मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक: मन की शांति

किस्सों का सबक: मन की शांति

दीनदयाल मुरारका। राजा जनश्रुति प्रतिदिन अन्न वस्त्र, स्वर्ण मुद्राएं आदि दान करके ही भोजन ग्रहण करते थे। वो प्राय: यही सोचते रहते थे कि उनके जैसा कोई दयालु और दानी नहीं है। हमेशा उनका मन अशांत रहता था। एक बार उन्होंने दो नागरिकों को बात करते हुए सुना। एक कह रहा था। राजा जनश्रुति के राज्य में हम कितने सुखी हैं। हमें किसी प्रकार की चिंता नहीं। उनकी दानशीलता का कोई जवाब नहीं। इस पर दूसरे ने कहा कि हां भाई तुम्हारी बात तो ठीक है पर लोगों को सुख समृद्धि देने वाला राजा खुद कितना अशांत रहता है? राजा से अच्छा तो वह रैक्व है, जिसने साधन विहीन होकर भी मन की शांति प्राप्त कर ली है।
राजा ढेर सारी स्वर्ण मुद्राएं लेकर रैक्व के पास पहुंचा। उन्होंने रैक्व से कहा कि यह छोटी सी भेंट आपके लिए लाया हूं। इसे स्वीकार कर मुझे कृतार्थ करें। रैक्व ने कहा कि राजा आप तो ज्ञान पिपासा शांत करने आए हैं, फिर इन सब वस्तुओं की क्या आवश्यकता थी। मैं क्या करूंगा? मेरी कुटिया तो बहुत छोटी है। इनमें यह सब वस्तुएं आएगी भी नहीं।
आपको जब इन वस्तुओं की व्यर्थता का बोध हो जाए, तब तुम मेरे पास आना। राजा ने कहा कि मेरा जीवन तो निरर्थक है। इस पर रैक्व ने मुस्कुरा कर कहा कि आपने वैâसे सोच लिया कि आपका जीवन व्यर्थ गया है? सच्चाई यह है कि अभी तक आपने जो भी दान पुण्य किया है, वह प्रशंसा की आशा में किए हैं और आपको प्रशंसा भी मिली है। इस पर जनश्रुति की जिज्ञासा बढ़ी। उन्होंने कहा कि मैं राज्य और अपनी समस्त सुख-सुविधाओं को छोड़ने के लिए तैयार हूं। इस पर रैक्व ने बोला कि आपको कुछ भी छोड़ने की आवश्यकता नहीं।
आपके भीतर जो इन सबके प्रति आसक्ति का भाव है, उसे छोड़ना होगा। आप इस राज्य को चलाइए लेकिन अपने आपको राजा नहीं, सेवक समझ कर। आप यह समझकर दान दीजिए कि ये वस्तुएं आपको मिली ही हैं दीन-दुखियों को देने के लिए। आप अपने आपको कर्ता न समझ कर मात्र माध्यम मान लीजिए। कृपया यदि आप अपनी सोच में इस तरह का सुधार लाते हैं तो निश्चय ही आपको दान देने के बाद में ढेरों शांति की अनुभूति होगी।

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