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…तो कोई काम मुश्किल नहीं!-कायोज ईरानी

सेल्समैन से फोटोग्राफर और फोटोग्राफर से बॉलीवुड के मशहूर एक्टर बने बोमन ईरानी को कौन नहीं जानता? बॉलीवुड की सभी सुपरडुपर हिट फिल्मों में बोमन नजर आए हैं। इस टैलेंटेड एक्टर के सुपुत्र हैं कायोज ईरानी। बतौर अभिनेता कायोज ने `स्टूडेंट ऑफ द ईयर’, `बॉम्बे टॉकीज’ जैसी फिल्मों में अभिनय किया। `अजीब दस्तान्स’ जैसे मल्टी स्टारर शो को निर्देशित करनेवाले कायोज ने डिस्लेक्सिया जैसी बीमारी को अपने बचपन में मात दी थी। पेश है, अभिनेता से निर्देशक बननेवाले कायोज ईरानी से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

वेब फिल्म `अजीब दस्तान्स’ बनाने की कोई खास वजह?
अगर हम आम लोगों की जिंदगी के बारे में सोचें तो कई हैरतअंगेज कहानियां हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं। यह जरूरी नहीं कि अमीर या सेलिब्रिटी लोगों की जिंदगी बहुत अलग होती है। मेरी जानकारी में कुछ ऐसे रिश्ते भी हैं, जिन्हें हम दंपति कह सकते हैं। रिलेशनशिप में होने के बावजूद उनमें कोई बातचीत नहीं होती। एक कपल में बातचीत तो है लेकिन रिलेशनशिप नहीं। एक दंपति एक-दूसरे से बात नहीं कर पाते लेकिन उनमें बहुत संजीदा रिलेशनशिप मौजूद है। ऐसे में करण (जौहर ) ने मुझे इन शॉर्ट कहानियों पर फिल्म बनाने के लिए कहा और `अजीब दस्तान्स’ आपके सामने है, जिसे दर्शकों ने नेटफ्लिक्स पर बहुत पसंद किया है।

आपके लिए `अजीब दस्तान्स’ की इतनी बड़ी स्टारकास्ट को मैनेज करना कितना आसान और कितना मुश्किलों भरा रहा?
मेरे जीवन और करियर के ये सबसे हसीन और खुशनुमा पल थे। अगर काम को बहुत सुचारू ढंग से किया जाए तो कोई काम मुश्किल नहीं होता। फिल्म के सारे कलाकार मंजे हुए थे, जिससे मेरा काम बहुत आसान हो गया। सच कहूं तो जो पेपर वर्क मैंने किया था उससे कहीं अलग शेफाली शाह और मानव कौल ने अपने हिसाब से बहुत अच्छा काम किया।

बोमन ईरानी का बेटा होने के नाते आपका बचपन बहुत आराम से कटा होगा?
नहीं, मेरा बचपन मुश्किलों भरा रहा। पढाई-लिखाई में मैं कभी तेज स्टूडेंट नहीं रहा। मुझे डिस्लेक्सिया (लर्निंग डिसऑर्डर) की बीमारी थी, हर क्लास में पास होना मेरे लिए मुश्किल था। मुझमें कॉन्फिडेंस की कमी थी। मेरे पैरेंट्स को मेरे भविष्य की चिंता थी। बस मुझे रुचि थी तो सिनेमा में। हो सकता है मेरे डैड का सिनेमा में काम करना मुझे विरासत में मिला होगा।

आपको सिनेमा में अपना करियर बनाने के लिए क्या परिवारवालों से इजाजत लेनी पड़ी?
मेरे डैड का जीवन कहां आसान था? हमारी कॉन्फेक्शनरी की दुकान थी, जिसे वो नानी के साथ चलाया करते थे। फिर कुछ पूंजी जमा होने पर उन्होंने प्रोफेशनल कैमेरा खरीदा और फोटोग्राफी की और अगले मोड़ पर थियटर करते हुए एक्टर बने। माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन जो आमदनी उनकी थी उसमें हम सब नागपाड़ा इलाके में बहुत हंसी-खुशी से रहते थे। मेरे परिवार ने अपने प्यार और दुलार से मेरी कमियों को खूबियों में ढालने की पूरी चेष्टा की। मेरा परिवार बड़ा पॉजिटिव है। लविंग मॉम, डैड, भाई, नानी और अब भाई का ससुराल भी हमारे परिवार का हिस्सा है। मैं सिनेमा लाइन में काम करने के लिए आजाद था।

पिता के जानेमाने एक्टर होने के नाते क्या आपको उनकी सिफारिश का कुछ फायदा मिला?
उन्होंने मेरी कोई सिफारिश नहीं की। मेरा सिनेमा के प्रति नॉलेज, गहरा अध्ययन और इस क्षेत्र में काम करने की लगन मुझे काम के मौके देती रही। डैड ने मुझे लगातार सपोर्ट अवश्य दिया। उनके प्रोत्साहन के कारण ही मैंने अपना संघर्ष शुरू किया। प्रोडक्शन हाउसेस में काम ढूंढने पर धीरे-धीरे काम मिलता गया। वैसे मुझे पहला ब्रेक करण जौहर ने ही `स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में दिया था। मैंने इस फिल्म में सुडो का किरदार निभाया था। करण की `धर्मा प्रोडक्शंस’ ने ही मुझे `एक मैं और एक तू’ के सहायक निर्देशक के तौर पर काम दिया। लेकिन एक्टर के तौर पर `यंगिस्तान’, `द लीजेंड ऑफ मायकेल मिश्रा’, `बॉम्बे टॉकीज’ जैसी फिल्मों में अभिनय किया। इस एक्टिंग अनुभव का मुझे निर्देशन में लाभ हुआ और ये समझ आया कि एक्टरों से मुझे किस तरह का काम लेना है।