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…की यहां कोई कमी नहीं है!-केतकी दवे

‘बालाजी टेलीफिल्म्स’ के बेहद सफल और लोकप्रिय टीवी शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ को छोटे पर्दे पर टेलीकास्ट हुए पूरे २१ वर्ष हो चुके हैं। इस शो से जुड़ी केतकी दवे का तकिया कलाम ‘आ रा रा रा…’ था। उनके इस तकिया कलाम और उनकी बोलने की स्टाइल को दर्शकों द्वारा बेहद सराहा गया। कामयाब शोज के अलावा केतकी ने ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया’, ‘कल हो न हो’ जैसी आइकॉनिक फिल्में भी कीं। हर रंग में आसानी से ढलनेवाली केतकी आजकल ‘बालिका वधू’ में नजर आ रही हैं। पेश है, केतकी दवे से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

♦ ‘बालिका वधू’ शो करने की क्या वजह रही?
‘बालिका वधू-२’ के लिए हामी भरने की कई वजहें थीं। यह शो सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में जागृति लाता है। इसका विषय संजीदा है और ये हर दूसरी लड़की की कहानी प्रतीत होती है। मेरा किरदार दादी-सा का है, जो घर-परिवार पर हुकूमत चलाती है और चाहती है कि परिवार उसके आदर्शवादी ‘मूल्यों’ पर चले। यह किरदार सशक्त महिला का है, जिसमें पॉजिटिव और निगेटिव दोनों रंग हैं।

♦ एक कलाकार को कितनी आजादी मिलती है किरदार को अपने तरीके से पेश करने की?
फिल्मों के मुकाबले टीवी का मेरा अनुभव समृद्ध रहा है। मुझे काफी हद तक विविधतापूर्ण भूमिकाएं मिलीं। मैंने बहुत ज्यादा हिंदी फिल्में नहीं की लेकिन ‘कल हो न हो’ और ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया’ जैसी फिल्मों में काम करने का मजा आया। जहां तक टीवी इंडस्ट्री में आजादी का सवाल है, ये इंडस्ट्री वक्त की पाबंद है और अपने कलाकार को अपने हिसाब से काम करने की आजादी देती है।

♦ आपका अभिनय में झुकाव किस तरह से हुआ?
मेरी मां सरिता जोशी ने ६ साल की छोटी उम्र से स्टेज पर एक्टिंग की शुरुआत की। बचपन से हमने मां को पूरी निष्ठा के साथ काम करते हुए देखा। मेरे पिती प्रवीण जोशी भी गुजराती थिएटर के नामी मेकर हैं। मेरे पति रसिक दवे अभिनेता और बेटी रिद्धि दवे भी अभिनेत्री है।

♦ क्या आपको नहीं लगता कि आप दक्षा बेन और ‘आ रा रा रा’ की इमेज में बंधकर रह गई हैं?
जब मुझे दक्षा बेन का किरदार ऑफर हुआ तो लेखक ने मुझे बताया कि किसी भी डायलॉग को बोलने से पहले मैं ‘आ रा रा रा’ बोलूं। ये बात मुझे अजीब लगी लेकिन मेरा ये तकिया कलाम फेमस हो गया और मुझे काफी शोहरत मिली।

♦ क्या आपको नहीं लगता कि गुजराती फिल्मों और स्टेज पर आपको ज्यादा मौके नहीं मिले?
८०-९० के दशक की गुजराती फिल्मों को करने से मैंने मना किया। आज गुजराती सिनेमा बहुत बदल गया है, रिलेवेंट विषयों पर फिल्में बननी लगी हैं। स्टेज करने के साथ ही मैं एक-दो गुजराती फिल्में भी कर रही हूं। कभी-कभी मुझे एक ही बात का मलाल लगता है।

♦ किस बात का मलाल?
जब मैंने कॉमेडी किरदार निभाया तो मेकर्स पूछते हैं क्या आपको गंभीर किरदार निभाना आता है? जब गंभीर किरदार किया तो पूछते हैं कॉमेडी करना आता है? अरे भई, मैं हर तरह की चुनौतियों का सामना कर सकती हूं। मेरी अभिनय क्षमता पर संदेह कैसा?

♦ क्या आप ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए कुछ कर रही हैं?
ओटीटी में बहुत स्कोप है। मैं ओटीटी को जरूर आजमाना चाहूंगी। कहानियों और किरदारों की यहां कोई कमी नहीं है।