मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : स्पष्टवादिता

किस्सों का सबक : स्पष्टवादिता

दीनदयाल मुरारका। तैमूर लंग एक अत्याचारी शासक के रूप में विख्यात था। जिस राज्य को लूटता, वहां बड़ी संख्या में गुलामों को पकड़ता और उनका सौदा वह स्वयं ही मोलभाव करके तय करता था। एक बार उसके द्वारा पकड़े गए गुलामों में तुर्किस्तान के प्रसिद्ध दार्शनिक अहमदी थे। तैमूर ने उनसे पूछा कि बताओ पास में खड़े हुए दो गुलामों की कीमत कितनी होनी चाहिए? अहमदी ने कहा कि ये नेक और समझदार मालूम होते हैं। इनकी कीमत चार अशर्फियों से कम नहीं होनी चाहिए।
तैमूर को पता नहीं क्या सूझा? उसने एक विचित्र सवाल किया। उसने अहमदी से पूछा कि मेरी कीमत क्या हो सकती है? कुछ सोचकर अहमदी ने कहा कि दो अशर्फी से ज्यादा आपकी कीमत नहीं है। यह सरासर तैमूर का अपमान था। वह गुस्से में गरजा और कहा कि तुम्हें मालूम है, तुम क्या कह रहे हो? इतनी अशर्फियों की तो मेरी एक चादर है, जो मैंने ओढ़ रखी है।
गुस्से में लाल तैमूर को बड़ी निर्भीकता से देखते हुए अहमदी ने कहा कि यह कीमत मैंने तुम्हारी चादर को देखकर ही बताई है, अन्यथा तुम जैसे घमंडी हृदयविहीन और अत्याचारी शासक की कीमत दो कौड़ी भी नहीं हो सकती है। दार्शनिक अहमदी की निर्भीकता और स्पष्टवादिता देखकर तैमूर का गुस्सा ठंडा पड़ गया। पता नहीं, क्या सोचकर उसने अहमदी को गुलामी से मुक्त कर दिया? निर्भीकता और स्पष्टवादिता जीवन में हमेशा आगे बढ़ने के लिए सहायक होते हैं।

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