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बेबाक : किसकी ‘ईडी’ में है दम?… पंजाब में सबकी अपनी-अपनी ‘ईडी’

अनिल तिवारी – निवासी संपादक
पंजाब में जैसे-जैसे मौसमी ठंड बढ़ रही है, वहां सियासी पारा भी चढ़ता जा रहा है। उस पर यह जो एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट वाली ‘ईडी’ है, उसने तो चुनावी आग में मानो सियासत का घी ही डाल दिया है। यहां सबकी अपनी-अपनी ‘ईडी’ है। जिनका तात्पर्य सिर्फ ‘एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट’ ही नहीं है, बल्कि ‘इलेक्शन डिप्लोमेसी’ से भी है। आज पंजाब का पूरा चुनावी गणित इन्हीं ‘ईडियों’ के इर्द-गिर्द घूम रहा है, इलेक्शन डिप्लोमेसी यानी चुनावी कूटनीति के सुपुर्द हो चुका है। इसका किसको कितना लाभ होगा, कितना नुकसान और ये ‘ईडियां’ किसे सत्ता में बैठाएंगी और किसको नहीं, यह तो १० मार्च को चुनावी नतीजे घोषित होने के बाद ही पता चल पाएगा।

केंद्र में नए दौर की इस नई सरकार के पूरे कार्यकाल में राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों पर ऐन चुनावों के वक्त एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट वाली ‘ईडी’ की कार्रवाइयां होना कोई नई बात नहीं है। गत कई वर्षों से देश इसे देख ही रहा है। इसलिए इनकी जरूरत, प्रासंगिकता और विरोध पर चर्चा करने से बेहतर है कि हम पंजाब की सियासत के ‘प्रकाश’ में राज्य पर हावी होती नई ‘ईडियों’ यानी इलेक्शन डिप्लोमेसी के ‘अंधकार’ की बात करें। क्योंकि पंजाब में सीएम चरणजीत सिंह चन्नी के भतीजे के स्थान समेत १० जगहों पर ईडी की छापेमारी और उससे हुए ‘हासिल’ से ज्यादा चुनावी ‘ईडी’ से सियासत का ‘हासिल’ क्या होगा, इसे समझना ज्यादा जरूरी है। क्योंकि वहां न तो कोई अवैध रेत खनन का मामला है, न ही अवैध छापेमारी की शिकायत। वहां कुछ है तो वह सियासत के मंच पर मतदाताओं के वैध मत पाने का सियासी दांव। जिसे इस समय पंजाब के मुख्यमंत्री चन्नी से बेहतर शायद कोई और नहीं समझ रहा होगा। इसलिए शायद राज्य में चुनाव की घोषणा होने से महीने भर पहले ही चन्नी वैâबिनेट ने सवर्ण वोटरों को रिझाने के लिए, अनारक्षित वर्गों के लिए राज्य सामान्य श्रेणी आयोग के गठन को मंजूरी दे दी थी। चन्नी की यह इलेक्शन डिप्लोमेसी निश्चित ही कांग्रेस के लिए कारगर साबित हो सकती है, उतनी ही कारगर, जितनी पंजाब में मतदान की तारीख आगे बढ़ने से कांग्रेस को मिले इलेक्शन डिप्लोमेसी के अतिरिक्त वक्त से होगी। चुनाव आयोग के इस पैâसले की बदौलत कांग्रेस को अपने रूठे हुए नेताओं को मनाने का अतिरिक्त वक्त मिल गया है, जिसकी उसे शिद्दत से जरूरत भी थी।

