मुख्यपृष्ठधर्म विशेषकिस्सों का सबक: आत्मीयता 

किस्सों का सबक: आत्मीयता 

दीनदयाल मुरारका। एक सज्जन गाड़ी में बैठे थे। अचानक सड़क पर उनकी नजर एक रिक्शेवाले पर पड़ी, वह कोने में खड़ा रो रहा था। यह देखकर सज्जन उसके पास गए और बोले तुम्हारी आंखों में आंसू क्यों है? एक अनजान व्यक्ति से ऐसे सहानुभूति पूर्ण शब्द सुनकर रिक्शेवाला बोला, बाबू जी मैं अकेला कमाने वाला हूं। किराए का रिक्शा है। आज मेरी जरा भी कमाई नहीं हुई है। यदि आज रिक्शे का किराया नहीं दिया तो मालिक कल मुझे रिक्शा नहीं चलाने देगा।
यह सुनकर सज्जन बोले कि तुम बैंक से लोन लेकर अपना रिक्शा क्यों नहीं खरीद लेते। रिक्शावाला बोला बाबू जी मुझे लोन कोई वैâसे देगा? यहां मेरा कोई जानकार नहीं, कोई जमानत देने वाला भी नहीं है। यह सुनकर सज्जन रिक्शेवाले को अपने साथ लेकर बैंक गए। बैंक के सभी कर्मचारी सज्जन को देखकर उनके सम्मान में खड़े हो गए। सज्जन ने रिक्शावाले के लोन का फॉर्म भरवाया। वे जमानतदार बने और उसे उसी समय लोन दिलवाया। रिक्शावाला सज्जन के प्रति कृतज्ञता से झुक गया। उसने सज्जन का नाम-पता लिखा और बोला कि बाबू जी मैं आजीवन आपका एहसानमंद रहूंगा। सज्जन रिक्शेवाले की पीठ थप-थपाकर वहां से चले गए।
कुछ सालों बाद रिक्शेवाले के लड़के का विवाह हुआ तो वह उस सज्जन को निमंत्रण देने गया। सज्जन ने न सिर्फ निमंत्रण स्वीकार किया, बल्कि विवाह में भी उनकी उपस्थिति ने रिक्शेवाले के विवाह की रौनक बढ़ा दी। अचानक वह सम्मान का पात्र बन गया। वो सज्जन थे, पंडित जवाहरलाल नेहरू। नेहरू जी अपनी सादगी एवं दया भाव के लिए जाने जाते थे।

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