म की पताका लहराने के लिए
शांति के परिंदों को उड़ाने के लिए
आओ मतदान करें…

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