दरअसल, पंजाब कांग्रेस में अंदरखाने सब कुछ ठीक नहीं है। कांगे्रस की टिकटें घोषित होते ही वहां बगावत शुरू हो चुकी है, समय रहते इस पर पार्टी को काबू पाना जरूरी है। अन्यथा उसके चुनावी नतीजे बुरी तरह से प्रभावित हो सकते हैं। कांग्रेस इसे बखूबी जानती भी है। इसीलिए वह सार्थक इलेक्शन डिप्लोमेसी कर रही है और इस ‘ईडी’ की बदौलत सकारात्मक नतीजे भी हासिल कर रही है। यदि चुनाव आयोग ने मतदान की तारीख १४ फरवरी से बढ़ाकर २० फरवरी न की होती, तो शायद कांग्रेस के हिस्से, यहां भी निराशा ही लगती। वैसी ही निराशा, जैसी पंजाब में किसानों के २२ संगठनों के संयुक्त समाज मोर्चा के प्रभावी तौर पर चुनावी मैदान में उतरने से उसके हिस्से आई है। किसानों का संगठित होकर अलग मंच बना लेना, पंजाब जैसे राज्य में न केवल कांग्रेस, बल्कि अन्य सभी राजनैतिक दलों के लिए राजीनीतिक निराशा का विषय है। भाजपा गठबंधन समेत शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी भी इसका साफ-साफ नुकसान देख रहे हैं। तभी तो अपनी ‘इलेक्शन डिप्लोमेसी’ के तहत ९५ वर्षीय प्रकाश सिंह बादल ५ डिग्री की जमा देनेवाली ठंड में चुनावी प्रचार में लगे हुए हैं, जनता से वोट मांग रहे हैं। वे बखूबी जानते हैं कि इस चुनाव में उनके अस्तित्व पर भी खतरे के ‘बादल’ मंडरा रहे हैं। पंजाब के अब तक के सभी १८ मुख्यमंत्रियों में सबसे अधिक, तकरीबन १९ वर्षों तक सीएम की कुर्सी पर काबिज रहनेवाले ‘प्रकाश’ सिंह बादल को शायद अब भी चुनावी ‘अंधकार’ से परहेज है।

खैर, सियासत में सत्ता के नशे को नहीं रोका जा सकता है। सत्ता हासिल करने के लिए नशे के इस्तेमाल पर अंकुश जरूर लगाया जा सकता है। पंजाब में इन दिनों बीएसएफ और एनसीबी शायद यही कोशिश करने में जुटी हैं। ये दोनों केंद्रीय डिप्लोमेसी के तहत पंजाब चुनाव में नशा रोकने के लिए पंजाब की पुलिस के अलावा ८ अन्य राज्यों की पुलिस के साथ भी मिलकर काम कर रही हैं, ताकि ड्रग्स की तस्करी रुक सके और पाकिस्तानी कंटेनरों की जांच तेज हो सके। अब राज्य के भीतर नशे पर लगाम लगाने का काम एनसीबी के हिस्से है, जिसने चुनाव के दौरान हर जिले में तैनात रहने का पैâसला किया है। जब मात्र ७ दिनों में राज्य में लगभग ४० करोड़ की ड्रग्स और तकरीबन एक करोड़ की शराब बरामद हो जाए, तब नशे के खिलाफ कदम उठाना जरूरी भी हो जाता है पर उसी के साथ राज्य में बढ़ रहे कोविड के प्रकोप पर नजर रखना भी जरूरी होता है। खासकर तब, जब चुनाव के इस दौर में उसका बेकाबू वायरस राज्य को तेजी से चपेट में लेता जा रहा हो। आंकड़े बता रहे हैं कि मोहाली-भटिंडा में हर दूसरा, अन्य कुछ शहरों में हर चौथा तो राज्य में हर पांचवां व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव पाया गया है।

असल में राज्य के लगभग हर हिस्से में कोरोना का संक्रमण, उतनी ही तेजी से पैâल रहा है, जितनी तेजी से कांग्रेस में चन्नी विरोधियों का। लिहाजा, चन्नी पर लगातार अपनी कुर्सी और कांग्रेस की सत्ता, दोनों को बचाने का दबाव है। यही दबाव चन्नी और पार्टी को फूंक-फूंककर कदम रखने को मजबूर कर रहा है। लगातार इलेक्शन डिप्लोमेसी अपनाने को प्रेरित कर रहा है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस ने विधानसभा के लिए ८६ उम्मीदवारों की पहली सूची में महज ४ विधायकों के ही टिकट काटे हैं। यह जानते हुए कि इससे सूची में चन्नी की अपेक्षा कांग्रेस के लिए बार-बार सिरदर्द बननेवाले नवजोत सिंह सिद्धू का पलड़ा भारी रहेगा, जो कि भविष्य में, खासकर कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में अड़चनें पैदा करने के लिए काफी है। इतना ही नहीं, पार्टी में किसी तरह की बगावत न हो, इसके लिए कांग्रेस छोड़कर पंजाब लोक कांग्रेस का गठन करनेवाले कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबियों की भी टिकट नहीं काटी गई है।

