मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : मृत्यु का भय

किस्सों का सबक : मृत्यु का भय

दीनदयाल मुरारका। एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ जंगल में आश्रम बनाकर रहते थे। वे उन्हें योगाभ्यास सिखाते थे, सत्संग भी करते थे। एक शिष्य चंचल बुद्धि का था। वह बार-बार गुरु से कहता, आप कहां जंगल में पड़े हैं? चलिए एक बार नगर की सैैर करके आते हैं।
महात्मा ने कहा, मुझे तो अपनी साधना से ही फुर्सत नहीं है। तुम चले जाओ। शिष्य अकेला ही नगर चला गया। नगर में उसने बाजार की शोभा देखी। मन अति प्रसन्न हुआ। इतने में ही उसकी निगाहें एक भवन की छत पर पड़ी। उसने देखा कि एक परमसुंदरी छत पर कपड़े सुखा रही है। बस वह उसके सौंदर्य से घायल हो गया। आश्रम में वापस आने पर शिष्य का चेहरा देखकर महात्मा जान गए कि शिष्य कामवासना का शिकार हो गया। पूछने पर चेले ने सारी बात विस्तार से गुरु जी को बताई और कहा कि गुरुदेव हृदय में असहनीय पीड़ा हो रही है।
महात्मा बोले, क्या नजर का कांटा हृदय में चुुभ गया है? गुरु जी ने उस स्त्री का पता पूछा तो पता चला कि वह नगर के एक सेठ की पत्नी है। महात्मा ने एक पत्र के जरिए सेठ को अपनी पत्नी को लेकर आश्रम में एक रात के लिए आने के लिए कहा। फिर सेठ को अलग बैठा कर महात्मा स्त्री को लेकर शिष्य के पास गए और कहा कि यह स्त्री रात भर तेरे पास रहेगी, पर ध्यान रखना सूरज निकलते ही तेरा देहांत हो जाएगा। शिष्य को अपने गुरुजी पर बहुत विश्वास था। उसे गुरुजी के कहे अनुसार अपनी मृत्यु साक्षात सामने दिखाई देने लगी। गुरुजी ने उस स्त्री को सारी बात बताकर आश्वासन दिया कि रात को तुम्हारे धर्म पर कोई आंच नहीं आएगी। इधर चेला रातभर कांपता रहा। उसकी सारी वासना रफूचक्कर हो गई।
सुबह गुरुजी ने पूछा कि तेरी इच्छा पूरी हुई? शिष्य ने आपबीती सुना दी। स्त्री को सम्मानपूर्वक सेठ के साथ रवाना कर महात्मा जी ने शिष्य से कहा कि जीवन में मृत्यु की चिंता एवं चिंतन सदा करते रहना चाहिए। यही तुम्हें बुरे कामों से बचाएगी।

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