मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : सर्वस्व दान

किस्सों का सबक : सर्वस्व दान

दीनदयाल मुरारका। एक समय की बात है नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक सभा को संबोधित कर रहे थे। अचानक मंच पर चढ़ने का प्रयास करती हुई एक स्त्री पर उनकी नजर पड़ी। वह बिल्कुल फटे हाल थी। आजाद हिंद फौज के अधिकारी भी अचरज में थे। सभी के भीतर उत्सुकता थी कि आखिर वह स्त्री चाहती क्या है?

तभी उस स्त्री ने अपनी मैली-कुचैली साड़ी के किनारे में बंधे ३ रुपए निकाले और नेताजी के पांव के पास रख दिए। नेताजी हैरान होकर उसे देख रहे थे। फिर उस महिला ने हाथ जोड़कर कहा, नेताजी इसे स्वीकार कर लीजिए। आपने राष्ट्र के लिए सर्वस्व दान करने के लिए कहा है। मेरी तो जिंदगी की यही सारी जमा पूंजी है। इसके अलावा मेरे पास कुछ नहीं है। सभा में उपस्थित जनसमुदाय भी चकित हो गया था। नेताजी मौन रहे।

कुछ देर बाद वह औरत बोली, क्या आप मुझ गरीब के इस तुुच्छ दान को स्वीकार नहीं करेंगे? क्या भारत मां की सेवा करने का गरीबों को अधिकार नहीं है? इतना कहकर वह नेता जी के पैरों में गिर गई। नेताजी की आंखों में आंसू आ गए। बिना कुछ कहे उन्होंने रुपए उठा लिए। उस स्त्री की खुशी का ठिकाना न रहा। वह उन्हें प्रणाम करके वहां से चली गई।

उसके जाने के बाद पास खड़े एक अधिकारी ने नेताजी से पूछा, नेताजी उस गरीब महिला से ३ रुपए लेते हुए आपकी आंखों में आंसू क्यों आ गए थे? नेता जी ने कहा, मैं सचमुच बहुत असमंजस में पड़ गया था। उस गरीब महिला के पास कुछ भी नहीं होगा। किंतु यदि मैं इन्हें भी नहीं लूं, तो निश्चय ही उसकी भावना आहत होगी। देश की स्वाधीनता के लिए यह अपना सब कुछ देने आई है। इसे इंकार करने पर पता नहीं वह क्या-क्या सोचेगी? हो सकता है, वह यही सोचने लगे कि मैं केवल अमीरों का ही सहयोग स्वीकार करता हूं। यही सब सोच-विचार करके मैंने यह महादान स्वीकार कर लिया। यह सुनकर पास करें अधिकारी की भी आंखें नम हो गई थी।

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