" /> किस्सों का सबक…मातृभाषा का महत्व

किस्सों का सबक…मातृभाषा का महत्व

राजा कृष्णदेव के दरबार में उपस्थित नवरत्नों में से एक नवरत्न गोपाल भांड थे। वे अपनी हाजिर जवाबी के कारण राजा को बेहद पसंद थे। एक बार राजा कृष्णदेव की सभा में एक विद्वान बाहर से पधारे। वे उस समय की भारत में प्रचलित अधिकांश भाषाएं, जैसे संस्कृत, अरबी, फारसी, आदि प्राचीन भाषाओं में बेहतर तरीके से बोलते हुए अपना परिचय राज दरबार में देने लगे।
विद्वान द्वारा कई भाषाओं में बोलने पर राजा कृष्णदेव ने अपने दरबारियों की ओर देखा और पूछा कि क्या कोई इन विद्वान की मातृभाषा का अंदाज लगा सकता है? लेकिन दरबारी यह अनुमान ना लगा सके। राजा कृष्णदेव ने गोपाल भांड से पूछा, क्या तुम कई भाषाओं के ज्ञाता हमारे विद्वान अतिथि की मातृभाषा बता सकते हो?
गोपाल भांड ने बड़ी नम्रता के साथ कहा कि महाराज मैं भाषाओं का जानकार नहीं हूं, फिर भी पूरा प्रयास करूंगा। दरबार की सभा समाप्त होने के बाद सभी दरबारी सीढ़ियों से उतर रहे थे। गोपाल भांड ने तभी अतिथि विद्वान को जोर का धक्का दिया। वे अपनी मातृभाषा में गाली देते हुए सीढ़ियों से नीचे आ गए।
सभी जान गए कि उनकी मातृभाषा क्या है? गोपाल भांड ने विद्वान से बड़ी विनम्रतापूर्वक क्षमा मांगते हुए कहा कि देखिए तोते को कोई कितना भी राम-राम क्यों न सिखाए लेकिन जब बिल्ली आकर उसे दबोचना चाहती है तो उसके मुंह से टें-टें के सिवाय कुछ नहीं निकलता। विद्वान उनकी बात का आशय समझ गए। उन्होंने भी स्वीकार किया कि आराम के समय कोई भी भाषा चल सकती है किंतु आफत की परिस्थिति में मातृभाषा ही काम देती है। अतः मातृभाषा के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है।