यह तो बात हुई पंजाब चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस की, परंतु इसी के साथ-साथ वहां मजबूती से जगह बनानेवाली, बल्कि कांग्रेस को सबसे बेहतर टक्कर देनेवाली ‘आम आदमी पार्टी’ ने भी अपनी इलेक्शन डिप्लोमेसी में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसी डिप्लोमेसी के तहत एक प्रभावी कूटनीति के अंतर्गत अरविंद केजरीवाल ने यह कहते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री पद के चेहरे की घोषणा की, कि उन्होंने इसका चयन रायशुमारी के जरिए किया है। उन्होंने भगवंत सिंह मान के नाम की घोषणा करते हुए यह भी प्रचारित कर दिया कि रायशुमारी में शामिल पंजाब के २१ लाख लोगों में से ९३ फीसदी से अधिक लोगों ने मान के नाम पर मोहर लगाई है। संकेत साफ है। ऐसा करके केजरीवाल यह साफ-साफ जतलाना चाहते हैं कि राज्य के कुल २ करोड़ मतदाताओं में से १० फीसदी से अधिक तो पहले से ही मान के साथ हैं, ‘आप’ के साथ हैं। इसलिए पंजाब के अगले मुख्यमंत्री मान ही होंगे। वैसे कहा भी जाता है कि जिसने मालवा को जीत लिया, पंजाब में सरकार उसी की बनती है। अलबत्ता, मान लगातार दो बार से मालवा जीतकर संसद पहुंच भी रहे हैं। हालांकि, सच्चाई तो यह भी है कि मान जिस मालवा से आते हैं, उस मालवा के हालात खुद ही बद से बदतर हो चुके हैं। हरियाणा से अलग होने के बाद से १८ में से १५ मुख्यमंत्री मालवा से बनने के बावजूद मालवा में आज तक समुचित विकास नहीं हो सका है। लोग मानते हैं कि मालवा की तुलना में दोआबा और माझा में ज्यादा विकास हुआ है। सीएम चन्नी हों, सुखबीर सिंह बादल हों या फिर संयुक्त समाज पार्टी के सीएम फेस बलवीर सिंह राजेवाल, सभी मालवा से आते हैं पर मालवा को न्याय कोई नहीं दे पाता। हर बार जब मालवा का मतदाता अपने मुख्यमंत्री से यह सवाल करता है कि उसने आखिर मालवा को दिया क्या? तो बताने को किसी के पास कुछ नहीं होता। स्वाभाविक है यह सवाल चन्नी से भी हो रहा है। हालांकि, चन्नी के लिए चैन की बात यह है कि उनके हिस्से मात्र १११ दिन का कार्यकाल ही आया है। इतने अल्पकाल में वह सभी की अपेक्षा पर खरे वैâसे उतर सकते हैं? खासकर तब, जब वह अपनी ही पार्टी के कुछ नेताओं की अपेक्षा पर ही खरे नहीं उतर पाए हों। शायद तभी कांग्रेसी सांसद मनीष तिवारी तंज कसते हैं कि पंजाब में गंभीर किस्म के लोगों की जरूरत है। पंजाब को एक ऐसे मुख्यमंत्री की जरूरत है, जो चुनौतियों से निपट सके और जो कड़े  फैसले लेने की क्षमता रखता हो।
कुल मिलाकर, पंजाब में सभी की अपनी-अपनी ‘ईडी’ है यानी इलेक्शन डिप्लोमेसी है। चाहे फिर वह कांग्रेस हो, ‘आप’ हो, शिरोमणि अकाली दल और बसपा का गठबंधन हो या फिर किसान मोर्चा का एलायंस। इस पंचकोणीय लड़ाई में किसी के पास ‘इलेक्शन डिप्लोमेसी’ नहीं है तो वह एनडीए गठबंधन में शामिल भाजपा, पंजाब लोक कांग्रेस और अकाली दल (संयुक्त) की तिकड़ी के पास नहीं है। इनके पास अगर कुछ है तो वह है एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट वाली ‘ईडी’ और उसका डर! तो फिलहाल यह उसी से काम चला रहे हैं। अब इनकी यह ‘ईडी’ कितनी कारगर होगी! यह तो संत रोहिदास जयंती पर रैदासियों के वह जत्थे ही बताएंगे, जो सीरगोवर्धन मंदिर में गुरु चरणों का वंदन करके, लौटकर पंजाब में मतदान करेंगे। तब पता चलेगा कि आखिर किसकी ‘ईडी में है दम! और कौन है पानी कम?’

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